Spirit of a Fighter – Chapter 1182
"फिर आख़िरी काग़ज़ पढ़," मैंने कहा। मैंने गड्डी के सबसे नीचे से एक तह किया हुआ पन्ना निकाला, जो बाकी काग़ज़ों से अलग था — साफ़ काग़ज़, जिस पर स्याही भी नई थी।
करण ने वो पन्ना खोला। उसके हाथ काँप रहे थे।
और मैंने देखा — उसका चेहरा। पहले तो कुछ समझा नहीं। फिर उसकी आँखें फैलीं, गला सूखा, और वो दीवार से टिक गया।
"क्या लिखा है?" मीरा ने धीरे से पूछा।
करण ने कुछ नहीं कहा। उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। मैंने पढ़ा — भैरव की लिखाई में, पर आज की स्याही से —
"मेरा बेटा करण। तू मुझे माफ़ कर देना। मैंने तेरे लिए ये सब किया — तेरे लिए अखाड़ा, तेरे लिए पैसा, तेरे लिए नाम। पर तूने ये रास्ता मत चुनना। मैंने ये रास्ता अपने भाई के कहने पर चुना था और देख, आज मैं यहाँ हूँ। अगर तू एक बार भी अपने ताऊ की बात माने, तो सब कुछ खो देगा। वो तुझे भी वही ज़हर देगा जो मैंने इन सबको दिया। माफ़ कर देना। तेरा बाप।"
करण ने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ा और उसी तरह दीवार से टिक गया, जैसे उसके पैर उसे सँभाल नहीं पा रहे हों। उसकी साँस रुक गई। मैंने उसे कुछ कहते नहीं सुना — बस उसकी साँस की आवाज़।
मैं वहीं खड़ा रहा। कुछ नहीं बोला। उसके कंधे पर हाथ रखना चाहा, पर नहीं रखा। कुछ ऐसे पल होते हैं जब किसी का हाथ सहारा नहीं होता — बोझ बन जाता है।
भैरव ने ये सब देखा। उसकी मुस्कान अब पूरी तरह मिट चुकी थी।
"करण," वो बोला। "बेटा।"
करण ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, पर आवाज़ में वो नरमी नहीं थी जो बाप-बेटे में होती है।
"तूने ये काग़ज़ मेरे लिए लिखा," करण ने कहा। "पर तूने मेरे लिए कभी उस आदमी से लड़ना नहीं चुना। तूने उसकी बात मानी। बीस साल मानी। और अब जब सब खत्म हो रहा है, तब मुझे ये काग़ज़ दिखा रहा है?"
भैरव ने अपनी हथकड़ी वाले हाथों से अपना चेहरा छुपाया। पहली बार उसके चेहरे पर वो ठंडक नहीं थी जो गंगा देवी ने बताई थी। सिर्फ़ थकान थी।
"मैं डर गया था," वो धीरे से बोला। "जगदीश से। वो मुझसे बड़ा था, और मैं उसकी परछाई था। जब उसने भवानी के पैर बेकार किए, तब मैं चुप रहा। जब उसने चंदन को जलाया, तब मैं चुप रहा। और जब उसने गंगा को ज़िंदा रखने की शर्त रखी — तब भी मैं चुप रहा।" उसने हाथ नीचे किए। "बीस साल की चुप्पी का हिसाब आज सबके सामने है।"
मैंने करण की तरफ़ देखा। उसने काग़ज़ को मुट्ठी में दबा लिया था, मोड़कर। उसकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गई थीं।
"फाड़ दे," मीरा ने धीरे से कहा। "अगर दिल कहे, फाड़ दे।"
करण ने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़कर खींचा — पर फाड़ा नहीं। उसकी नज़र काग़ज़ के पीछे कुछ और देख रही थी। उसने उसे पलटा। पीछे एक तारीख़ लिखी थी — महीना, दिन, साल।
करण की साँस अटक गई।
"ये तारीख़," वो फुसफुसाया। "ये तो वो दिन है जिस दिन मेरी माँ मर गई थी।"
मैंने उसके हाथ से काग़ज़ लिया। तारीख़ साफ़ थी — उसी दिन की, जिस दिन गंगा देवी खुद कह रही थीं कि वो "मरी" थीं।
"तूने ये काग़ज़ अपनी माँ की मौत वाले दिन लिखा?" करण भैरव की तरफ़ मुड़ा। "उस दिन तूने ये लिखा? जब मेरी माँ ज़िंदा थी या मर चुकी थी?"
भैरव ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"उस दिन," वो बोला, "तेरी माँ ने मुझे छोड़ दिया था। मुझे नहीं, इस सब को। उसने कहा — मैं तेरे साथ नहीं रह सकती, विक्रम। तू वो आदमी नहीं है जिससे मैंने शादी की थी।"
"तो तूने मेरे लिए ये काग़ज़ लिखा?" करण की आवाज़ तेज़ हुई। "जब मैं तेरे पास था? जब मैं छोटा था और तूने मुझे गंगा देवी के पास छोड़ दिया?"
