Spirit of a Fighter – Chapter 1188
"वीर सिंह," काग़ज़ पर लिखा था, "अगर तू ये पढ़ रहा है, तो मैं मर चुका हूँ। और अगर मैं मर गया, तो तू समझ लेना कि उस रात का असली सच कोई नहीं जानेगा। क्योंकि जिसने भवानी को मारा, वो मेरा भाई नहीं था — वो मेरा बेटा था। और मेरा बेटा आज तेरे घर में रह रहा है।"
मेरे हाथ से काग़ज़ गिर गया।
"कौन?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ फटी हुई थी।
इंस्पेक्टर ने अपना सिर हिलाया।
"वो नहीं बोला। पर एक और काग़ज़ मिला है — नीचे ज़मीन में छिपा हुआ, सेल की टाइल के नीचे। उसमें एक नाम है।"
उन्होंने दूसरा काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
मैंने उसे खोला।
उस पर एक नाम था — "करण।"
मेरी साँस रुक गई।
पर इंस्पेक्टर ने अपनी उँगली उस नाम के नीचे रखी, और वहाँ एक और नाम लिखा था — छोटा, मिटा हुआ, जैसे लिखकर फिर मिटा दिया गया हो।
"ये नाम," इंस्पेक्टर ने कहा, "हमने मिटाया नहीं। ये भैरव ने खुद मिटाया था — पर स्याही ज़मीन पर छोड़ गई।"
मैंने उस मिटे हुए नाम को देखा। मेरी आँखें धुँधली हो रही थीं।
"पढ़ो," इंस्पेक्टर ने कहा।
मैंने पढ़ा।
और जो नाम मैंने पढ़ा, वो मेरे पैरों के नीचे ज़मीन खींच ले गया।
"टिंकू।"
॥
"टिंकू।"
वो नाम मेरी ज़ुबान से निकला, और मुझे लगा कि कोई मेरे सीने पर पत्थर रख गया है। आँगन में खड़े सब लोग मेरी तरफ़ देख रहे थे। माँ के हाथ से हल्दी की कटोरी फिसलकर ज़मीन पर गिरी और चटक गई। कोई बोला नहीं।
मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ा। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं। मिटे हुए नाम के नीचे स्याही की परत ज़मीन पर उतर आई थी, और मैं उसे देख रहा था, और मेरा दिमाग़ सिर्फ़ एक ही बात दोहरा रहा था — टिंकू। मेरा टिंकू। जिसने रोज़ सुबह चुपके से खीर लाकर मेरे हाथ में रख दी। जिसने कहा था, "भाई, कल से कसरत शुरू करूंगा।" जिसने अखाड़े के तहखाने में लोहे का डंडा लेकर ठाकुर का रास्ता बंद कर दिया था।
"ये… ये ग़लत है," मैंने कहा। "टिंकू भैरव का बेटा नहीं हो सकता।"
इंस्पेक्टर शर्मा ने अपना चश्मा उतारा और आँखें मलीं।
"वीर सिंह," उन्होंने धीरे से कहा, "मैं सिर्फ़ वही बता रहा हूँ जो काग़ज़ में लिखा है। भैरव ने ये नाम खुद मिटाया था। पर उसके नीचे करण का नाम छपा था। दोनों नाम एक ही स्याही से लिखे गए हैं।"
"तो इसका मतलब ये नहीं कि—"
"इसका मतलब कुछ भी नहीं," इंस्पेक्टर ने कहा। "जब तक भैरव खुद न बोले। और वो अभी बोल नहीं रहा।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर था जो मैंने बहुत कम देखा था — बीस साल पुराना डर, जो कभी गया नहीं।
"मैं जेल चलता हूँ," मैंने कहा।
"मैं भी चलूँगा," करण ने कहा। वो दरवाज़े के पास खड़ा था, गंगा देवी का हाथ पकड़े हुए।
"नहीं," गंगा देवी ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो मिठास नहीं थी जो सुक्खी बुआ की आवाज़ में थी। ये कोई और औरत थी। "तू वहाँ नहीं जाएगा। भैरव तेरा बाप नहीं है। मैंने तुझे जगदीश से पैदा किया था।"
करण ने अपना हाथ छुड़ाया।
"माँ," उसने कहा, "मैं बीस साल से यही सोचता आया हूँ कि मैं किसका बेटा हूँ। आज तक कोई सीधा जवाब नहीं मिला। अब मैं खुद जाकर पूछूँगा।"
गंगा देवी ने उसकी तरफ़ देखा, और उनकी आँखें भर आईं। पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस उसका हाथ फिर से पकड़ लिया, इस बार ज़्यादा ज़ोर से।
हम तीन — मैं, करण और इंस्पेक्टर — गाँव की पगडंडी से निकलकर मुख्य सड़क पर आए। टिंकू पीछे रह गया था। मैंने उसे बुलाया नहीं। और उसने खुद आने की ज़िद नहीं की। यही सबसे ज़्यादा खटक रहा था। अगर वो सच में मेरा भाई था, अगर वो सच में कुछ छुपा रहा था, तो उसे मेरे साथ चलना चाहिए था। उसे मेरी आँखों में देखकर कहना चाहिए था — "भाई, मुझे भी पता नहीं।"
पर वो चुपचाप आँगन की दीवार से टिका खड़ा रहा, और उसने अपनी टोपी उतारकर हाथ में पकड़ ली थी।
जीप में बैठकर हम ज़िले की जेल की तरफ़ चले। सड़क के दोनों तरफ़ सूखे खेत थे, और हवा में धूल थी। करण खिड़की से बाहर देख रहा था, उसका जबड़ा कसा हुआ था। मैंने एक बार उसकी तरफ़ देखा। उसकी गर्दन पर चाँदी की चेन चमक रही थी — वही चेन जो जग्गू ने कुएँ में देखी थी। सोचकर मेरा सिर भारी हो गया।
"करण," मैंने कहा।
वो पलटा।
"तेरी माँ ने बताया कि तू जगदीश का बेटा है। फिर भैरव के काग़ज़ में तेरा नाम क्यों है?"
