Spirit of a Fighter – Chapter 1179
मैं उठ बैठा।
फाटक खुला। अंदर एक लंबा नौजवान आया। लाल शेरवानी पहने हुए। हाथ में लोहे की छड़। सिर पर तेल चढ़े बाल। चेहरे पर वो गुस्सा जो पहली नज़र में ही दिख जाए।
करण।
उसने चारों तरफ़ देखा। उसकी नज़र मुझ पर पड़ी। वो आगे बढ़ा और छड़ उठाकर चिल्लाया —
"वीर सिंह कहाँ है? मेरे बाप को जेल में डालने वाला कहाँ है?"
टिंकू चूल्हे से उठा। मीरा खड़ी हो गई। माँ ने सुई रोक दी।
मैं उठा। धीरे से। चारपाई से।
पर मैंने छड़ नहीं देखी। मैंने उसकी गंध सूँघी।
और मेरा दिल रुक गया। उसकी शेरवानी से आ रही गंध — वही गंध थी जो उस रात हवेली में थी। वही गंध जो पीली शीशी में थी।
गंगा देवी की गंध।
वो उससे मिल चुका था।
और तभी मुझे समझ आया — ठाकुर ने जो बीज बोया, वो उग चुका था। और ये लड़का, ये करण, किसी और का नहीं — गंगा देवी के हाथ का हथियार था।
पर किसके ख़िलाफ़?
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया। और करण की छड़ हवा में चमकी।
॥
छड़ हवा में चमकी और मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
नहीं, गलत कहा। मैंने आँखें बंद नहीं कीं। मैंने छड़ को अपनी छाती पर आने दिया। वो आई, टकराई, और रुक गई। करण की कलाई काँप रही थी — पूरी ताकत से मारा था, पर मेरी छाती पर आकर उसका हाथ जैसे थम गया।
"मार," मैंने कहा। "और ज़ोर से मार।"
उसकी आँखें फैल गईं।
"क्या?"
"तू मुझे मारने आया है ना? तो मार। पर पहले ये बता — तेरे हाथ में ये छड़ किसने दी?"
करण ने छड़ खींच ली और एक कदम पीछे हटा। उसकी शेरवानी की घुंडी खुली थी, साँस तेज़ चल रही थी। वो मुझसे उम्र में छोटा था — बाईस, तेईस का। भैरव जैसी भारी छाती, चौड़े कंधे, पर आँखों में वो ठंडक नहीं थी। उसकी आँखों में एक जली हुई बेचैनी थी, ऐसी बेचैनी जो रातों को सोने नहीं देती।
"तूने मेरे बाप को जेल में डाला," वो फिर चिल्लाया, और उसकी आवाज़ टूट रही थी। "तूने पूरे गाँव के सामने उसे ज़हर देने वाला साबित किया। तूने…"
"मैंने तेरे बाप को जेल में नहीं डाला," मैंने कहा। "मैंने उसके किए को जेल में डाला है।"
वो झपटा। छड़ घुमाई। मैंने उसकी कलाई पकड़ी — ऊपर से, कसकर। छड़ हवा में रुकी और उसकी उँगलियों से छूट गई। मैंने उसे मारा नहीं। बस उसकी दोनों कलाइयाँ पकड़कर उसे अपनी तरफ़ खींचा, इतना करीब कि उसकी साँस मेरे चेहरे पर लगे।
"सुन," मैंने धीरे से कहा। "जो तेरे बाप ने किया, वो तू नहीं है। समझ रहा है?"
उसकी आँखों में कुछ बदला। पल भर के लिए। फिर वो फिर तड़पा, अपनी कलाई छुड़ाई, और पीछे हटकर अखाड़े की मिट्टी पर गिर पड़ा।
टिंकू ने पास आकर मेरा कंधा पकड़ा। "भाई, ये पागल है। इसकी छड़…"
"रहने दे," मैंने कहा। "ये पागल नहीं है। ये सिर्फ़ वो है जो कोई उसे बता रहा है।"
मीरा पीछे से आई। उसके हाथ में वो हरी शीशी थी जो उसने हमेशा बैग में रखी रहती थी। उसने करण को देखा, फिर मुझे देखा, और फिर धीरे से बोली — "इसे सच बताओ। वरना ये ठाकुर का हथियार बना रहेगा।"
करण मिट्टी पर बैठा था, घुटने मोड़े हुए, सिर नीचे। उसकी शेरवानी पर लाल मिट्टी के धब्बे लग गए थे। उसकी साँस अभी भी तेज़ थी।
मैं उसके सामने बैठ गया। घुटने के बल। बिलकुल उसी तरह, जैसे वो बैठा था।
"तेरी माँ," मैंने कहा। "गंगा देवी। तू उनसे मिला है?"
करण का सिर उठा। उसकी आँखों में चमक आई — गुस्से की नहीं, डर की।
"तू… तू उन्हें जानता है?"
