Spirit of a Fighter – Chapter 1189
मैंने अपनी जेब से काग़ज़ निकाला और उसके सामने रख दिया।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
उसने काग़ज़ की तरफ़ देखा, फिर अपनी आँखें बंद कर लीं।
"तू पढ़ नहीं सकता?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ रेत की तरह घिसी हुई थी।
"मैंने पढ़ लिया। अब तू बोल — टिंकू कौन है?"
वो कुछ देर चुप रहा। उसकी साँस धीमी थी, और हर साँस के साथ उसकी छाती ऊपर-नीचे होती थी।
"मेरा बेटा," उसने कहा।
मुझे लगा ज़मीन मेरे पैरों के नीचे से खिसक गई।
"तू झूठ बोल रहा है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ ऊँची हो गई। "टिंकू मेरे घर में बड़ा हुआ। सुक्खी बुआ ने उसे पाला। उसकी माँ है — सुक्खी बुआ।"
"सुक्खी उसकी माँ नहीं है," भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना — एक अजीब-सी हार। "सुक्खी ने उसे पाला, ये सच है। पर उसे जन्म मैंने दिया था। उसकी माँ… उसकी माँ को मैंने आख़िरी बार उस वक़्त देखा था जब वो उसे जन्म दे रही थी। और फिर वो चली गई।"
"कौन?"
"एक औरत," उसने कहा, और उसकी आवाज़ और धीमी हो गई। "उसका नाम मत पूछ। मुझे भी पूरा नहीं पता। वो कुछ दिन रही, फिर जब टिंकू दो साल का था, वो उसे लेकर चली गई। मैंने बहुत ढूँढा। फिर पता चला कि वो मर गई, और बच्चा सुक्खी के पास है।"
मैंने अपने हाथों को मुट्ठी में भींचा।
"तूने मुझे क्यों नहीं बताया? तू बीस साल से जानता था कि टिंकू मेरे घर के पास रहता है, मेरे साथ खाता है, मेरी बहन को हँसाता है। और तूने कभी नहीं बताया?"
"क्यों बताता?" भैरव ने कहा, और उसने अपनी आँखें खोलीं। उनमें लाल डोरे थे। "मैं तुझे क्या बताता? कि मेरा बेटा तेरे घर में खाना खाता है? तू तो मुझे जानता ही नहीं था। तू तो मेरे अखाड़े की दीवार के बाहर खड़ा लड़का था।"
"वो मेरा दोस्त है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँप गई। "वो मेरा भाई है। मैंने उसे अपने से ज़्यादा भरोसा दिया।"
"तो ये तेरी ग़लती है," भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ में पुरानी कड़वाहट लौट आई। "मुझ पर क्यों गुस्सा करता है? मैंने तो उसे कभी तेरे पास नहीं भेजा। वो खुद गया। वो तेरे पास आया क्योंकि उसे तेरे साथ रहना अच्छा लगा। और मैंने उसे रोका नहीं। क्योंकि मुझे लगा कि कम से कम वो किसी अच्छे आदमी के साथ है।"
मैं उसके सामने बैठ गया। ज़मीन ठंडी थी। मेरे घुटने उससे छू रहे थे।
"तूने अपने बेटे के लिए ज़हर बेचा," मैंने कहा। "तूने बीस साल में उन्नीस पहलवानों को मार डाला। तूने रणवीर सिंह को व्हीलचेयर पर बिठा दिया। तूने भवानी सिंह को — मेरे बाप को — ज़हर दिया और उसकी हड्डियाँ कुएँ में फेंक दीं। ये कौन सा प्यार है?"
