Spirit of a Fighter1177 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1177

6 min read November 5, 2026

उसने कटोरी में पत्तियाँ मसलकर लगाईं। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं। हल्की। उसने पट्टी बाँधते वक़्त एक बार भी मेरी तरफ़ नहीं देखा — बस अपने काम में लगी रही। पर उसके हाथ धीरे थे। बहुत धीरे।

"तूने वो काग़ज़ पढ़ा?" मैंने पूछा।

"पढ़ा।"

"तो तू क्या सोच रही है?"

उसने गाँठ बाँधी और तब मेरी आँखों में देखा। "मैं सोच रही हूँ कि तेरी माँ बहुत हिम्मत वाली औरत है। और मैं सोच रही हूँ कि वो जानती है कि गंगा देवी कहाँ जाएगी।"

"कहाँ?"

"वहीं जहाँ सब ख़त्म होता है, वीर।" उसने धीरे से कहा। "उसी जगह जहाँ भवानी सिंह की हड्डियाँ थीं।"

मेरा दिल धक-धक करने लगा। "सुरंग?"

"हाँ।"

मैं उठने लगा। उसने मेरा हाथ पकड़कर रोका।

"अभी नहीं। अभी अंधेरा है, और अंधेरे में वो जगह जानवरों की है, इंसानों की नहीं। सुबह पहली किरण के साथ चलेंगे।"

"अगर सुबह तक कुछ हो गया?"

"कुछ नहीं होगा।" उसने मेरी आँखों में देखा। "गंगा देवी अपना हिसाब खुद चुकाना चाहती है। वो तेरी माँ को नहीं मारेगी — वो उसे गवाह बनाएगी।"

"कैसे पता?"

"क्योंकि मैं औरत हूँ, वीर। और मैं जानती हूँ कि जब कोई औरत बीस साल का बदला लेने निकलती है, तो वो गवाह चाहती है। कोई ऐसा जो देखे कि इंसाफ़ हुआ।"

मैंने उसकी बात सुनी। समझ नहीं पाया, पर सुनी।

टिंकू दूर बैठा था, चूल्हे पर कुछ पका रहा था। मैंने पूछा, "क्या बना रहा है?"

"खीर।" उसने कहा, बिना पलटे।

"इस वक़्त?"

"तेरी माँ के लिए।" उसकी आवाज़ भर्रा गई थी। "जब वो लौटेंगी, तो गरम खीर खाएँगी। और मैं उनसे कहूँगा कि ये मैंने बनाई है, दुकान की नहीं है।" उसने आँच धीमी की। "बीस साल से मैं उन्हें अपने हाथ की चीज़ नहीं खिला पाया, वीर। हर बार बहाना बना लिया। अब बहाना नहीं।"

मैं कुछ नहीं बोला। मेरा गला भर आया था।

——

भोर में सबसे पहले रणवीर सिंह आए।

उनकी व्हीलचेयर की आवाज़ आई — पहियों की चरचराहट। वकील रामप्रसाद उन्हें धकेल रहे थे। रणवीर सिंह के हाथ में एक लकड़ी का डिब्बा था।

"पंचायत सात बजे है," उन्होंने कहा। "चबूतरे पर। पूरे इलाक़े को खबर भेज दी गई है। आस-पास के चार गाँव आएँगे। और शहर से भी कुछ लोग आ रहे हैं — जो पहलवान भैरव के पानी से बीमार पड़े थे और बच गए।"

"कितने?" मीरा ने पूछा।

"सत्रह," रणवीर सिंह ने कहा। "सत्रह आदमी आज अपनी गवाही देंगे।"

मैंने उनके हाथ में रखा डिब्बा देखा। "ये क्या है?"

"भवानी की डायरी।" उन्होंने डिब्बा मेरी तरफ़ बढ़ाया। "मेरे पास सिर्फ़ एक कॉपी थी। आज अदालत में जो पेश होगा, वो ये है।"

मैंने डिब्बा खोला। अंदर एक मोटी कॉपी थी, जिसका रंग पीला पड़ गया था। पन्नों पर भवानी सिंह की लिखाई। मैंने एक पन्ना पलटा। ऊपर लिखा था — "पहला दिन।"

"पढ़," रणवीर सिंह ने कहा। "पढ़ और याद रख। क्योंकि आज पंचायत में जो बोलेगा, उससे पहले तुझे ये जानना होगा कि तेरे पिता ने क्या सहा।"

मैंने पढ़ा। मेरी आँखों के सामने भवानी सिंह का आख़िरी महीना खुल गया। दो लाइनें थीं जो मुझे रोक गईं — "आज मेरे भाई ने मुझसे पूछा कि अखाड़ा किसके नाम होगा। मैंने कहा — मेरे शिष्यों के नाम। वो चुप हो गया। उसकी चुप्पी में मौत थी।"

मैंने कॉपी बंद कर दी। मेरे हाथ काँप रहे थे।

"अब चलो," रणवीर सिंह ने कहा।

——

चबूतरा पहले कभी इतना भरा नहीं दिखा।

सुबह के सात बजे थे, पर सूरज अभी नीम के पेड़ों के पीछे था। सामने की ज़मीन पर चार गाँव के लोग बैठे थे। कुछ खड़े थे। पीछे मशालें अभी भी जल रही थीं — सुक्खी बुआ ने रात भर जगाया था, किसी ने बुझाई नहीं थीं।

