Spirit of a Fighter1185 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1185

6 min read November 5, 2026

मैंने एक गहरी साँस ली। रात ठंडी थी, पर मुझे पसीना आ रहा था।

"तो वो कहाँ छुपाया?"

सुक्खी बुआ ने मेरी तरफ़ देखा। और उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उन्होंने धीरे से कहा, "तेरे बाप की कब्र में।"

मैं जम गया।

"क्या?"

"तेरे बाप की कब्र के नीचे," सुक्खी बुआ ने कहा, "एक और कब्र है। जो कभी नहीं बनी। जिसमें जगदीश सिंह की हड्डियाँ पड़ी हैं। और भैरव ने वही जगह चुनी क्योंकि उसे पता था कि कोई कभी तेरे बाप की कब्र खोदने की हिम्मत नहीं करेगा।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद था।

"वो कब्र," मैंने धीरे से कहा, "जो मैंने खोदी थी। जो खाली थी। जिसमें सिर्फ़ जली मिट्टी थी।"

"हाँ," सुक्खी बुआ ने कहा। "क्योंकि भैरव ने उसे कुछ दिन पहले ही खोदवा दिया था। वो जानता था कि तू आएगा।"

मेरा सिर घूमने लगा। मैंने दीवार का सहारा लिया।

"तो जगदीश की हड्डियाँ अब कहाँ हैं?" मीरा ने पूछा।

सुक्खी बुआ ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया। उनकी आवाज़ अब साफ़ थी, बिलकुल साफ़।

"भैरव ने उन्हें तहखाने में रख दिया है," उन्होंने कहा। "उसी तहखाने में जहाँ भवानी की हड्डियाँ थीं। वो चाहता है कि जब पुलिस वहाँ जाए, तो उसे दोनों भाइयों की हड्डियाँ एक साथ मिलें। ताकि सब सोचें कि भवानी ने जगदीश को मारा और फिर खुद मर गया। सब कुछ भवानी के सिर।"

मेरे हाथ मुट्ठी में भर गए।

"पर वो गलत है," मैंने कहा। "भवानी ने जगदीश को मारा था, पर आत्मरक्षा में।"

"हाँ," सुक्खी बुआ ने कहा। "और यही सच है जो मैं आज तेरे सामने बोल रही हूँ। और अब तू जो चाहे कर, वीर। तू मुझे पुलिस को सौंप दे, या माफ़ कर दे। पर मैं बीस साल से इस सच को पी रही हूँ और अब मुझसे और नहीं पिया जाता।"

वो अपनी कुर्सी पर बैठ गईं। उनका शरीर थका हुआ था, जैसे अचानक पचास साल का बोझ उन पर आ गिरा हो।

मैंने पीछे मुड़कर देखा। टिंकू दीवार के सहारे खड़ा था। उसकी आँखों से पानी बह रहा था।

"टिंकू," मैंने धीरे से कहा।

"मुझे अकेला छोड़ दे, भाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी। "प्लीज। बस… बस एक मिनट।"

वो वहीं बैठ गया। अपने घुटनों पर सिर रखकर।

मैं उसके पास नहीं गया। मैं जानता था कि उसे अभी अकेले की ज़रूरत है।

मीरा मेरे पास आई।

"वीर," उसने धीरे से कहा, "ये सब सुनकर भी तू शांत कैसे है?"

"मैं शांत नहीं हूँ," मैंने कहा। "मैं बस… अभी सोच नहीं पा रहा।"

और तभी, पीछे से एक आवाज़ आई।

हल्की, काँपती, पर साफ़।

"भैया…"

मैं पलटा। गुड़िया फाटक पर खड़ी थी। उसके हाथ में स्कूल की कॉपी थी, और उसकी आँखों में आँसू थे। वो कब आई, मुझे पता नहीं चला।

"गुड़िया," मैंने कहा, और मैं उसकी तरफ़ दौड़ा, "तू यहाँ कैसे?"

"माँ को पता है," गुड़िया ने कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी। "माँ ने मुझे भेजा। उन्होंने कहा — जाकर अपने भैया को बता दे कि मैं ठीक हूँ। और उन्होंने कहा… उन्होंने कहा कि तू वहाँ जा रहा है जहाँ तुझे नहीं जाना चाहिए।"

मैंने उसका हाथ पकड़ा। उसके हाथ ठंडे थे।

"कहाँ?" मैंने पूछा।

गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर था।

"माँ ने कहा," उसने धीरे से कहा, "कि सुक्खी बुआ तुझे सच नहीं बता रही। वो तुझे फँसा रही है। और माँ ने कहा कि… कि सुक्खी बुआ वही औरत है जिसने मेरे पापा को मारने की साज़िश रची थी।"

आँगन में सन्नाटा छा गया।

मैंने धीरे से पलटकर सुक्खी बुआ की तरफ़ देखा। वो कुर्सी पर बैठी थीं, और उनका चेहरा अब किसी और जैसा था। वो कुछ नहीं बोलीं।

