Spirit of a Fighter – Chapter 1190
करण ने मेरे हाथ को देखा, फिर मेरी आँखों को।
उसकी साँस धीमी हुई।
"तू मेरे साथ चलेगा?" उसने पूछा।
"हाँ," मैंने कहा। "पर आज नहीं। कल। जब तू शांत होगा और वो भी।"
उसने अपना सिर हिलाया। उसकी आँखें भर आई थीं।
हम जेल से बाहर आए। सूरज सिर पर आ चुका था और ज़मीन तप रही थी। करण जीप में चुपचाप बैठ गया और खिड़की से बाहर देखने लगा।
मैं जीप में बैठने ही वाला था कि इंस्पेक्टर शर्मा ने मेरा कंधा छुआ।
"वीर सिंह," उन्होंने कहा, "एक बात और है।"
मैं रुका।
"हमने भैरव के सेल की तलाशी ली," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी थी। "उसकी चारपाई के नीचे, टाइल के नीचे, एक और काग़ज़ मिला है। और उस पर जो लिखा है, वो मुझे तुम्हें देना चाहिए।"
मेरे पेट में फिर वो ठंडी गाँठ बनी।
"क्या है?"
"ये काग़ज़ भैरव का नहीं है," इंस्पेक्टर ने कहा। "ये किसी और के हाथ का है। और उस पर तारीख़ है — बीस साल पुरानी तारीख़। और उस पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी है।"
उन्होंने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
मैंने उसे खोला। मेरे हाथ काँप रहे थे।
उस पर बीस साल पुरानी स्याही से लिखा था:
"अगर भवानी नहीं माना, तो उसके बेटे को उसके सामने मार देना।"
मेरे पैरों के नीचे ज़मीन खिसक गई। ये लिखाई मैंने पहले भी देखी थी — तहखाने की दीवार पर, मिटे हुए नाम के नीचे। ये वही हाथ था। ये वही आदमी था।
"ये लिखाई," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई, "जगदीश सिंह की है।"
इंस्पेक्टर ने अपना सिर हिलाया।
"लगता है," उन्होंने कहा, "जगदीश सिर्फ़ भवानी की मौत के पीछे नहीं था। वो तुम्हारे पीछे भी था। बीस साल से।"
मैंने पीछे मुड़कर जीप की तरफ़ देखा। करण खिड़की से बाहर देख रहा था, अनजाने में अपनी चाँदी की चेन को उँगलियों में घुमा रहा था।
और मुझे लगा — जगदीश सिंह ज़िंदा है। और वो आज भी उसी इंतज़ार में है जिसका इंतज़ार वो बीस साल से कर रहा है।
मैंने काग़ज़ अपनी जेब में रखा और जीप की तरफ़ बढ़ा। मेरे हाथ अभी भी काँप रहे थे, पर मेरे पैर अब साफ़ थे। मुझे पता था कि आगे क्या करना है।
पर मुझे ये नहीं पता था — कि अगला कदम उठाने से पहले, मुझे उस आदमी से मिलना होगा जो मेरे घर में बैठा है, मेरी माँ की बनाई रोटी खा रहा है, और जिसके हाथ में वो चाँदी की अंगूठी हो सकती है जिसका नाम अभी तक कोई नहीं जानता।
टिंकू।
॥
टिंकू।
उसका नाम मेरी ज़ुबान पर था और मैं जीप की तरफ़ बढ़ रहा था, और मेरा दिमाग़ किसी और ही रास्ते पर भाग रहा था। जीप में करण बैठा था, खिड़की से बाहर देखता हुआ, चाँदी की चेन को उँगलियों में घुमाता हुआ। उसकी उँगलियाँ रुकी हुई थीं, पर चेन घूम रही थी। जैसे उसके अंदर कुछ हो रहा हो जिसे वो रोक नहीं पा रहा।
मैं जीप के पास पहुँचा और खिड़की पर हाथ रख दिया।
"करण।"
उसने मुँह नहीं फेरा। बस आँखें थोड़ी सिकोड़ी।
"मुझे पता है तू क्या सोच रहा है," मैंने कहा। "तू सोच रहा है कि मैं तुझे रोक रहा हूँ क्योंकि मुझे तेरे बाप से डर है।"
अब उसने मुँह फेरा। उसकी आँखों में वो सूखा गुस्सा था जो रोने से पहले आता है।
"नहीं," मैंने कहा। "मैं तुझे रोक रहा हूँ क्योंकि मैं तेरी जगह खड़ा हो चुका हूँ। मैं जानता हूँ उस कमरे की हवा कैसी होती है। मैं जानता हूँ कि जब तू सामने बैठे आदमी को देखता है, तो तेरे हाथ में कुछ चीज़ ऐसी आ जाती है जिसे तू फेंकना चाहता है, पर वो तेरे ही सीने पर लग जाती है।"
