Spirit of a Fighter – Chapter 1178
मैं चबूतरे की तरफ़ बढ़ा। मेरे हाथ में भवानी की डायरी थी। मैंने उसे सामने रखा।
"मेरे पिता," मैंने कहा, "भवानी सिंह, बीस साल पहले मरे। लोगों ने कहा — बीमारी। पर ये डायरी उन्होंने खुद लिखी थी, आख़िरी महीने में। इसमें उन्होंने लिखा है कि उनका भाई उनसे अखाड़ा माँगता था। जब नहीं मिला, तो उन्होंने पानी में ज़हर दिया। और जब वो फिर भी नहीं मरे, तो उन्हें उसी कुएँ में फेंक दिया जिसके नीचे आज सब सच छिपा है।"
मैंने रुककर भीड़ को देखा। कुछ औरतें रो रही थीं। एक बूढ़ा आदमी अपना सिर पकड़कर बैठ गया।
"ये डायरी," मैंने कहा, "मेरे पिता के अपने हाथ की लिखाई है। और इसका आख़िरी पन्ना उस आदमी के नाम पर ख़त्म होता है जिसने सब किया।"
मैंने पन्ना पलटा। आख़िरी पन्ने पर सिर्फ़ एक लाइन थी, बड़े अक्षरों में।
"मेरा भाई। मेरा हत्यारा।"
मैंने काग़ज़ ऊपर उठाया। "ये मेरे पिता ने अपने भाई के लिए लिखा था। और उनका भाई —" मैंने ठाकुर की तरफ़ देखा। "— यही महेंद्र सिंह है।"
ठाकुर उठ खड़े हुए। सिपाहियों ने उन्हें पकड़ा, पर वो खींचते रहे।
"झूठ!" वो चिल्लाए। "सब झूठ! ये लड़का — ये मज़दूर का बेटा — मेरे ख़िलाफ़ साज़िश रच रहा है! मैंने कभी भवानी को हाथ नहीं लगाया! मैं उसका भाई था!"
"थे," रणवीर सिंह ने पीछे से कहा। उनकी आवाज़ में वो पुरानी गरज लौट आई थी। "थे। पर भाई वो होता है जो खून का रिश्ता निभाए, सिर्फ़ नाम का नहीं।"
ठाकुर ने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले नहीं देखा था — डर। असली डर।
"तू चुप क्यों रहा बीस साल?" उन्होंने रणवीर सिंह से पूछा। "तू जानता था, फिर भी—"
"क्योंकि मेरे पास सबूत नहीं था," रणवीर सिंह ने कहा। "और मेरी बेटी की जान का ख़तरा था।" उन्होंने मीरा की तरफ़ देखा। "आज सबूत है। और आज मेरी बेटी खुद खड़ी है।"
ठाकुर की नज़र मीरा पर पड़ी। फिर मेरी तरफ़। फिर वो धीरे से बैठ गए।
सरपंच ने हथौड़ा उठाया। "पंचायत का फ़ैसला—"
"एक बात!" ठाकुर ने चिल्लाकर कहा। "एक बात सुन लो! फिर जो करना है करना!"
सरपंच ने हथौड़ा रोका।
ठाकुर ने अपनी आँखें मलीं, जैसे कोई सोकर उठा हो। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और मुस्कुराए।
मैंने वो मुस्कान पहले भी देखी थी। हवेली की आग वाली रात। कोठी के दरवाज़े पर। यही मुस्कान थी। जिसमें ज़हर घुला था।
मैं चबूतरे की तरफ़ बढ़ा। सिपाही हट गए। मैंने ठाकुर की कमीज़ पकड़ ली। मेरा हाथ जली हथेली से भर रहा था, पर मुझे दर्द नहीं महसूस हुआ।
"क्या बक रहा है?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ काँप रही थी।
ठाकुर मेरी पकड़ में भी मुस्कुराते रहे। "भैरव का एक बेटा है," उन्होंने धीरे से कहा। इतना धीरे कि सिर्फ़ मैं सुन सका। "करण। पच्चीस साल। शहर में रहता है। खुद को बड़ा पहलवान समझता है। और उसे यही बताया गया है — कि वीर सिंह ने उसके बाप को जेल में डाला है।"
मेरा हाथ ढीला हो गया।
"तूने—"
"मैंने नहीं," ठाकुर ने कहा। "भैरव ने। अपने बेटे से बदला लेने का काम भैरव को खुद करना था। और वो आज़ाद है।" उन्होंने धीरे से हँसा। "तूने मुझे जेल में डाल दिया, वीर सिंह। पर तूने भैरव को बाहर छोड़ दिया। अब देख, कौन जीतता है।"
पीछे से माँ की आवाज़ आई। नहीं — माँ तो गई थीं। पर आवाज़ थी। मैंने पलटकर देखा।
माँ नहीं थीं। आवाज़ गंगा देवी की थी? नहीं। आवाज़ — किसकी थी?
