Spirit of a Fighter – Chapter 1186
सुक्खी बुआ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था।
"किसी पर नहीं," उन्होंने कहा। "अपनी मिट्टी पर भरोसा कर। जैसा कालू कहता है — मिट्टी झूठ नहीं बोलती।"
और तभी, आँगन के फाटक पर एक और परछाई हिली।
इस बार कोई ऊँचा आदमी था। लाठी लिए। उसके पीछे दो और।
"सुक्खी," उस आदमी ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो पुरानी ठंडक थी जो मैं पहचानता था। "तूने बहुत बोल दिया।"
मैं पलटा। मशाल की रोशनी में वो चेहरा साफ़ दिख रहा था।
हरनाम।
उसके पीछे अंजली खड़ी थी। उसके हाथ में एक पीली शीशी थी।
"वीर सिंह," हरनाम ने कहा, और उसने अपना चश्मा ठीक किया, "तूने आज बहुत कुछ सुन लिया। पर अब बस। अब तू वो सुनेगा जो मैं कहूँगा — क्योंकि तेरी माँ और तेरी बहन, दोनों मेरे पास हैं।"
मैंने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। मेरे पीछे टिंकू खड़ा हो गया। कालू काका ने अपनी लाठी उठाई।
"मेरी माँ तो गाड़ी में हैं," मैंने कहा। "इंस्पेक्टर के पास।"
हरनाम मुस्कुराया। वो मुस्कान ऐसी थी जैसे कोई जानता हो कि जीत उसकी है।
"इंस्पेक्टर शर्मा," उसने कहा, "अभी तहखाने में है। और गाड़ी… गाड़ी खाली है। क्योंकि जब तू सीढ़ियों से ऊपर आया था, तब मेरे आदमी गाड़ी के पास पहुँच चुके थे।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद था।
"अगर तूने उन्हें कुछ किया," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी, "तो मैं तुझे ज़िंदा नहीं छोड़ूँगा।"
हरनाम हँसा।
"मैं तुझसे लड़ने नहीं आया, वीर," उसने कहा। "मैं सौदा करने आया हूँ। तेरे पास वो काग़ज़ है जो भैरव ने दिया। वो मुझे दे दे। और बदले में मैं तेरी माँ और बहन को छोड़ दूँगा।"
मैंने अपनी जेब से काग़ज़ निकाला। मेरे हाथ काँप रहे थे।
"ये काग़ज़ नकली है," मैंने कहा। "तू जानता है।"
"जानता हूँ," हरनाम ने कहा। "पर असली काग़ज़ मेरे पास है। और वो काग़ज़ — जो भैरव ने जलाया था — वो नहीं जला। मैंने उसे बचा लिया। और अब वो मेरे पास है।"
मेरी साँस रुक गई।
"तो असली काग़ज़ क्या कहता है?" मैंने पूछा।
हरनाम ने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला। पुराना, पीला, जला हुआ किनारे से।
"ये काग़ज़ कहता है," उसने कहा, "कि भवानी सिंह ने अपनी मौत से पहले एक आदमी का नाम लिखा था। और वो नाम तेरे बाप का नहीं था। वो नाम था — रणवीर सिंह।"
मैं जम गया।
"क्या?" मैंने धीरे से कहा।
"भवानी सिंह ने लिखा," हरनाम ने कहा, "कि उस रात जगदीश को मारने वाला रणवीर सिंह था। क्योंकि रणवीर सिंह जानता था कि जगदीश पहलवानों को ज़हर दे रहा है। और उसने खुद इंसाफ़ किया।"
मेरे हाथ से काग़ज़ छूट गया। वो ज़मीन पर गिरा।
मेरे कानों में एक आवाज़ गूँजी — मीरा की आवाज़, जो कह रही थी, "वीर, ये झूठ है।"
पर मैं उसकी आवाज़ सुन नहीं पा रहा था।
मैं बस वहीं खड़ा था, और मेरे सामने हरनाम मुस्कुरा रहा था, और उसके हाथ में वो काग़ज़ था जो मेरे पूरे जीवन को पलट सकता था — और मेरे पीछे, आँगन के दरवाज़े पर, एक औरत खड़ी थी जो अब तक चुप थी, और जिसने अब अपना मुँह खोला — और वो औरत थी मेरी माँ।
॥
माँ ने अपना मुँह खोला, और आँगन में हवा भी रुक गई।
"हरनाम," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ में वो काँप नहीं थी जो मेरे हाथों में थी। "तू उस काग़ज़ को जेब में रख।"
हरनाम हँसा। "सरस्वती देवी —"
"मैंने कहा, रख।" माँ ने एक कदम आगे बढ़ाया। उनके बाल बिखरे थे, माथे पर हल्दी का टीका टूटा था, पर आँखों में वो चमक थी जो मैं बचपन से देखता आया हूँ। "क्योंकि जो काग़ज़ तूने जेब से निकाला है, वो रणवीर सिंह के हस्ताक्षर वाला काग़ज़ नहीं है।"
हरनाम के चेहरे पर पहली बार कुछ हिला।
"क्या?"