सुक्खी बुआ सबसे आगे बैठी थीं, पान का बीड़ा मुँह में दबाए। मुझे देखकर उन्होंने कहा, "अरे वीर, तेरी माँ का पता चला? मैंने तो सुना है—"

"बुआ," मैंने कहा। "आज चुगली नहीं। आज गवाही।"

उन्होंने बीड़ा चबाना रोक दिया। फिर धीरे से कहा, "हाँ। आज सच।"

चबूतरे के ऊपर पंचायत के पाँच बुज़ुर्ग बैठे थे। सबसे बीच में सरपंच। उनके दाहिने तरफ़ इंस्पेक्टर शर्मा खड़े थे, हाथ में फ़ाइल। और बाईं तरफ़ — सिपाहियों के बीच — ठाकुर महेंद्र सिंह। हथकड़ी लगी थी। कोट फटा था। बाल बिखरे थे।

उनका चेहरा देखकर लगा कि रात उन्होंने सोया नहीं। आँखों के नीचे काले घेरे थे। पर मूँछें अभी भी तनी हुई थीं।

मैं चबूतरे के नीचे खड़ा हुआ। मीरा मेरे एक तरफ़, टिंकू दूसरी तरफ़। रणवीर सिंह पीछे, व्हीलचेयर पर। कालू काका सबसे पीछे, दीवार से टिके।

सरपंच ने हाथ उठाया। भीड़ चुप हुई।

"आज हम यहाँ बीस साल के हिसाब का फ़ैसला करने आए हैं," सरपंच ने कहा। "जो बोलेगा, सबके सामने बोलेगा। जो सबूत देगा, वो सबके सामने रखेगा। पहले गवाह — रणवीर सिंह।"

रणवीर सिंह की व्हीलचेयर आगे आई। वकील रामप्रसाद ने उन्हें चबूतरे के पास पहुँचाया।

रणवीर सिंह ने एक लंबी साँस ली। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़।

"मैं एक बात कहूँगा," उन्होंने कहा। "और फिर मैं चुप हो जाऊँगा। बीस साल पहले मेरे पैरों ने काम करना बंद किया। डॉक्टरों ने कहा — नसों की बीमारी। मैंने भी मान लिया। पर सच ये है कि मुझे कोई बीमारी नहीं थी। मुझे ज़हर दिया गया था।"

भीड़ में सन्नाटा छा गया।

"किसने?" सरपंच ने पूछा।

रणवीर सिंह ने उँगली उठाई। सीधी ठाकुर की तरफ़। "इसके आदमी ने। और इसके इशारे पर।"

ठाकुर ने होंठ सिकोड़े। "सबूत?"

"सबूत ये है।" रणवीर सिंह ने वकील की तरफ़ देखा। रामप्रसाद ने एक काग़ज़ आगे बढ़ाया। "ये वो पर्ची है जो मेरे पानी के गिलास के नीचे रखी मिली थी, उस रात के बाद जब मैं पहली बार बीमार पड़ा। उस पर लिखा था — 'अगली बार दवा नहीं, ज़हर होगा।' और उस पर ठाकुर की मुहर थी।"

ठाकुर हँसे। हँसी कर्कश थी, जैसे सूखी लकड़ी चटके। "मुहर? कोई भी मुहर बना सकता है।"

"हाँ," रणवीर सिंह ने कहा। "पर मुहर पर लगी स्याही सिर्फ़ एक जगह मिलती है। तेरे हवेली के उस कमरे में, जहाँ तू अपने काग़ज़ रखता है। और वो स्याही का डिब्बा पुलिस ने कल रात उठाया है।"

ठाकुर की हँसी रुक गई।

इंस्पेक्टर शर्मा ने फ़ाइल खोली। "स्याही का डिब्बा, सात पर्चियाँ, और तेरह हस्ताक्षर वाले काग़ज़ — सब सील बंद हैं।"

अब भीड़ में हलचल हुई। किसी ने कुछ कहा। सुक्खी बुआ ने ज़ोर से कहा, "अरे मैंने तो पहले ही कहा था—"

"बुआ," मैंने धीरे से कहा।

वो चुप हो गईं।

इसके बाद एक-एक करके सत्रह पहलवान आए। कोई लाठी के सहारे चल रहा था। कोई दुबला इतना कि हड्डियाँ दिख रही थीं। एक बूढ़ा आदमी था जिसकी आवाज़ निकलती थी पर शब्द साफ़ नहीं थे — उसने इशारे से बताया कि उसने पानी पिया था और फिर तीन महीने बिस्तर से नहीं उठा।

हर गवाही के बाद भीड़ की साँस भारी होती गई।

और फिर सरपंच ने कहा, "अगला गवाह — हरनाम।"

भीड़ में फुसफुसाहट। हरनाम कहाँ है?

इंस्पेक्टर शर्मा ने कहा, "हरनाम कल रात से फ़रार है। उसकी बेटी अंजली भी।"

"तो उसका बयान?" सरपंच ने पूछा।

"उसका लिखा हुआ बयान है।" शर्मा ने एक लिफ़ाफ़ा खोला। "कल रात उसने अपने वकील के पास भेजा। उसमें उसने सब कुछ कबूल किया है — हर मौत का हिसाब, हर पैसे का हिसाब, और भैरव के साथ उसका पूरा रिश्ता।"

मैंने ठाकुर की तरफ़ देखा। उनका चेहरा नहीं बदला था। पर उनकी उँगलियाँ हथकड़ी के अंदर हिल रही थीं।

"और आख़िरी गवाह," सरपंच ने कहा। "वीर सिंह।"

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