Spirit of a Fighter – Chapter 1187
"गंगा देवी ने ये लिखा था," मैंने कहा। "क्यों?"
"क्योंकि वो जानती थी," हरनाम ने कहा, "कि भैरव उसे मार डालेगा। और वो चाहती थी कि सच किसी के हाथ में रहे। इसलिए उसने ये काग़ज़ भैरव की अलमारी में रख दिया, ताकि जिस दिन अलमारी खुले, सच बाहर आए। पर भैरव ने उसे जला दिया। और मैंने जलते हुए काग़ज़ को आग से निकाल लिया।"
"क्यों?" मैंने पूछा। "तू तो भैरव का आदमी है।"
हरनाम ने अपनी जेब से रूमाल निकाला और अपना माथा पोंछा।
"क्योंकि मेरी बेटी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ रुँध गई, "मेरी बेटी अंजली, बीस साल पहले इसी ज़हर से बीमार पड़ी थी। भैरव ने मुझे वो पानी दिया था — कहा था ताकत बढ़ेगी। मैंने अपनी बेटी को दिया। और वो तीन महीने अस्पताल में रही। तब से मैं भैरव के साथ हूँ — पर उससे नफ़रत करता हूँ।"
अंजली ने अपने बाबा को देखा, और उसकी आँखों में आँसू थे।
"तो आपने मुझे क्यों नहीं बताया?" उसने कहा।
"क्योंकि भैरव ने धमकी दी थी," हरनाम ने कहा। "अगर मैंने कुछ बोला, तो वो तुझे दोबारा वो पानी पिला देगा।"
आँगन में सन्नाटा छा गया।
मैंने हरनाम को देखा। उसका चेहरा टूटा हुआ था, और उसकी आँखों में वो डर था जो मैंने अपनी माँ की आँखों में कभी नहीं देखा था।
"तो अब क्या होगा?" मैंने पूछा।
हरनाम ने अपना चश्मा वापस पहना।
"अब," उसने कहा, "मैं तुझे वो दूँगा जो मेरे पास है। पर एक शर्त पर।"
"शर्त?"
"मेरी बेटी को भैरव के जाल से बाहर निकाल। अंजली को कुछ न हो — चाहे मेरा कुछ भी हो जाए।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने एक बार सिर हिलाया।
"ठीक है," मैंने कहा।
हरनाम ने अपनी बाँह से एक और काग़ज़ निकाला — इस बार जेब से नहीं, अपनी बाँह से बँधा हुआ, कपड़े में लिपटा हुआ।
"ये असली काग़ज़ है," उसने कहा। "भवानी सिंह के हाथ का लिखा। इसमें भैरव का असली नाम है, उसके हर पहलवान का नाम है जिसे उसने ज़हर दिया, और उसका पता भी — वो जगह जहाँ उसने अपने काग़ज़ छिपाए हैं।"
मैंने काग़ज़ लिया। कपड़ा खोला। उस पर काली स्याही में लिखा था — बीस साल पुरानी लिखाई, ढीली पर मज़बूत, जैसे लिखने वाले का हाथ काँप रहा हो पर दिल नहीं।
मैंने वो पहली लाइन पढ़ी, और मेरी आँखें भर आईं।
"अगर मेरा बेटा ये पढ़ रहा है," काग़ज़ पर लिखा था, "तो उससे कहना — मैंने उसे पहलवान बनने के लिए नहीं भेजा था। मैंने उसे सच का आदमी बनने के लिए भेजा था।"
मैंने काग़ज़ माँ को दिया। माँ ने उसे दोनों हाथों से पकड़ा, जैसे कोई पवित्र चीज़ पकड़ते हैं। उनके आँसू काग़ज़ पर गिरे और स्याही फैल गई।
"भवानी," माँ ने धीरे से कहा, जैसे वो अभी सामने खड़े हों।
हरनाम ने एक कदम पीछे हटाया।
"अब मैं चलूँ?" उसने पूछा। "या तू मुझे भी बाँधेगा?"