मैंने फिर देखा। सरस्वती नहीं थीं। वो आवाज़ माँ की थी, पर माँ वहाँ नहीं थीं।
मेरा सिर घूमने लगा। शायद थकान थी। शायद खून की कमी।
माँ पीछे से आईं। असली में आईं। उन्होंने मेरा हाथ खींचा।
"ये ज़हर बो रहा है, बेटा," उन्होंने धीरे से कहा, मेरे कान के पास। "इसे मुँह मत लगा। जो बोया है, वो उगेगा। पर तू उसकी मिट्टी मत बन।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनका चेहरा थका था। बाल बिखरे थे। पर आँखें — आँखों में वो ही चमक थी।
"माँ, तुम—"
"बाद में।" उन्होंने मेरा हाथ दबाया। "पहले इसे जाने दे।"
सिपाही ठाकुर को खींचकर ले जाने लगे। ठाकुर चलते-चलते रुके। वो पलटे। और उन्होंने चंदा की तरफ़ देखा।
चंदा भीड़ में खड़ी थी। दुबली, सफ़ेद कुर्ते में। उसके हाथ जुड़े हुए थे। वो अपने बाप को देख रही थी — और उसकी आँखें सूखी थीं।
"बेटी," ठाकुर ने कहा। उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ अलग था। कोई नरमी नहीं — कोई कोशिश। "तूने भी तो मुझे छोड़ दिया।"
चंदा का चेहरा पत्थर हो गया। एक पल के लिए भी नहीं बदला। उसने मुँह फेर लिया। बस।
और ठाकुर चले गए। सिपाहियों के बीच, हथकड़ी के साथ, चबूतरे से नीचे। उनकी आवाज़ आती रही — कुछ शब्द, कुछ बड़बड़ाहट। फिर वो गाड़ी में बैठाए गए और गाड़ी चल पड़ी।
चंदा वहीं खड़ी रही। उसने एक बार भी पीछे नहीं देखा।
टिंकू ने मेरे पास आकर धीरे से कहा, "ये आदमी जेल में भी ज़िंदा लाश है।"
"हाँ," मैंने कहा।
"पर उसकी बात सच है," टिंकू ने कहा। "करण। वो आएगा।"
रಣवीर सिंह की व्हीलचेयर आगे आई। उन्होंने कहा, "करण को मैं जानता हूँ। वो बुरा लड़का नहीं है। बस उसके कान में ज़हर डाला गया है।"
"कैसे जानते हो?" मैंने पूछा।
"क्योंकि वो मेरे अखाड़े में आया था, दो साल पहले। एक हफ़्ता रुका। कुश्ती सीखी।" रणवीर सिंह ने अपनी मूँछों को छुआ। "वो तेज़ था। बहुत तेज़। पर उसकी कुश्ती में गुस्सा था, ताकत नहीं। मैंने उससे कहा था — 'बेटा, गुस्सा तेरे हाथ चला रहा है, तू नहीं।' और वो चला गया।"
"तो वो लौटेगा?" मीरा ने पूछा।
"लौटेगा।" रणवीर सिंह ने कहा। "पर सवाल ये है — वो किसके लिए लौटेगा? अपने बाप के लिए, या अपने अंदर के गुस्से के लिए?"
——
पंचायत छूट गई।
भीड़ धीरे-धीरे तितर-बितर होने लगी। कुछ लोग मेरे पास आए और चुपचाप मेरा कंधा थपथपाकर चले गए। एक बूढ़ी औरत ने मेरे माथे पर हाथ रखा और कुछ बड़बड़ाई। एक आदमी ने टिंकू से कहा, "तेरी मिठाई अब कहाँ मिलेगी?" और टिंकू हँसकर बोला, "दुकान फिर खुलेगी, भाई। अभी खीर बाकी है।"
माँ मेरे साथ चलीं। उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस चलती रहीं। उनके हाथ में एक कपड़े की पोटली थी जो पहले नहीं थी।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"गंगा देवी ने दिया," उन्होंने कहा।
मैं रुक गया। "तुम उनसे मिलीं?"
"मिली।" माँ ने कहा। "रात में। वो मेरे पास आई थीं। उन्होंने कहा — 'सरस्वती, तेरा बेटा आज जो करेगा, वो मेरे भाई के लिए है। और मैं उसके साथ हूँ।' फिर उन्होंने ये पोटली दी और चली गईं।"
"कहाँ गईं?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "जहाँ उन्हें जाना था।"
मैंने पोटली खोली। अंदर एक चाँदी की अंगूठी थी — वही जो भवानी की थी। और एक काग़ज़। उस पर गंगा देवी की लिखाई में सिर्फ़ चार शब्द थे।
"भाई का हिसाब बाकी।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने काग़ज़ पढ़ा और उसकी आँखें भर आईं।
"वो नंदकिशोर के पास गई है," मीरा ने कहा। "वो उसे खुद ढूँढेगी।"
——
शाम हो गई थी।
अखाड़े में लौटकर मैंने पहली बार अपने आप को चारपाई पर गिराया। टिंकू ने खीर का कटोरा पास रखा। मीरा दीवार से टिककर बैठी। माँ चूल्हे के पास बैठकर कुछ सिल रही थीं।
मेरी आँखें बंद हो रही थीं। नींद आ रही थी। पर तभी —
फाटक पर आवाज़ आई। ज़ोर की। किसी ने लात मारी थी।
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