"वो काग़ज़," माँ ने कहा, "जो तेरे हाथ में है, वो मेरे हाथ का लिखा है। मैंने खुद लिखा था — बीस साल पहले, उस रात, जब भवानी की लाश अखाड़े में पड़ी थी। और मैंने उसमें रणवीर का नाम इसलिए लिखा था ताकि जो भी इसे पढ़े, वो रणवीर के पास जाए — क्योंकि रणवीर ही अकेला आदमी था जिसे मैं भरोसा कर सकती थी।"
मेरे कानों में खून की आवाज़ आने लगी।
"तो असली काग़ज़," मैंने धीरे से कहा, "जो भैरव ने दिया था…"
"वो नकली था," माँ ने कहा। "भैरव ने उसे खुद बनाया था, ताकि तू रणवीर पर शक करे। ताकि तेरा और रणवीर का भरोसा टूट जाए। क्योंकि भैरव जानता था — जिस दिन तू और रणवीर एक हो जाओगे, उस दिन उसका खेल खत्म।"
हरनाम ने काग़ज़ को अपनी जेब में वापस डालने की कोशिश की, पर उसके हाथ काँप रहे थे।
"तेरी बातों में दम नहीं है, बुढ़िया," उसने कहा। पर उसकी आवाज़ में वो मिठास नहीं थी जो अभी थी।
"दम है," माँ ने कहा। "और सबूत भी है। उस काग़ज़ पर भवानी का नहीं, मेरा हस्ताक्षर है। और मेरा हस्ताक्षर उस काग़ज़ पर कभी नहीं हो सकता जो भवानी ने लिखा हो। अगर तू इसे कल पंचायत में ले जाएगा, तो मैं खुद उठकर बताऊँगी — ये मेरी लिखाई है। और फिर सब पूछेंगे — भवानी की डायरी में मेरी लिखाई कैसे आई?"
हरनाम का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
और तभी, उसके पीछे, अंजली ने अपनी पीली शीशी नीचे कर दी।
"बाबा," उसने धीरे से कहा। "ये झूठ है।"
हरनाम पलटा। "अंजली, चुप रह —"
"आपने मुझसे कहा था," अंजली ने कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी, "कि वीर ने मेरे बाबा को मार डाला। कि वीर ही वो आदमी है जिसने पूरे रामपुर को ज़हर दिया। पर मैंने अभी सुना — ये बुढ़िया कह रही है कि काग़ज़ नकली है। और आपने मुझे बताया था कि ये काग़ज़ भवानी का असली है।"
"अंजली —"
"आप झूठ बोल रहे हैं।" अंजली ने शीशी अपनी छाती से लगा ली। "मेरे बाबा झूठ नहीं बोलते थे। और आपने उनकी लाश के पास खड़े होकर मुझसे वादा किया था कि आप सच बताओगे।"
हरनाम ने अपना चश्मा उतारा। उसकी आँखें छोटी और थकी थीं। उसने अंजली को देखा, फिर मुझे, फिर माँ को, और उसके होठों पर एक अजीब-सी मुस्कान आई — थकी हुई, हारी हुई।
"ठीक है," उसने कहा। "तू जीत गया, वीर सिंह। पर एक बात सुन ले।"
मैंने अपनी मुट्ठियाँ भींची रखीं।
"भैरव ने जो काग़ज़ मुझे दिया," हरनाम ने कहा, "वो नकली नहीं था। वो असली था। और उस पर रणवीर सिंह का नाम था — पर भवानी की लिखाई में नहीं। उस पर लिखा था, और लिखने वाला कोई और था।"
"कौन?" मैंने पूछा।
हरनाम ने अपनी जेब से वो काग़ज़ निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"खुद पढ़ ले।"
मैंने काग़ज़ लिया। किनारे जले हुए थे, काग़ज़ पीला था, और उस पर की लिखाई वो ढीली, हड़बड़ाई लिखाई थी जो मैंने कभी नहीं देखी थी। मैंने उसे पढ़ा।
उस पर लिखा था — "अगर मैं मरूँ, तो रणवीर सिंह से पूछना। वो जानता है कि जगदीश को किसने मारा। और वो जानता है कि मुझे किसने ज़हर दिया। पर वो कभी नहीं बोलेगा, क्योंकि उसने क़सम खाई थी — मेरी बहन को बचाने की।"
मैंने काग़ज़ माँ को दिया। माँ ने पढ़ा, और उनका चेहरा बदल गया।
"ये मेरी लिखाई नहीं है," माँ ने धीरे से कहा। "पर ये काग़ज़ मुझे पहचाना-सा लग रहा है।"
"क्योंकि ये गंगा देवी की लिखाई है," हरनाम ने कहा। "भैरव की मौसी। वो औरत जो कल तक ज़िंदा थी और आज तालाब किनारे तेरे सामने रो रही थी।"
मेरा दिल धक् से रह गया।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा का चेहरा पत्थर जैसा था।
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