वो कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "क्योंकि भैरव ने मुझे पाला है। जब मेरे बाप गायब हुए, मैं छोटा था। भैरव ने मेरी माँ को अखाड़े से निकाल दिया और मुझे अपने पास रख लिया। वो मुझे अपना बेटा बताकर बड़ा करता रहा। मैं सोलह साल का था जब उसने पहली बार मुझे बताया कि मैं उसका बेटा हूँ।"
"और तूने यकीन कर लिया?"
"मैंने किससे पूछता?" करण ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो सिर्फ़ बीस साल के अंधेरे से आती है। "मेरी माँ कहीं खो गई थी। मेरे बाप का कोई पता नहीं था। भैरव ही वो आदमी था जो रोज़ मेरे सामने खड़ा मिलता था। उसने मुझे खाना दिया, कपड़े दिए, कुश्ती सिखाई। मैंने सोचा — अगर ये मेरा बाप है, तो कम से कम कोई तो है।"
मैं चुप हो गया। जीप की छत पर धूल की एक परत जमी थी, और उसमें से रोशनी छनकर अंदर आ रही थी। मुझे अपना बचपन याद आया — वो दिन जब मैं अखाड़े की दीवार के बाहर खड़ा रहता था, और अंदर से मिट्टी की गंध आती थी, और मैं सोचता था कि काश मेरा भी कोई होता जो मुझे अंदर ले चलता।
"मुझे पता है," मैंने कहा। "किसी का न होना कैसा लगता है।"
करण ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ नरम हुआ।
जेल का गेट खुला था, पर अंदर की हवा बंद थी। दीवारें ऊँची और पीली थीं, और हर कोने पर सिपाही खड़े थे। इंस्पेक्टर शर्मा हमें आगे ले चले। रास्ते में एक अफ़सर ने उन्हें रोका और कुछ धीरे से कहा।
इंस्पेक्टर का चेहरा बदल गया।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"भैरव सिंह," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ भारी थी। "वो बच गया। रस्सी टूट गई।"
"कैसे?"
"हमें नहीं पता," इंस्पेक्टर ने कहा। "रस्सी पुरानी थी, पर इतनी भी नहीं कि टूट जाए। किसी ने कुछ किया है।"
मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई।
"वो मरना नहीं चाहता," इंस्पेक्टर ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो बहुत दिनों की जागी रातों से आती है। "वो सिर्फ़ सबको डराना चाहता है। खुद को मारकर भी वो यही चाहता है — कि हम सब सोचें कि सच उसके साथ चला गया।"
हम सेल के बाहर पहुँचे। लोहे का दरवाज़ा खुला था। अंदर लालटेन की पीली रोशनी थी, और एक कोने में चारपाई पड़ी थी जिसकी एक रस्सी टूटी हुई लटक रही थी।
भैरव सिंह ज़मीन पर बैठा था।
मैंने उसे पहली बार इस हालत में देखा। उसका भारी शरीर ढीला पड़ गया था, जैसे किसी ने उसके अंदर से हवा निकाल दी हो। उसकी बड़ी तेल लगी मूँछें बिखरी हुई थीं, और गले पर रस्सी की लाल लकीर साफ़ दिख रही थी — जैसे किसी ने उसके गले पर लाल धागा बाँध दिया हो। उसके बाल बिखरे हुए थे, और उसकी आँखें…
उसकी आँखें पहली बार बूढ़ी लग रही थीं।
जब मैंने उसे आख़िरी बार देखा था, तब वो तहखाने में हथकड़ी में खड़ा था और बोल रहा था — "अब नाम लो, मैं सुनने आया हूँ।" उस वक़्त उसकी आवाज़ में गरज थी। आज उसकी आवाज़ नहीं थी। सिर्फ़ साँस थी, जो रुक-रुककर आ रही थी।
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