Spirit of a Fighter1176 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1176

6 min read November 5, 2026

मैंने उसका माथा छुआ। "कौन अंजली?"

उसकी आँखें मेरी तरफ़ आईं। उनमें कुछ ऐसा था जो मुझे समझ नहीं आया — पहचान। ऐसी पहचान जो डर के साथ आती है।

"वो," उसने फुसफुसाया। "जो भैरव के साथ जेल गई थी। जो मेरे बाबा की… जो उनकी…"

उसकी आवाज़ रुक गई। वो बेहोश हो गई।

मैं उठा। मेरे घुटने काँप रहे थे।

"इंस्पेक्टर साहब," मैंने कहा। मेरी आवाज़ सुनकर मुझे लगा जैसे कोई और बोल रहा है। "भैरव की गाड़ी पर हमला किसने किया?"

शर्मा ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो थकान थी जो सिर्फ़ उन आदमियों के चेहरे पर होती है जिन्होंने बहुत कुछ देखा है।

"पता नहीं," उन्होंने कहा। "पर एक बात पता है। जिस गाड़ी में भैरव को ले जा रहे थे, उसका दरवाज़ा अंदर से खुला था। यानी किसी ने उसे बाहर से नहीं खोला। उसने खुद खोला।"

"तो वो पहले से तैयार था," मीरा ने कहा।

"हाँ," शर्मा ने कहा। "और उसके साथ एक औरत भी फ़रार है। जेल के रिकॉर्ड में उसका नाम है — अंजली। उम्र पचास के आस-पास। भैरव के साथ बीस साल पहले गिरफ़्तार हुई थी, फिर छूट गई, फिर दोबारा पकड़ी गई।"

मेरे दिमाग़ में कुछ चल रहा था। कुछ ऐसा जो मैं पकड़ नहीं पा रहा था। अंजली। अंजली। ये नाम मैंने कहीं सुना था।

फिर याद आया। हवेली की आग वाली रात। मैंने उस जली हुई अजनबी लड़की को बचाया था — वो हरनाम की बेटी निकली थी। पर उसका नाम क्या था?

अंजली।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने भी याद किया। उसका चेहरा बदल गया।

"वो अंजली," मैंने कहा, "हरनाम की बेटी है। और वो भैरव के साथ फ़रार है।"

"मतलब हरनाम भी इस खेल में है," मीरा ने कहा।

"हरनाम," कालू काका ने धीरे से कहा, "बीस साल से इसी खेल में है। उसने ही तो हिसाब रखा है। हर मौत का। हर पैसे का। वो भैरव का दाहिना हाथ है।"

मैंने अपनी जली हथेली को देखा। उस पर मीरा की पट्टी थी, और पट्टी के नीचे से खून की एक पतली लकीर निकल रही थी।

"तो कल," मैंने कहा। "कल पंचायत में क्या होगा?"

रामप्रसाद ने अपना लिफ़ाफ़ा बंद किया। "कल पंचायत में रणवीर सिंह अपना बयान देंगे। वो बीस साल की चुप्पी तोड़ेंगे। और अगर भैरव बाहर है, तो वो वहाँ होगा।"

"तो कल सब तय होगा," मैंने कहा।

"हाँ," रामप्रसाद ने कहा। "पर एक बात याद रखना, वीर सिंह। अदालत में सच जीतता है। पंचायत में ताकत। और भैरव के पास अब सिर्फ़ ताकत बची है।"

वो चले गए।

मैं वहीं खड़ा रहा। अखाड़े की जली हुई इमारत के सामने। धुआँ अब कम हो रहा था। पर आग की गंध हवा में बसी थी।

मीरा मेरे पास आई और उसने मेरा हाथ पकड़ा।

"तू डर रहा है," उसने कहा। बतौर सवाल नहीं। बतौर सच।

"हाँ," मैंने कहा।

"मैं भी," उसने कहा।

हम दोनों वहीं खड़े रहे। कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला। टिंकू ने धीरे से अपनी जेब से बर्फ़ी की डिब्बी निकाली और हमारे बीच रख दी। बिना कुछ कहे।

और तभी अखाड़े के फाटक की तरफ़ से आवाज़ आई। किसी के दौड़ने की आवाज़। तेज़। बेतरतीब।

करण था।

वो दौड़ता हुआ आया। उसका चेहरा लाल था। उसकी आँखों में पानी था।

"वीर!" वो चिल्लाया। "वीर, तेरी माँ —"

मेरा दिल रुक गया।

"क्या हुआ?"

