Spirit of a Fighter – Chapter 1191
कमरे में सन्नाटा छा गया। मैंने करण का चेहरा देखा। वो टूट रहा था, धीरे-धीरे, अंदर से। उसके होंठ हिले, कुछ नहीं निकला। फिर उसकी आवाज़ निकली, और वो ऐसी थी जैसे किसी ने उसके गले से खींचकर बाहर निकाली हो।
"मैंने तुझसे पैसा माँगा था?" करण ने कहा। "मैंने कभी तुझसे कहा था कि मुझे अखाड़ा चाहिए? मैंने तुझसे कहा था कि मुझे तेरा नाम नहीं चाहिए। मुझे अपना नाम चाहिए।"
भैरव ने पहली बार अपना सिर ऊपर उठाया। पूरा उठाया।
"तू मेरा बेटा है," उसने कहा। "तेरा नाम मेरे बिना क्या?"
करण ने उसकी तरफ़ देखा। और उसकी आँखों में जो था, वो गुस्सा नहीं था। कुछ और था। किसी ऐसी चीज़ का दर्द जो अब काम नहीं आएगी।
वो पलटा।
"करण," भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा था जो पहले नहीं था। "करण, रुक।"
करण दरवाज़े की तरफ़ चला। उसके कदम तेज़ थे, पर एक-एक करके, जैसे हर कदम किसी चीज़ को रौंद रहा हो।
"करण!" भैरव की आवाज़ ऊँची हुई और ज़ंजीर खनकी। "मैंने तेरे लिए किया! सुन तो सही! मैंने तेरे लिए—"
करण दरवाज़े पर रुका।
उसने पलटकर नहीं देखा। बस दरवाज़े के फ्रेम को हाथ से पकड़ा और उसकी तरफ़ देखते हुए कहा — आवाज़ धीमी, साफ़, हर शब्द अलग।
"मैं कल से अपना नाम अपने कर्म से कमाऊँगा।"
और वो बाहर निकल गया।
मैं एक पल भैरव को देखता रहा। उसका हाथ हवा में था, ज़ंजीर थामे हुए, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने उसमें कभी नहीं देखा था। डर नहीं। बुढ़ापा। वो बुढ़ापा जो अकेले आता है।
मैं भी पलटा और बाहर चला आया।
बाहर सूरज सिर पर था। करण जीप के पास खड़ा था, और गंगा देवी उसके सामने खड़ी थीं। वो कब आईं, मुझे पता नहीं। उनके हाथ में पानी की बोतल थी और उनका चेहरा डरा हुआ था।
करण ने उन्हें देखा।
और फिर जो हुआ, वो मैं भूल नहीं सकता। वो औरत के पैरों पर गिरा। नहीं, गिरा नहीं — वो उसके सामने बैठ गया, घुटनों के बल, और उसने अपना सिर उसकी गोद में रख दिया। और रोया। ऐसे रोया जैसे बीस साल का रोना एक साथ बाहर आ रहा हो। काँधे हिल रहे थे, हाथ उसकी साड़ी की गाँठ पकड़े हुए थे, और आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी बच्चे की हो जो रास्ता भूल गया हो और अब घर पहुँच गया हो।
गंगा देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा। उनका हाथ धीरे से उसके बालों में फिरा। उनके होंठ हिले, पर कोई आवाज़ नहीं निकली। उनकी आँखों से पानी गिर रहा था और वो पोंछ भी नहीं रही थीं।
मैं वहीं खड़ा रहा। दूर, जीप के दूसरी तरफ़, इंस्पेक्टर शर्मा ने अपना मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया। उनके सिपाही भी।
कुछ देर बाद करण का रोना धीमा हुआ। उसने अपना सिर उठाया, आँखें लाल, नाक बह रही थी। वो अपनी आस्तीन से मुँह पोंछने लगा, और गंगा देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया और अपनी साड़ी के कोने से उसका चेहरा पोंछा।
"माँ," करण ने कहा। उसकी आवाज़ बैठ गई थी। "माँ, अब हम घर चलें।"
गंगा देवी ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया और उसके माथे पर होंठ रख दिए।
"चल," उन्होंने कहा। "घर चलते हैं।"
गंगा देवी ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था जो मुझे समझ नहीं आया। जैसे वो मुझसे कुछ कहना चाह रही हों पर शब्द न हों। उन्होंने सिर हिलाया, बस।
"वीर," उन्होंने कहा, "तू भी आ। आज हमारे घर खाना खा।"
"माँ," करण ने कहा, थोड़ा हँसते हुए, आवाज़ अभी भी गीली थी, "खाना बनाना पड़ेगा पहले।"
गंगा देवी ने उसके गाल पर हल्की चपत लगाई।
"मैं जानती हूँ खाना बनाना है," उन्होंने कहा। "तेरे बाप के घर में रहकर मैंने रसोई करना नहीं छोड़ा।"
यह सुनते ही करण हँसा। असली हँसी, वो हँसी जो रोने के बाद आती है और जो सबसे साफ़ होती है। मैं भी हँसा। और वो पल अजीब था — जेल के सामने, धूल में, करण की आँखें लाल और हँसी उसके मुँह पर।
हम जीप में बैठे। करण बीच में, गंगा देवी एक तरफ़, मैं दूसरी तरफ़। करण ने अपना सिर माँ के कंधे पर रख दिया और आँखें बंद कर लीं। गंगा देवी ने उसके बाल सहलाए, और उनकी उँगलियाँ धीरे-धीरे चल रही थीं, किसी पुराने गीत की तरह।
रास्ते में गंगा देवी ने कुछ नहीं कहा। करण सो गया, या सोने का नाटक किया। मैं खिड़की से बाहर देखता रहा — खेत, नीम के पेड़, दूर नहर की चमक। और मेरे दिमाग़ में एक ही नाम घूम रहा था।
टिंकू।
मैंने गंगा देवी की तरफ़ देखा। उनकी आँखें बंद थीं, पर वो सोई नहीं थीं। उनके होंठ हिल रहे थे, कुछ गुनगुना रही थीं।
"गंगा देवी," मैंने धीरे से कहा, इतना धीरे कि करण न सुने।
उन्होंने आँखें खोलीं।
"टिंकू," मैंने कहा। "वो सच में… भैरव का बेटा है?"
