Spirit of a Fighter – Chapter 1183
"विक्रम," उन्होंने कहा। "अगर तू सच बोलेगा, तो मैं तेरे लिए गवाही दूँगी। झूठ बोलेगा, तो मैं तेरे खिलाफ़ गवाही दूँगी। तेरी मर्ज़ी।"
भैरव ने उनकी तरफ़ देखा। बीस साल की चुप्पी उसकी आँखों में तैर रही थी।
"वो औरत," वो धीरे से बोला। "जो ढूँढ रही है। वो जगदीश की बीवी है।"
तहखाने में सन्नाटा छा गया। सिर्फ़ लालटेन की आवाज़ सुनाई दे रही थी — हल्की-सी फुफकार।
"जगदीश की बीवी?" मैंने दोहराया। "मतलब मेरे बाप की मौत के बाद वो… वो कहाँ थी?"
"वो हमेशा से यहीं थी," भैरव ने कहा। "तेरे गाँव में। तू उसे रोज़ देखता है। वो तेरे घर के सामने से गुज़रती है, तुझे देखती है, और तेरा नाम लेकर मुस्कुराती है।"
मेरी रीढ़ में ठंडी सुई-सी चुभी।
"कौन?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ में अब वो सब्र नहीं था।
भैरव ने अपना सिर ऊपर किया। उसकी आँखें मेरी आँखों में थीं और उसके होंठ हिले —
"सुक्खी।"
नाम तहखाने में गूँजा और मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। सुक्खी बुआ — वो औरत जो हर बात सबसे पहले जानती थी। जो हर बात बढ़ा-चढ़ाकर बताती थी। जो कभी-कभी अनजाने में सबसे बड़ा सच बोल देती थी।
"झूठ," मैंने कहा। "सुक्खी बुआ ने ही तो पूरे गाँव को बुलाया था। वो तो…"
"वो सबसे चालाक है," भैरव ने कहा। "बीस साल वो जगदीश के साथ थी। जब जगदीश भागा, तो वो गाँव में रह गई — सबकी दोस्त बनकर। सबकी खबरें इकट्ठी करती रही। और तेरे घर के सामने से गुज़रती रही, ये देखने के लिए कि तू कब बड़ा होगा और कब तुझे पता चलेगा कि तेरे बाप की कब्र में क्या है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसके हाथ में हरी शीशी अब भी थी, पर उसकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गई थीं।
"और वो काग़ज़?" मीरा ने पूछा। "जो टिंकू को मिला था — जिस पर माँ की लिखाई थी? अगर सुक्खी…"
"वो सुक्खी ने लिखवाया था," कालू काका ने धीरे से कहा। "माँ से ज़बरदस्ती। उसने माँ को धमकाया होगा — गुड़िया के नाम पर।"
मेरी मुट्ठियाँ भर गईं। मैं सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा। दो कदम। फिर रुक गया।
"माँ कहाँ है?" मैंने इंस्पेक्टर से पूछा।
"ऊपर, गाड़ी में। वो ठीक हैं। पर उन्होंने कहा — तुम्हें अकेले नहीं आने देना।"
"क्यों?"
इंस्पेक्टर ने अपनी जेब से एक और काग़ज़ निकाला। इस बार वो फटा हुआ था — जैसे किसी ने जल्दी में फाड़ा हो।
"ये उन्होंने गाड़ी में मुझे दिया," उन्होंने कहा। "कहा कि अगर वीर नीचे उतरा है तो ये उसे देना।"
मैंने काग़ज़ पढ़ा। माँ की लिखाई में, पर इस बार सिर्फ़ तीन शब्द —
"सुक्खी के पास मत जाना।"
मैंने काग़ज़ मुट्ठी में दबाया। मेरे हाथ काँप रहे थे और मेरी साँसें तेज़ थीं। तहखाने की ठंडी मिट्टी की गंध अब मुझे जकड़ रही थी।
"वो अब भी गाँव में है?" मैंने पूछा।
"हाँ," भैरव ने कहा। "और वो जानती है कि तू अब सब जान गया है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने अपना सिर हिलाया — एक छोटा-सा इशारा, जो कह रहा था — मैं तेरे साथ हूँ।
मैं सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा। तीन कदम चढ़ा। फिर पलटा।
"भैरव सिंह," मैंने कहा। "तूने आज जो किया, वो तेरे अपने हाथ का लिखा काग़ज़ है। अदालत में ये तेरे खिलाफ़ जाएगा। पर अगर तू एक बार सच बोले — पूरा सच, सुक्खी के साथ क्या हुआ — तो मैं तेरे लिए कुछ करूँगा।"
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ बदला।
"क्या करेगा?" उसने पूछा।
"तेरे बेटे को तेरे नाम से नहीं, अपनी माँ के नाम से जीने दूँगा," मैंने कहा। "करण को।"
भैरव की आँखें भर आईं। पहली बार। बीस साल में पहली बार उसकी आँखों में पानी था।