"मैंने तुझे इसलिए छोड़ा," भैरव ने आँखें खोलकर कहा, "क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तू मेरे जैसा बने। पर तू बन गया। देख — तू छड़ लेकर आया। तू मुझे मारने आया। मेरा खून तेरे अंदर है।"
करण ने अपनी छड़ उठाई। मैंने उसे रोका नहीं। मीरा आगे बढ़ी, पर मैंने उसका हाथ पकड़ा।
"रुक," मैंने धीरे कहा। "ये उसका फ़ैसला है।"
करण ने छड़ उठाई रखी। उसकी आँखों में आँसू अब बह रहे थे। उसने भैरव के सामने छड़ ज़मीन पर पटक दी। आवाज़ पूरे तहखाने में गूँजी।
"मैं तेरा खून नहीं हूँ," करण ने कहा। आवाज़ टूट रही थी पर जैसे बहती नदी के बीच से पत्थर निकल रहा हो। "मैं अपनी माँ का बेटा हूँ। और मेरी माँ ने मुझे तेरे जैसा नहीं बनने दिया। उसने मुझे बीस साल अपनी गोद में रखा। तूने उससे मेरा हिस्सा छीन लिया था, पर उसने मुझे तेरे ज़हर से बचा लिया।"
उसने काग़ज़ को भैरव के सामने रख दिया।
"रख अपना ख़त। जब मैं गवाही दूँगा, तब ये काग़ज़ मेरे साथ होगा। और यही साबित करेगा कि तूने सब जान-बूझकर किया।"
भैरव ने काग़ज़ देखा। फिर करण को। फिर गंगा देवी को, जो सीढ़ियों पर चुप खड़ी थीं। उसने अपना सिर नीचे कर लिया।
मैंने अलमारी से और गड्डियाँ निकालीं। हर गड्डी पर नाम था। पुरानी चीज़ें — पहलवानों के नाम, खुराक की तारीख़ें, मौत के दिन, और हर मौत के बाद लिखा हुआ हिसाब — कितने पैसे बीमा से मिले, कितने अखाड़े से।
"ये सब पंचायत के सामने जाएगा," मैंने कहा। "हर काग़ज़। हर नाम। बीस साल का पूरा हिसाब।"
तभी ऊपर से इंस्पेक्टर शर्मा की आवाज़ आई। वो सीढ़ियों के मुँह पर खड़े थे, हाथ में टॉर्च।
"वीर सिंह," उन्होंने कहा। "ऊपर आओ। तुम्हारी माँ ने कुछ कहा है।"
मेरा दिल धक्क से रह गया। मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो भी सफ़ेद पड़ गई थी। काग़ज़ मेरे हाथ से फिसल गए और ज़मीन पर बिखर गए।
"क्या कहा?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ सूखी थी।
"वो नहीं कह रहीं," इंस्पेक्टर ने कहा। "वो बोल नहीं पा रहीं। पर उन्होंने मुझे एक काग़ज़ दिया है। और उस पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी है।"
वो सीढ़ियों से उतरे। उनके हाथ में एक मुड़ा हुआ पन्ना था। उन्होंने मुझे दिया।
मैंने खोला। माँ की लिखाई थी — काँपती उँगलियों से, जल्दी में। और उस पर लिखा था —
"वीर, अगर मैं बोल न पाऊँ तो याद रखना — तेरे बाप की कब्र खाली नहीं थी। जो कुछ नीचे था, वो अब भी नीचे है। और उसे जगदीश नहीं, कोई और ढूँढ रहा है।"
मैंने काग़ज़ को दो बार पढ़ा। फिर तीसरी बार। मेरे हाथ काँप रहे थे और मेरे कानों में माँ की आवाज़ गूँज रही थी — वो आवाज़ जो हमेशा धीमी रहती थी, पर जो सच बोलती थी।
"कोई और?" मैंने धीरे से कहा। "कौन और?"
कालू काका पास आए। उन्होंने काग़ज़ पढ़ा। उनका चेहरा काग़ज़ से भी पीला पड़ गया।
"कोई और," वो बोले। "मतलब जगदीश के अलावा भी कोई था। कोई ऐसा जो बीस साल से चुप था।"
भैरव ने अचानक अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में पहली बार डर था — असली डर, वो डर जो जेल से नहीं, किसी और से होता है।
"कोई और नहीं था," वो तेज़ी से बोला। "मैं और जगदीश — बस हम दो। तीसरा कोई नहीं।"
"फिर माँ ने ऐसा क्यों लिखा?" मैंने पूछा।
भैरव ने कुछ कहना चाहा, पर उसकी आवाज़ रुक गई। उसने अपना मुँह बंद कर लिया, जैसे कुछ ऐसा जानता हो जो बोलने से सब बदल जाएगा।
गंगा देवी सीढ़ियों से नीचे आईं। उनकी लालटेन अब भी जल रही थी। उन्होंने भैरव की तरफ़ देखा और उनकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो सिर्फ़ उन्हीं के पास थी।
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