Spirit of a Fighter1184 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1184

7 min read November 5, 2026

उन्होंने प्याला रख दिया। इस बार उनके हाथ नहीं काँपे। उनकी आवाज़ में कुछ बदला — वो चुगलखोर बुआ की आवाज़ नहीं थी, किसी और की आवाज़ थी। ठंडी। साफ़।

"बैठ जा, वीर," उन्होंने कहा। "ये कहानी खड़े-खड़े सुनने की नहीं है।"

मैं नहीं बैठा। मैंने पीछे मुड़कर देखा। कालू काका आँगन में आ गए थे, और उनका चेहरा ऐसा था जैसे उन्होंने कोई भूत देख लिया हो।

"सुक्खी," कालू काका ने धीरे से कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी, "तू… तू वही है? जगदीश की…"

"हाँ, कालू," सुक्खी बुआ ने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ नरमी आई। "मैं वही हूँ। जिसे तूने बीस साल पहले उस रात कुएँ के पास देखा था और जिसे तूने कभी किसी को नहीं बताया।"

कालू काका की लाठी ज़मीन पर गिरी। वो अपनी जगह पर खड़े रहे, पर उनका शरीर झुक गया जैसे कोई बोझ अचानक बढ़ गया हो।

मीरा मेरे पास आई और उसने वो काग़ज़ मेरे हाथ में दिया।

"इसे देख," उसने धीरे से कहा। "तारीख़ के नीचे, जो भैरव ने लिखा था — गंगा को भी यही दिन याद रहेगा। मैंने सोचा ये गंगा देवी के लिए लिखा है। पर…"

"पर क्या?"

"पर सुक्खी बुआ का असली नाम भी गंगा है," मीरा ने कहा। "ये तहखाने के रजिस्टर में लिखा था। जगदीश सिंह की बीवी का नाम — गंगा।"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

मैंने सुक्खी बुआ की तरफ़ देखा। वो मेज़ के पास खड़ी थीं, और उनका चेहरा अब लालटेन की रोशनी में अलग लग रहा था। वो चुगलखोर बुआ का चेहरा नहीं था। किसी और का चेहरा था। एक औरत का जिसने बीस साल एक नकाब पहना था और अब वो नकाब उतार रही थी।

"तो… तो गंगा देवी?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ फँस गई।

"वो भैरव की बहन है," सुक्खी बुआ ने कहा। "और मेरे जैसी नहीं है। वो सचमुच निर्दोष है। जो उसने तुझे बताया, वो सब सच था — भवानी की हड्डियाँ, नंदकिशोर, सब। पर वो नहीं जानती कि उसका भाई जगदीश और मैं… हम…"

वो रुकीं। पहली बार उनकी आवाज़ अटकी।

"क्या?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ ज़ोर से निकली। "आप और जगदीश, आप दोनों ने क्या किया?"

"हमने कुछ नहीं किया," सुक्खी बुआ ने कहा। "जगदीश ने किया। और मैंने उसे रोका नहीं। यही मेरा गुनाह है — मैंने रोका नहीं।"

उन्होंने मेज़ से एक पुराना लिफ़ाफ़ा उठाया जो अब तक वहाँ पड़ा था और मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"ये तेरे बाप की लिखाई है," उन्होंने कहा। "भवानी सिंह की। उसने ये मुझे दिया था — उस रात, उसके मरने से एक घंटा पहले। कहा था — अगर मैं न बचूँ, तो ये उसके बेटे को देना।"

मैंने काग़ज़ लिया। हाथ काँप रहे थे। मीरा ने लालटेन मेरे पास की और मैंने पढ़ा।

"सुक्खी, तू जानती है मैं तेरे पति को कभी माफ़ नहीं करूँगा। जो उसने पहलवानों के साथ किया, वो मैंने देखा है। पर तूने मुझे बताया — इसीलिए तू आज भी मेरे लिए बहन है। तेरे पेट में जो बच्चा है, वो कभी इस ज़हर का हिस्सा नहीं होगा। मैं वादा करता हूँ — जगदीश जब खत्म होगा, तो मैं तुझे और तेरे बच्चे को साफ़ हाथों के साथ जीने दूँगा। पर एक बात — अगर मैं मरूँ, तो ये काग़ज़ मेरे बेटे को दे देना। और उससे कहना — अपने बाप के काम को आगे मत बढ़ाना। उसे खत्म करना।"

मैंने काग़ज़ नीचे किया। मेरी आँखें जल रही थीं।

"आपके पेट में बच्चा था," मैंने कहा। "उस रात।"

सुक्खी बुआ ने अपना हाथ अपने पेट पर रखा। एक पुरानी आदत से।

"था," उन्होंने कहा। "और वो बच्चा ज़िंदा है।"

मैंने पीछे मुड़कर देखा। टिंकू फाटक पर खड़ा था। उसका चेहरा पीला था। उसके हाथ में मिठाई की एक डिब्बी थी जो वो हमेशा लाता था।

"बुआ," टिंकू ने धीरे से कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी, "आप… आप क्या कह रही हैं?"