"बुआ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी। "मेरी माँ झूठ नहीं बोलती।"

सुक्खी बुआ ने अपना सिर उठाया।

"तेरी माँ," उन्होंने कहा, "वो सबसे बड़ी सच्चाई जानती है, वीर। और वो सच ये है कि उस रात उसके पति को मारने वालों में सिर्फ़ जगदीश और भैरव नहीं थे।"

मेरी साँस रुक गई।

"तीसरा कौन था?" मैंने पूछा।

सुक्खी बुआ ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"तीसरा," उन्होंने धीरे से कहा, "मैं थी।"

मैं उसी जगह खड़ा रहा। मेरे पैर जैसे जम गए।

"मैंने ज़हर नहीं दिया," सुक्खी बुआ ने कहा, और उनकी आवाज़ अब फूट रही थी। "पर मैं वहाँ थी। मैंने देखा और मैंने कुछ नहीं किया। और यही मेरा सबसे बड़ा गुनाह है।"

टिंकू ने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था, पर उसकी आवाज़ साफ़ थी।

"तो अब क्या?" उसने कहा। "अब तुम ये सब बताकर क्या चाहती हो? माफ़ी?"

सुक्खी बुआ ने उसकी तरफ़ देखा।

"नहीं," उन्होंने कहा। "मैं माफ़ी नहीं माँग रही। मैं बस सच बोल रही हूँ। और तेरे भैया को ये बताने के लिए कि उस रात भवानी सिंह ने जो काग़ज़ लिखा था — वो मेरे पास नहीं था। वो काग़ज़ भैरव ने लिया था। और भैरव ने उसे जला दिया।"

मैंने अपनी मुट्ठी खोली। उसमें वो काग़ज़ था जो मैंने अभी पढ़ा था।

"तो ये क्या है?" मैंने पूछा।

"ये नकल है," सुक्खी बुआ ने कहा। "असली काग़ज़ जल गया। ये भैरव ने लिखवाया है। ताकि तू मेरे पास आए और मैं तुझे वो बताऊँ जो वो चाहता है।"

मेरे हाथ काँपने लगे।

"और वो क्या है?" मीरा ने पूछा।

सुक्खी बुआ ने अपनी आँखें पोंछीं।

"भैरव चाहता है," उन्होंने कहा, "कि तू मेरे घर आए, और मैं तुझे बताऊँ कि तेरे बाप ने जगदीश को मारा था। और तू उस सच को लेकर रणवीर सिंह के पास जाए। और रणवीर सिंह उस सच को सुनकर टूट जाए। क्योंकि रणवीर सिंह जानता है कि भवानी ने जगदीश को नहीं मारा।"

मैंने एक कदम पीछे किया।

"तो भवानी ने जगदीश को नहीं मारा?" मैंने पूछा। "तो जगदीश को किसने मारा?"

सुक्खी बुआ ने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा था जो काँप रहा था। डर नहीं — कुछ और।

"उस रात," उन्होंने धीरे से कहा, "जगदीश को भवानी ने नहीं मारा। भवानी उस वक़्त ज़हर से बेहोश थे। जगदीश को किसी और ने मारा। और वो कोई और…"

वो रुकीं। उनकी आँखें गीली थीं।

"वो कोई और," उन्होंने कहा, "भैरव था।"

मैंने पीछे मुड़कर देखा। भैरव तहखाने में था — हथकड़ी में, सिपाहियों के बीच। मैंने सीढ़ियों की तरफ़ देखा। सब कुछ शांत था।

"भैरव ने अपने ही भाई को मारा?" मीरा ने पूछा।

"हाँ," सुक्खी बुआ ने कहा। "क्योंकि जगदीश उस वक़्त उससे बड़ा खतरा था। वो पागल हो गया था — भवानी की मौत के बाद वो सबको मारने पर उतर आया था। और भैरव ने सोचा — अगर जगदीश ज़िंदा रहा, तो वो पूरे अखाड़े को खत्म कर देगा। तो भैरव ने उसे मार दिया। और फिर सारा इल्ज़ाम भवानी पर डाल दिया।"

मैंने अपना सिर नीचे किया। मेरे कानों में एक आवाज़ गूँज रही थी — बार-बार।

"तो भैरव ने भवानी को भी मारा?" मैंने पूछा।

"नहीं," सुक्खी बुआ ने कहा। "भवानी को ज़हर जगदीश ने दिया था। और भैरव ने जगदीश को मारकर… भवानी का बदला लिया।" वो हँसीं — एक सूखी, दर्द भरी हँसी। "बीस साल मैं यही सोचती रही कि भैरव खलनायक है। पर सच ये है — भैरव ने अपने भाई को मारकर भवानी का बदला लिया। और फिर वो खुद भवानी की जगह लेने की कोशिश करता रहा।"

मैं चुप खड़ा रहा। मेरे अंदर एक अजीब-सी खालीपन थी।

"तो अब क्या?" मैंने कहा। "अब मैं किस पर भरोसा करूँ?"

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