"वो — वो घर पर नहीं है। गुड़िया भी नहीं। मैं उन्हें ढूँढने गया था, दरवाज़ा खुला था, चूल्हा जल रहा था, पर कोई नहीं था। और — और चूल्हे के पास ये पड़ा था।"

उसने अपना हाथ आगे किया। उसकी हथेली पर एक चीज़ थी।

एक पीली शीशी।

मैंने उसे उठाया। उसे सूँघा।

और मेरी साँस रुक गई। उसमें वही गंध थी जो उस रात थी — बादाम का तेल, कपूर, और उसके नीचे, बहुत नीचे, एक और गंध जो मैंने पहले कभी नहीं सूँघी थी। मीठी। बहुत मीठी। इतनी मीठी कि गला भर आए।

"ये क्या है?" मीरा ने पूछा।

मैंने शीशी को उलटा किया। उसमें से एक काग़ज़ की पुड़िया गिरी। मैंने उसे खोला। उसमें दो लाइनें थीं, माँ की लिखाई में।

"वीर, मैं ठीक हूँ। गुड़िया ठीक है। मुझे उससे मिलना है जिसने तेरे बाप को मारा। ये मेरा हिसाब है। तू पंचायत में जा। मेरी चिंता मत कर। और बेटा — उस पानी को मत पीना जो कोई तुझे दे।"

काग़ज़ के नीचे एक और लाइन थी। बहुत छोटी। बहुत धीमी।

"वो तेरे सामने रोएगा। उस वक़्त उस पर तरस मत खाना।"

॥

"वो तेरे सामने रोएगा। उस वक़्त उस पर तरस मत खाना।"

माँ की लिखाई मेरी उँगलियों के नीचे काँप रही थी। काग़ज़ छोटा था, पुड़िया में दबा हुआ, और उस पर माँ की वो लिखाई थी जो मैंने बचपन से चक्की के पास रखी कॉपियों पर देखी थी। मैंने उसे दोबारा पढ़ा। तीन बार। चार बार।

"वीर?" मीरा ने मेरा कंधा छुआ। "क्या लिखा है?"

मैंने काग़ज़ उसे थमा दिया। मेरा गला सूख रहा था।

करण वहीं खड़ा था, हाँफता हुआ। उसके हाथ अभी भी काँप रहे थे। उसने कहा, "मैंने उन्हें बहुत ढूँढा। पीछे के रास्ते तक गया। नहर तक गया। पर कोई नहीं मिला। बस ये शीशी पड़ी थी चूल्हे के पास, और उसके नीचे एक चप्पल का निशान था — छोटा, औरत का।"

"कौन-सी औरत?" मैंने पूछा।

"पता नहीं।"

मैंने आँखें बंद करके शीशी को फिर सूँघा। वही मीठी गंध। इतनी मीठी कि दाँत में दर्द होने लगे। ये गंध मैंने पहले कहीं सूँघी थी। कब? कहाँ?

फिर याद आया। अदालत वाले दिन। गंगा देवी के आँचल से आ रही थी ये गंध। और एक बार — सिर्फ़ एक बार — उस रात भी, जब मैंने उन्हें हवेली के पिछले आँगन में देखा था।

"गंगा देवी," मैंने कहा।

"क्या?" मीरा ने पूछा।

"ये गंध गंगा देवी की है। वो माँ को ले गई है।"

कालू काका ने तभी अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "तो वो खुद हिसाब चुकाने गई है।"

"किससे?"

"उससे जिसने उसका भाई मारा।" कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। "तेरी माँ जानती है, वीर। वो अंदर से जानती है कि गंगा क्या करेगी। इसीलिए वो तुझे पंचायत भेज रही है — ताकि तू बीच में न पड़े।"

मैंने वो काग़ज़ मुट्ठी में भींच लिया।

"मैं पंचायत में जाऊँगा," मैंने कहा। "पर माँ को ढूँढने भी जाऊँगा।"

"दोनों एक ही दिन नहीं हो सकते, बेटा।" कालू काका ने कहा। "आज रात सो जा। सुबह पंचायत है।"

"मैं नहीं सोऊँगा।"

"तो जाग।" उन्होंने अपनी लाठी उठाई। "पर जागते हुए कम-से-कम दिमाग़ का इस्तेमाल कर।"

——

रात बहुत लंबी थी।

अखाड़े की जली इमारत से धुआँ अब भी उठ रहा था। टिंकू ने मेरे लिए चारपाई बिछाई, पर मैं उस पर नहीं लेटा। मैं फाटक के पास बैठ गया, दीवार से पीठ टिकाकर। मीरा मेरे पास बैठी। उसने अपना बैग खोला और उसमें से एक छोटी पीतल की कटोरी और कुछ सूखी पत्तियाँ निकालीं।

"ये क्या है?" मैंने पूछा।

"तुलसी और अदरक।" उसने पत्तियाँ मसलकर कटोरी में डालीं। "तेरे हाथ की पट्टी बदलनी है। पुरानी पट्टी के नीचे से खून निकल रहा है।"

"मीरा, अभी वक़्त नहीं है—"

"वक़्त नहीं है तो दो मिनट लगेंगे।" उसने मेरा हाथ खींच लिया। उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मुझे पहले दिन से पसंद थी। "बाकी सब बाद में।"

उसने पट्टी खोली। जली हुई हथेली पर हवा लगी तो जैसे कोई सुई चुभी। मैंने साँस रोक ली।

"दर्द हो रहा है?" उसने पूछा।

"नहीं।"

"झूठ।"

"हाँ।"

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