"मैंने उनकी गंध पहचानी," मैंने कहा। "तेरी शेरवानी से। वो तुझसे मिल चुकी हैं। और मुझे लगता है उन्होंने तुझे बहुत कुछ बताया है।"
करण ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया।
"उन्होंने कहा," वो धीरे से बोला, आवाज़ दबी हुई, "कि मेरे बाप ने सब कुछ किया। कि मैं उसका बेटा हूँ पर उसका नहीं हूँ। कि मैं…"
उसकी आवाज़ रुक गई। उसके कंधे हिलने लगे। काँप रहे थे।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसने नहीं हटाया।
"करण," मैंने कहा। "तेरे बाप ने जो किया, उसका हिसाब तुझसे नहीं माँगा जाएगा। पर अगर तू आज इस छड़ को उठाएगा, तो तू उसी रास्ते पर चला जाएगा जिस पर वो गया। और फिर तेरी माँ को तेरे लिए भी रोना पड़ेगा।"
वो उठा। धीरे से। मिट्टी झाड़ी। छड़ उठाई।
मेरा शरीर कस गया।
पर उसने छड़ मेरी तरफ़ नहीं उठाई। उसने उसे उठाकर पीछे ज़ोर से फेंका। छड़ दीवार से टकराई और खड़खड़ाती हुई दूर गिरी।
"सच है तो दिखा," उसने दाँत भींचकर कहा। आँखें लाल थीं, पर आवाज़ साफ़। "मेरे बाप के किए का सबूत दिखा। वो नशीला पानी, वो बोतलें, वो मरे हुए पहलवान।" उसने मेरी तरफ़ उँगली उठाई। "और अगर मुझे सबूत नहीं मिला — अगर तू मुझे झूठ बता रहा है — तो मैं तुझे कभी माफ़ नहीं करूँगा। कभी नहीं।"
मैं उठा और उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखों में वो बेचैनी अभी भी थी, पर उसमें एक नया सवाल जुड़ गया था।
"ठीक है," मैंने कहा। "आज रात। तहखाने में।"
——
अखाड़े की मिट्टी पर सन्नाटा छा गया। पहलवान जो बीच में आने के लिए दौड़े थे, सब रुक गए। कुछने छड़ उठाई थी, पर अब धीरे से नीचे रख दी।
करण ने अपनी शेरवानी ठीक की। उसकी कलाई पर एक चोट थी — छड़ फेंकते वक़्त चीर गई होगी। वो चोट देख नहीं रहा था। वो सिर्फ़ मुझे देख रहा था।
"मैं आऊँगा," वो बोला। "पर अकेला।"
"अकेला मत आना," मैंने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि तहखाने में अंधेरा बहुत है," मैंने कहा। "और अंधेरे में इंसान अपने आप से ज़्यादा किसी और को नहीं ढूँढ पाता। अपने साथ किसी को लाना। कोई जो तुझे सच बोलने पर मजबूर कर सके।"
करण थोड़ी देर मुझे देखता रहा। फिर उसने अपनी जेब से कुछ निकाला — एक छोटा-सा काग़ज़, मुड़ा हुआ, जिसकी किनारियाँ मैली थीं। उसने उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"ये माँ ने दिया था," वो बोला। "कहा था — 'जब तुझे लगे कि तेरा बाप सच बोल रहा है, तब ये वीर सिंह को देना।'"
मैंने काग़ज़ लिया। खोला।
उस पर गंगा देवी की लिखाई थी — वही लिखाई जो मैंने उस रात हवेली में पीली शीशी के साथ वाले काग़ज़ पर देखी थी। सिर्फ़ एक लाइन थी।
"तेरे बाप ने मुझे नहीं मारा। मेरे भाई ने मारा। और मैं बीस साल उसकी छत के नीचे रही।"
मेरे हाथ काँप गए।
मीरा ने मेरे कंधे के ऊपर से पढ़ा। उसकी साँस रुक गई।
"ये… ये गवाही है," वो धीरे से बोली। "लिखित गवाही। अगर ये अदालत में जाए…"
"पहले तहखाना," मैंने कहा। "पहले सच। फिर अदालत।"
मैंने काग़ज़ मोड़कर अपनी जेब में रखा। करण मेरी तरफ़ देख रहा था — अब उसकी आँखों में गुस्सा नहीं था। कुछ और था। शायद वो चीज़ जो इंसान के अंदर तब पैदा होती है जब वो पहली बार सच के इतने करीब पहुँचता है।
"वीर सिंह," उसने कहा। "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"तू मुझसे डरा नहीं? जब मैंने छड़ उठाई?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी शेरवानी, उसकी भारी छाती, उसके कंधे — सब भैरव की याद दिला रहे थे। पर उसकी आँखें… उसकी आँखें भैरव की नहीं थीं।
"डरा था," मैंने कहा। "पर उस चीज़ से नहीं जो तू कर सकता था। उस चीज़ से डरा था जो तुझसे करवाई जा सकती थी।"
करण कुछ नहीं बोला। वो पलटा और चलने लगा।
"करण," मैंने पुकारा।
वो रुका, पर पलटा नहीं।
"तेरी माँ कहाँ हैं?"
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