मैंने उसे देखा। उसकी आँखों में डर था, पर अपनी बेटी के लिए।
"तू चल," मैंने कहा। "पर अंजली यहीं रहेगी। जब तक ये मामला खत्म नहीं होता, वो अखाड़े में रहेगी — मेरी माँ के पास। वहाँ उसे कोई नहीं छू सकता।"
हरनाम ने अंजली की तरफ़ देखा। अंजली ने उसका हाथ पकड़ा।
"बाबा," उसने कहा, "आप भी रुक जाइए।"
"नहीं, बेटा," हरनाम ने कहा, और उसकी आवाज़ भर्राई। "मैं वो आदमी हूँ जिसने बीस साल भैरव के साथ काम किया। मेरे हाथ पर वो दाग है जो धुल नहीं सकता। मैं जाऊँगा — पर पुलिस के पास। और जो मैंने देखा है, वो सब बताऊँगा।"
वो पलटा और चलने लगा। फिर रुका।
"वीर सिंह," उसने कहा, बिना पलटे। "वो काग़ज़ जो भैरव ने जलाया था — वो असली था। और उसमें रणवीर सिंह का नाम नहीं था। उसमें एक और नाम था, जो मैंने अभी तक किसी को नहीं बताया। और वो नाम है — कालू।"
मैं जम गया।
"क्या?" मेरी आवाज़ फूटी।
"कालू काका," हरनाम ने कहा, और अब वो पलटा। "भवानी ने लिखा था कि जो भी उसे ज़हर देने वालों में शामिल था, वो कालू भी था। क्योंकि उस रात कालू तहखाने में मौजूद था। और वो भागा नहीं — वो चुप रहा।"
मेरे पीछे कालू काका खड़े थे। उनकी लाठी हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिरी।
"कालू काका?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो सवाल था जो मैं पूछना नहीं चाहता था।
कालू काका ने अपना सिर झुका लिया।
"हाँ, बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो सालों की चुप्पी से आई है। "मैं वहाँ था। पर मैंने ज़हर नहीं दिया। मैंने बस… देखा। और डर गया।"
मैंने उनकी तरफ़ एक कदम बढ़ाया। मेरे हाथ काँप रहे थे।
"आपने देखा और कुछ नहीं किया?"
"मैंने अपने बेटे को खो दिया, बेटा," कालू काका ने कहा, और उनकी आँखों से पानी बह रहा था। "उस रात के बाद मैंने आधी ज़िंदगी यही सोचकर काटी कि काश मैं कुछ करता। पर मैंने कुछ नहीं किया। और ये मेरा पाप है।"
आँगन में फिर सन्नाटा छा गया।
मैंने मीरा को देखा। मीरा की आँखें भी भरी हुई थीं।
"वीर," उसने धीरे से कहा, "ये अभी का वक़्त नहीं है।"
मैंने गहरी साँस ली। मेरे पूरे शरीर में थकान थी, और मेरे हाथ अभी भी काँप रहे थे।
"कालू काका," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी, "आपने बीस साल मुझे मिट्टी सिखाई। आपने मुझे बताया कि मिट्टी झूठ नहीं बोलती। पर आज आपने खुद झूठ बोला। मुझे नहीं — अपने आप से।"
कालू काका ने अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया।
"पर," मैंने कहा, "आपने आज सच बताया। और ये भी बताया कि आपने क्यों चुप रहे। मैं आपको माफ़ नहीं कर सकता — ये मेरे बाप का हिसाब है, मेरा नहीं। पर मैं आपके साथ खड़ा रहूँगा। क्योंकि जो आदमी अपने पाप को कबूल कर ले, वो शुरुआत कर सकता है।"
कालू काका ने अपनी आँखें खोलीं, और उनमें वो कुछ था जो पहले नहीं था।
"बेटा," उन्होंने कहा, और अपनी लाठी उठाने की कोशिश की।
टिंकू ने उनकी लाठी उठाकर उनके हाथ में दी।
"कालू काका," टिंकू ने कहा, "आपका सच बोलना बहुत देर से आया, पर आया ज़रूर। अब अगले सच के लिए देर मत करना।"
कालू काका ने उसकी तरफ़ देखा और सिर हिलाया।
और तभी, आँगन के फाटक पर दो सिपाही आए। उनके पीछे इंस्पेक्टर शर्मा थे।
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनका चेहरा गंभीर था।
"वीर सिंह," इंस्पेक्टर ने कहा, "एक बात है।"
"क्या?"
"जेल से खबर आई है," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी थी। "भैरव सिंह ने रात में खुद को फाँसी लगाने की कोशिश की है।"
मेरे हाथ से काग़ज़ फिसल गया।
सब सन्न रह गए।
"बचा?" मैंने पूछा।
"बचा लिया," इंस्पेक्टर ने कहा। "पर वो बोल नहीं रहा। डॉक्टर कह रहे हैं कि उसका दम घुट गया है। वो अभी ज़िंदा है, पर उसके बोलने की हालत नहीं है।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। माँ का चेहरा पत्थर जैसा था।
"वो मरेगा नहीं," माँ ने धीरे से कहा। "वो मर नहीं सकता। वो बीस साल से ज़िंदा है — वो मरना नहीं जानता।"
इंस्पेक्टर शर्मा ने अपनी फाइल खोली।
"पर एक और बात है," उन्होंने कहा। "जब हमने उसका सेल खोला, तो उसकी चारपाई के नीचे से ये मिला।"
उन्होंने एक लिफाफा मेरी तरफ़ बढ़ाया। लिफाफे पर लिखा था — "वीर सिंह के लिए। खुद पढ़े।"
मैंने लिफाफा लिया। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने लिफाफा खोला।
अंदर एक काग़ज़ था, और उस पर भैरव की मोटी लिखाई।
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