भैरव ने अपना सिर नीचे कर लिया।
कुछ देर तक सेल में सिर्फ़ उसकी साँस की आवाज़ आती रही। बाहर गलियारे में किसी सिपाही के जूतों की आवाज़ आई और चली गई।
"मैंने सोचा था," भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, "कि जब टिंकू बड़ा होगा, मैं उसके लिए अखाड़ा बना दूंगा। एक ऐसा अखाड़ा जिसमें कोई उसे नहीं हरा सकेगा। मैंने सोचा था कि ताकत मैं उसे दूंगा — और वो मेरा नाम रोशन करेगा।"
"उसको ताकत नहीं चाहिए," मैंने कहा। "उसे तो मिठाई बनानी है। उसे तो बस अपनी दुकान चाहिए। उसने कभी तुझसे अखाड़ा नहीं माँगा।"
भैरव ने अपना सिर उठाया।
"मुझे पता है," उसने कहा। "और यही मेरा सबसे बड़ा पछतावा है। मैंने उसे बीस साल तक ये नहीं बताया कि वो मेरा बेटा है। क्योंकि मुझे डर था कि अगर वो जान गया, तो वो मुझसे नफ़रत करेगा। और उसके मन में मेरे लिए नफ़रत न हो, इसके लिए मैंने ये सब किया।"
उसकी आवाज़ अटक गई।
मैंने देखा — उसकी आँखों से एक बूँद गिरी। फिर दूसरी। वो रो रहा था, बिना आवाज़, बिना शोर। बस उसकी छाती काँप रही थी और उसकी बड़ी मूँछें भीग रही थीं।
मैं खामोश बैठा रहा। मुझे नहीं पता था कि क्या कहना चाहिए। मेरे दिल में गुस्सा था, और उसके नीचे कुछ और भी था — एक अजीब-सी तरस, जो मैं दबाना चाहता था पर दबा नहीं पा रहा था।
"करण को मेरे पास मत आने देना," भैरव ने अचानक कहा, और उसकी आवाज़ फट गई। "मैं उसके सामने अपना चेहरा नहीं दिखा सकता। मैंने उसे बीस साल तक भैरव का बेटा बनकर जिया। अब जब वो जान गया कि उसका बाप जगदीश था, तो मेरे पास कुछ नहीं बचा।"
"वो तुझसे मिलने आया है," मैंने कहा।
"मैं नहीं मिलूँगा," उसने कहा, और उसने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया। "उससे कह देना कि भैरव मर गया।"
मैं उठकर खड़ा हो गया। मेरे पैर सुन्न थे। मैंने एक बार उसकी तरफ़ देखा — वो ज़मीन पर बैठा था, और उसका भारी शरीर अब भारी नहीं लग रहा था। वो बस एक बूढ़ा आदमी लग रहा था, जिसने अपनी ज़िंदगी एक ऐसी चीज़ के पीछे गँवा दी जो उसने कभी पाई ही नहीं।
मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। मेरा हाथ दरवाज़े के हैंडल पर पड़ा।
फिर मैं रुका।
मैं पलटा।
"भैरव सिंह," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो तेज़ी नहीं थी जो पहले थी। "मैं तुझसे नफ़रत नहीं करता।"
उसने अपना सिर उठाया, और उसकी आँखें मुझ पर टिक गईं।
"मैं तेरे किए से नफ़रत करता हूँ," मैंने कहा। "जो तूने मेरे बाप के साथ किया, जो तूने उन पहलवानों के साथ किया जिनके घर में आज कोई चूल्हा नहीं जलता — उससे मुझे नफ़रत है। पर तुझसे नहीं। क्योंकि तू जो है, वो तेरे किए से बड़ा नहीं है। तू बस एक डरा हुआ आदमी है, जिसने अपने डर को ज़हर बनाकर दूसरों को पिलाया।"
उसकी आँखों में कुछ और बूँदें आईं।
"पर करण के बारे में," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ सख़्त हो गई, "तू ग़लत सोच रहा है। वो तेरा बेटा है। जगदीश का हो या तेरा — वो तेरा बेटा है, क्योंकि उसने बीस साल तुझे बाप माना है। और वो तुझसे मिलना चाहता है। ये तेरा हक़ नहीं कि तू उसे मना करे। ये उसका हक़ है कि वो तुझसे वो सब पूछे जो वो पूछना चाहता है।"
भैरव ने अपना सिर झुका लिया। उसने कुछ नहीं कहा।
मैं दरवाज़े से बाहर आ गया।
बाहर गलियारे में करण दीवार से टिका खड़ा था। उसका चेहरा पीला था और उसकी मुट्ठियाँ भींची हुई थीं। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"उसने क्या कहा?" उसने पूछा।
मैंने एक पल सोचा। मैं झूठ बोल सकता था। मैं कह सकता था कि भैरव ने कुछ नहीं कहा। पर मैंने सोचा — अगर मैं उससे झूठ बोलूँगा, तो मैं उसी रास्ते पर चल पड़ूँगा जिस पर भैरव चला था।
"उसने कहा," मैंने धीरे से कहा, "कि तू उससे मिलने मत जाना।"
करण की आँखों में कुछ बदला। उसने अपना हाथ दीवार पर दे मारा। दीवार से धूल झर गई।
"तो मैं अभी जाऊँगा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो आग थी जो सिर्फ़ बीस साल के धोखे से आती है। "और उससे वो सब पूछूँगा जो तूने मुझसे छुपाया।"
वो सेल की तरफ़ बढ़ा।
इंस्पेक्टर शर्मा ने उसका रास्ता रोका।
"बेटा," उन्होंने कहा, "अभी नहीं। अभी वो मिलने की हालत में नहीं है।"
"मुझे परवाह नहीं," करण ने कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी। "मुझे बीस साल की परवाह नहीं है। मैं अभी उससे बात करूँगा।"
मैंने उसका कंधा पकड़ा।
"करण," मैंने कहा, "मैंने भी अपने बाप से बीस साल बाद बात की थी। उस वक़्त मेरे हाथ काँप रहे थे और मैं रो रहा था। तू अभी गुस्से में है। अगर तू इस हालत में अंदर जाएगा, तो तू वो बात कह देगा जो तुझे कहनी नहीं है। और फिर तुझे ता-उम्र याद रहेगा कि तूने अपने बाप से आख़िरी बार क्या कहा था।"
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