गंगा देवी ने करण के सिर पर हाथ रखा, फिर मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में थकान थी।
"मैंने तुझे तेरी माँ की बात बताई थी," उन्होंने कहा। "अब टिंकू की बात सुन। भैरव ने उसे कभी नहीं अपनाया। जब वो पैदा हुआ, भैरव ने उसे सुक्खी के पास छोड़ दिया और कहा — 'इसे पाल, मेरा नाम मत लेना।' टिंकू को आज तक नहीं पता था कि उसका बाप कौन है। वो सुक्खी की बेटी के साथ बड़ा हुआ, उसी की रोटी खाई। और भैरव ने उसे कभी अपना बेटा कहकर नहीं बुलाया।"
मेरे सीने में कुछ जलने लगा।
"तो भैरव ने उसका नाम काग़ज़ में क्यों लिखा? मरने से पहले?"
गंगा देवी ने अपनी आँखें बंद कीं। "क्योंकि मरते वक़्त आदमी अपने पाप गिनता है। भैरव ने टिंकू को कभी नहीं दिया जो उसका हक़ था। और अब उसने सोचा कि काग़ज़ पर नाम लिखकर वो सब भर देगा।"
मैंने खिड़की से बाहर देखा। सड़क का मोड़ आया और गाँव की छतें दिखने लगीं। मेरे दिल में एक ही बात थी — टिंकू को कैसे बताऊँ? वो मेरा दोस्त है, मेरा भाई, मेरी खीर वाला टिंकू। और मैंने उसके बारे में ऐसी बात सुनी है जो उसके पूरे जीवन को बदल देगी।
जीप गाँव में घुसी तो धूल उड़ी। कुछ लोग बाहर आ गए। करण की आँखें खुलीं और उसने अपना सिर उठाया।
"कहाँ जा रहे हैं?" उसने पूछा।
"तेरे घर," मैंने कहा। "माँ के साथ। खाना खाने।"
करण ने गंगा देवी की तरफ़ देखा और कुछ ऐसा मुस्कुराया जो मैंने उसके चेहरे पर पहली बार देखा।
अखाड़े के पास पहुँचकर मैंने जीप रोकी। मुझे टिंकू की दुकान जानी थी। मैं उतरा और गंगा देवी से कहा कि मैं अभी आता हूँ।
"वीर," गंगा देवी ने कहा, "टिंकू को अभी मत बता। आज उसके लिए बहुत है।"
मैंने सिर हिलाया और चल पड़ा।
दुकान का टीन का शेड दूर से दिख रहा था। धूप में टीन चमक रहा था। और टिंकू शेड के नीचे बैठा था, एक हाथ में पेंसिल, दूसरे में कॉपी, और उसकी टोपी आँखों पर तिरछी। उसने मुझे देखा तो खड़ा हो गया।
"अरे भाई!" उसकी आवाज़ में वो पुरानी चहक थी। "कहाँ था? मैंने सुना जेल गया था। तेरे लिए कुछ खास बनाया है — इमरती, पर इसमें मैंने थोड़ा अदरक डाला है। तू बता, अदरक इमरती में?"
मेरे गले में कुछ अटक गया।
"टिंकू," मैंने कहा।
"हाँ? पहले बता, अदरक ठीक है? मैंने सोचा सर्दी के लिए अच्छा है, तू कहता है ना मसाले से जान आती है।"
"टिंकू।"
वो रुका। उसने मेरी आवाज़ पकड़ी, और फिर उसकी चहक कुछ धीमी हुई।
"क्या हुआ?" उसने पूछा। "माँ ठीक है? गुड़िया ठीक है?"
"सब ठीक हैं।" मैंने एक साँस ली। "मैं तुझे कुछ बताना चाहता हूँ। पर पहले तू मुझसे वादा कर कि तू अपनी दुकान नहीं जलाएगा।"
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