करण ने कुछ नहीं कहा। पर चेन घुमाना बंद हो गया।
"आज मैं तेरे साथ अंदर चलूँगा," मैंने कहा। "मैं तेरे पीछे खड़ा रहूँगा, तेरे आगे नहीं। जो बोलना है तू बोलेगा। पर जब तेरी आवाज़ टूटेगी, तब मैं तेरे कंधे पर हाथ रखूँगा। बस इतना।"
करण ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था और वो उसे पोंछ नहीं रहा था। शायद इसलिए कि पोंछने से वो हार मान लेता।
"ठीक है," उसने कहा।
जेल का दरवाज़ा हमारे पीछे बंद हुआ तो आवाज़ ऐसी आई जैसे कोई बड़ा संदूक ढक गया हो। अंदर की हवा में लोहा, पसीना और गीली दीवार की बू थी। मेरी नाक ने एक और गंध पकड़ी — तेल। वही तेल जो भैरव की मूँछों के सिरों पर रहता था। अंदर आते ही वो गंध सबसे पहले आई।
सेल की सलाखें दूर से चमक रही थीं। भैरव सिंह ज़मीन पर बैठा था, पीठ दीवार से टिकाई हुई, घुटने मोड़े हुए। हथकड़ी की ज़ंजीर उसकी कलाई से पिंडली तक जाती थी। उसका बड़ा शरीर अब भी बड़ा था, पर कुछ ऐसा था जो सिकुड़ गया था। धोती मैली थी। सोने की चेन गले में नहीं थी।
उसने सिर उठाया।
करण सलाखों के सामने खड़ा था। उसकी पीठ सीधी थी, कंधे तने हुए। मैं उसके पीछे खड़ा था, एक कदम पीछे।
भैरव ने पहले मुझे देखा, फिर करण को। और जो हुआ, वो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। उसका चेहरा बदला। मीठी आवाज़ वाला आदमी, ठंडी आँखों वाला आदमी, उसके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो सालों से छुपा था। उसने अपना हाथ ज़ंजीर के साथ उठाया, जैसे अंदर आने की कोशिश कर रहा हो, फिर रोक लिया।
"तू आया," भैरव ने कहा। उसकी आवाज़ फटी हुई थी। "मैंने सोचा था तू नहीं आएगा।"
करण ने उसकी आवाज़ सुनी और एक पल के लिए उसका शरीर हिला। फिर वो संभला।
"मैं सवाल पूछने आया हूँ," करण ने कहा। "जवाब दे।"
भैरव ने सिर हिलाया। "पूछ।"
"तूने माँ को क्यों भगाया?"
भैरव चुप रहा।
"मैं पूछ रहा हूँ," करण की आवाज़ ऊपर गई। "तूने उसे क्यों भगाया? वो तेरे पास थी। वो तेरे साथ रहती थी। वो तेरी बीवी नहीं थी, पर वो मेरी माँ थी। तुझे क्या ज़रूरत थी उसे भगाने की?"
भैरव ने अपनी आँखें बंद कीं। जब खोलीं, उनमें वो ठंडक नहीं थी। थकान थी।
"वो मेरे पास से चली गई थी," भैरव ने कहा। "मैंने उसे नहीं भगाया। वो खुद गई थी।"
"झूठ।"
"झूठ नहीं।" भैरव ने धीरे से सिर हिलाया। "जिस दिन उसे पता चला कि मैं पहलवानों को क्या पिलाता हूँ, उस दिन वो मेरे मुँह पर थूककर चली गई। और तू उस वक़्त छोटा था। तुझे क्या पता।"
करण की साँस रुकी। मैंने उसके कंधे को देखा, वो तना हुआ था।
"तू झूठ बोल रहा है," करण ने कहा, पर उसकी आवाज़ में वो ज़ोर नहीं था।
"मैं झूठ बोलता हूँ," भैरव ने कहा, "पर आज नहीं। आज मेरे पास झूठ बोलने का वक़्त नहीं है। तू मेरे सामने खड़ा है, और मैं जानता हूँ कि तू फिर नहीं आएगा। तो सुन ले। तेरी माँ ने मुझे छोड़ा। तूने मुझे नहीं छोड़ा — तुझे छोड़ दिया गया। मैंने तुझे उसके पास से छीन लिया, ये सच है। पर मैंने तुझे इसलिए नहीं छीना कि मैं तुझसे प्यार करता था। मैंने तुझे इसलिए छीना कि तू मेरा बेटा था और मेरे पास तेरे सिवा कुछ नहीं था।"
करण ने एक कदम पीछे किया। फिर रुका।
"अब मेरा सवाल," करण ने कहा, और उसकी आवाज़ अब ठंडी थी। "तूने उन पहलवानों को ज़हर क्यों दिया?"
भैरव ने उसकी तरफ़ देखा। लंबा देखा।
"ताकि तू बड़ा पहलवान बन सके," उसने कहा। "मेरे पास पैसा होता, तो तेरे पास अखाड़ा होता। तेरे पास अखाड़ा होता तो तू किसी के सामने हाथ नहीं फैलाता।"
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