"वो औरत," वो धीरे से बोला। "वो मेरी भाभी है। और वो… वो जगदीश से भी ज़्यादा खतरनाक है। तू उसके पास जाएगा तो…"
"तो क्या?" मैंने कहा।
"तो वो तुझे वो बताएगी," भैरव ने कहा, "जो मैंने बीस साल छुपाया। और जो सुनकर तू अपने बाप को भी माफ़ नहीं करेगा।"
मैं सीढ़ियों पर खड़ा रहा। मेरे ऊपर आसमान था — रात का, ठंडा, और मेरी माँ का इंतज़ार करता हुआ। और मेरे नीचे — बीस साल का सच, जो आज भी पूरा नहीं खुला था।
मैंने एक गहरी साँस ली। फिर मुड़कर सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
"मीरा," मैंने कहा। "काग़ज़ संभाल ले। सब।"
"और तू?" उसने पूछा।
"मैं सुक्खी बुआ के घर जा रहा हूँ," मैंने कहा। "उससे पूछने — कि मेरे बाप की कब्र में जो था, वो उसने किसके कहने पर निकाला।"
मैं सीढ़ियों से ऊपर निकला। रात की हवा चेहरे पर लगी — ठंडी, और उसमें गुड़ की चाशनी की गंध थी। वो गंध मुझे कहीं और ले जा रही थी।
और जैसे ही मैंने आँगन में कदम रखा, सामने अंधेरे में एक परछाई हिली। लालटेन की रोशनी उस पर पड़ी — चमकीली साड़ी, हाथ में पान का बीड़ा।
सुक्खी बुआ खुद मेरे सामने खड़ी थीं। उनके होंठों पर वो हँसी थी जो अब तक मुझे प्यारी लगती थी, पर अब सिर्फ़ रोंगटे खड़े करती थी।
"अरे वीर," उन्होंने कहा। "मैं तेरा ही इंतज़ार कर रही थी। आ जा, बैठ। चाय बनाई है — तेरे लिए ही।"
॥
"अरे वीर," सुक्खी बुआ ने दोबारा कहा, "सुन नहीं रहा? आ जा, बैठ। चाय ठंडी हो रही है।"
मेरे पैर जैसे ज़मीन में गड़ गए। आँगन में चारों तरफ़ अंधेरा था, बस लालटेन की एक पीली रोशनी उनके चेहरे पर पड़ रही थी। वो हँस रही थीं, पर उनकी आँखें नहीं हँस रही थीं। उनकी आँखें मेरे हाथों पर थीं — जो अभी भी मुट्ठी में भरे थे।
"बुआ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ सूखी निकली। "आपको पता है मैं इस वक़्त क्यों आया हूँ?"
"पता है," उन्होंने कहा। "तू तहखाने से निकलकर आया है। भैरव ने तुझे कुछ बताया होगा। और अब तू मुझसे पूछने आया है — कि मैं कौन हूँ।"
उन्होंने चाय का प्याला मेज़ पर रखा। प्याला हिला, चाय छलकी, पर उन्होंने छलकन पोंछी नहीं। उनके हाथ काँप रहे थे।
"तू पूछ," वो बोलीं। "पूछ ले। बीस साल से मैं इंतज़ार कर रही हूँ कि कोई तो पूछे।"
मैं चुप खड़ा रहा। पीछे मीरा आई, और टिंकू, और कालू काका — सब आँगन के फाटक पर रुक गए। मैंने पीछे मुड़कर देखा। मीरा के हाथ में वो काग़ज़ था जो भैरव ने दिया था। उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में वही सवाल था जो मेरे मन में था।
"बुआ," मैंने कहा, "मैं सीधा पूछता हूँ। आप जगदीश सिंह की बीवी हैं?"
सुक्खी बुआ ने चाय का प्याला उठाया, एक घूँट लिया, और फिर वो मुस्कुराईं। वो मुस्कान ऐसी थी जैसे कोई पुराना ज़ख़्म खुरच रहा हो।
"जगदीश सिंह की बीवी," उन्होंने दोहराया। "ये नाम बीस साल से मैंने किसी को बोलने नहीं दिया। गाँव में सब मुझे सुक्खी बुआ समझते हैं — वो बुआ जो हर बात सबसे पहले जानती है, हर बात बढ़ा-चढ़ाकर बताती है। किसी को क्या पता कि ये बुआ सबसे पहले जानती है क्योंकि ये सबके पीछे खुद खड़ी थी।"
मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन जैसे हिल गई।
"तो जगदीश सिंह कहाँ है?" मैंने पूछा।
"मर गया," उन्होंने कहा। "बीस साल पहले। उसी रात मरा जिस रात तेरे बाप मरे थे।"
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ना चाहा, पर मैंने हाथ खींच लिया।
"आप झूठ बोल रही हैं," मैंने कहा। "तहखाने में कालू काका ने बताया कि जगदीश गायब हुआ था। भैरव ने कहा कि उसकी लाश नहीं मिली।"
"लाश नहीं मिली," सुक्खी बुआ ने कहा, "क्योंकि लाश को मैंने छुपाया।"
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