सुक्खी बुआ ने उसकी तरफ़ देखा। और उनकी आँखें भर आईं।

"टिंकू," उन्होंने कहा। "बेटा…"

टिंकू ने एक कदम पीछे किया। डिब्बी उसके हाथ से छूट गई और ज़मीन पर गिरी। मिठाई बिखर गई।

"नहीं," टिंकू ने कहा। "नहीं, बुआ। ये झूठ है। मेरी माँ… मेरी माँ तो…"

"मैं हूँ तेरी माँ," सुक्खी बुआ ने कहा, और उनकी आवाज़ टूट रही थी। "वो जो तूने बीस साल अपनी माँ समझा — वो तेरी मौसी थी। मेरी बहन। जिसने तुझे अपना बेटा बनाकर पाला। क्योंकि अगर जगदीश को पता चलता कि तू ज़िंदा है, तो वो तुझे भी मार देता।"

टिंकू की आँखों से पानी बहने लगा। वो अपनी जगह पर खड़ा रहा, और उसका शरीर काँप रहा था।

"तो जगदीश?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ ऐसी निकली जैसे किसी और की आवाज़ हो। "जगदीश को क्या हुआ?"

सुक्खी बुआ ने एक लंबी साँस ली।

"उस रात," उन्होंने कहा, "जगदीश ने तेरे बाप को ज़हर दिया। और तेरे बाप ने मरने से पहले… उसने जगदीश को अपने हाथों से मारा।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

"तेरे बाप ने," सुक्खी बुआ ने दोहराया। "ज़हर शरीर में था, पर वो जगदीश से लड़ा। उस रात मैं वहाँ थी। मैंने देखा — भवानी सिंह ने आख़िरी साँस में जगदीश का गला पकड़ा और उसे दीवार से पटक दिया। जगदीश गिरा। और वहीं खत्म हो गया।"

कालू काका ने अपना हाथ अपने मुँह पर रख लिया।

"तो… तो उस रात मरने वाले दो थे?" मीरा ने धीरे से पूछा।

"दो नहीं," सुक्खी बुआ ने कहा। "तीन। जगदीश, भवानी… और मेरा बचपन।"

उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं। फिर वो मेरी तरफ़ देखकर बोलीं, "भैरव ये सब जानता है। पर उसने आज तक तुझे क्यों नहीं बताया? क्योंकि वो चाहता है कि तू सोचे उसका भाई ज़िंदा है और उससे बदला लेगा। वो तुझे डर में रखना चाहता है। पर सच ये है, वीर — जगदीश मरा हुआ है। बीस साल से मरा हुआ है।"

मैंने अपना सिर उठाया। मेरी आँखों में पानी था, पर मैं रो नहीं रहा था।

"और आपने ये सब छुपाया," मैंने कहा। "बीस साल। मेरी माँ के सामने, मेरे सामने, हर रोज़। आप हमारे घर आती थीं। आप मेरी माँ से चुगली करती थीं। और आप…"

"मैं डरती थी," सुक्खी बुआ ने कहा, और उनकी आवाज़ सीधी थी। "मैं जानती थी कि अगर मैंने ये सच बोला, तो भैरव मुझे भी मार देगा। और मुझे अपने टिंकू को बचाना था। तू समझता है ना, वीर? एक माँ अपने बेटे के लिए क्या-क्या नहीं करती?"

मैं चुप खड़ा रहा। मेरे गले में कुछ अटक रहा था।

तभी टिंकू आगे आया। उसका चेहरा गीला था, पर उसकी आवाज़ में पहली बार कोई नई सख़्ती थी।

"बुआ," उसने कहा, "ये सब ठीक है। पर आपने अभी तक ये नहीं बताया — कि उस रात के बाद जगदीश की लाश का क्या किया? आपने कहा आपने छुपाया। कहाँ छुपाया?"

सुक्खी बुआ ने उसकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था — डर नहीं, थकान।

"अखाड़े के तहखाने में," उन्होंने कहा। "उसी जगह जहाँ भवानी की हड्डियाँ थीं। पर…"

"पर क्या?" मैंने कहा।

"पर जब मैं दो दिन बाद गई," सुक्खी बुआ ने कहा, "तो लाश वहाँ नहीं थी। कोई और उसे ले गया था।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तो लाश कौन ले गया?" मैंने पूछा।

सुक्खी बुआ ने अपना सिर हिलाया।

"मैंने बीस साल यही सोचा," उन्होंने कहा। "और आज जब भैरव ने वो काग़ज़ दिया — 'गंगा को भी यही दिन याद रहेगा' — तो मुझे पता चला कि भैरव को ये सब पता है। और वो मुझे डरा रहा है।"

"क्यों?" मैंने पूछा।

क्योंकि, सुक्खी बुआ ने कहा, "वो जानता है कि मैं जानती हूँ कि उसने जगदीश की लाश को कहाँ छुपाया।"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho