Spirit of a Fighter – Chapter 1174
वकील रामप्रसाद की लाठी ज़मीन पर टिकी तो उसकी आवाज़ अखाड़े के सन्नाटे में गूँज गई। पर मैं उनकी तरफ़ नहीं देख रहा था। मेरी नज़र अखाड़े के उस कोने पर थी जहाँ से धुआँ उठ रहा था — काला, मोटा धुआँ, जो ऊपर जाकर आसमान में घुल रहा था।
"वीर," मीरा ने मेरा हाथ खींचा। "काग़ज़ पढ़।"
"नहीं।"
"क्या?"
"अभी नहीं।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "अंदर चंदा है।"
मीरा का मुँह खुला रह गया। "तू पागल है। वो इमारत गिर रही है।"
"तो गिरने दे।" मैंने धोती का छोर कमर से कसकर बाँधा। "वो अंदर बंद है। उसे कोई नहीं बचाएगा।"
कालू काका ने मेरा कंधा पकड़ा। उनके हाथ में जो ताकत बची थी, वो सब उन्होंने उस पकड़ में डाल दी। "बेटा, ये आग नहीं है। ये उसकी आग है। इसने आग लगवाई है। ये तुझे बुला रही है।"
"तो मैं जा रहा हूँ," मैंने कहा। "बुलाया है तो जाना तो पड़ेगा।"
मैं भागा।
दरवाज़े का लोहे का पल्ला गरम था। मैंने कपड़े से हाथ लपेटकर धक्का दिया। अंदर से धुआँ ऐसा निकला कि मेरी आँखें एकदम बंद हो गईं। पानी बहने लगा। मैंने मुँह धोती में छिपाया और नीचे झुककर अंदर घुसा।
अंदर सब लाल था। दीवारें, छत, फ़र्श — सब। आग ऊपर चढ़ रही थी, लकड़ियों में से, बीम से, और वो आवाज़ कर रही थी — कड़क, कड़क — जैसे कोई हड्डी चबा रहा हो।
"चंदा!" मैंने चिल्लाया। आवाज़ धुएँ में दब गई।
कोई जवाब नहीं।
मैंने नीचे देखा। फ़र्श पर तेल फैला था, और उस पर आग नाच रही थी। मैंने दीवार की तरफ़ से रास्ता बनाया। जहाँ आग कम थी। जहाँ पैर रखने की जगह थी। मेरी चप्पल का तला पिघलने लगा। मैंने चप्पल उतार फेंकी।
"चंदा!"
इस बार एक आवाज़ आई। कमज़ोर। किसी कोने से।
मैं खिड़की के पास गया। वो वहीं थी। ज़मीन पर पड़ी। उसका सिर खिड़की की सिल्ली से टकराया था, और खून उसके माथे से बहकर आँखों तक आ गया था। उसकी आँखें आधी खुली थीं।
"उठ," मैंने कहा। "उठ, चंदा।"
उसके होंठ हिले। कुछ बोली, पर आवाज़ नहीं निकली।
मैंने उसे गोद में उठाया। वो हल्की थी — इतनी हल्की कि मुझे लगा जैसे मैंने किसी बच्ची को उठाया हो। उसके कपड़ों की गंध में धुआँ और जला हुआ तेल था। और उसके बालों में — मैंने साफ़ सुना — कपूर की गंध थी। वही कपूर। वही जो माँ के आँचल में था।
मैं पलटा। दरवाज़े तक का रास्ता अब लंबा लग रहा था। आग बीच में आ गई थी। छत से जलती लकड़ी गिर रही थी।
मेरे सामने एक बीम गिरी। आग की चिंगारियाँ उड़ीं। मैंने चंदा को सीने से चिपकाया और उस पर झुक गया।
"नहीं," मैंने कहा। अपनी आवाज़ सुनकर मुझे अजीब लगा। "नहीं, आज नहीं।"
मुझे अपनी माँ याद आई — चक्की पर बैठी, कमर पकड़े हुए। गुड़िया याद आई — स्कूल की कॉपी लिए, हर रोज़ पूछती हुई, "भैया, आज क्या जीता?" और मुझे अपने पिता याद आए — जिन्हें मैंने कभी देखा नहीं, बस उनकी शीशी पकड़ी है।
मैं दौड़ा। धुएँ के बीच से। आग के बीच से। मेरा कंधा लकड़ी से टकराया। जल गया। मैंने चंदा को कसकर पकड़ा और खिड़की की तरफ़ बढ़ा।
खिड़की पहले से टूटी थी। मैंने चंदा को पहले बाहर निकाला — उसे दोनों हाथों से उठाकर खिड़की की सिल्ली पर रखा, फिर एक झटके में धकेला। नीचे मिट्टी थी। मीरा और टिंकू दौड़कर आए और उन्होंने उसे थाम लिया।
फिर मैं चढ़ा। मेरी धोती का छोर बीम के नीचे फँस गया था। मैंने खींचा। नहीं छूटा। मैंने कमर से गाँठ खोली और धोती वहीं छोड़कर, बनियान में, खिड़की से कूद गया।
नीचे गिरते वक़्त मुझे लगा कि आसमान लाल है। फिर मेरी पीठ मिट्टी पर लगी और साँस रुक गई।
मैं घुटनों के बल बैठ गया। धुएँ से आँखों से पानी बह रहा था — बहुत पानी, जो रुकने का नाम नहीं ले रहा था। मैंने आँखें मलीं तो हाथों में जलन हुई। मेरी हथेलियाँ लाल थीं। ऊपर की खाल उतर आई थी।
चंदा मिट्टी पर पड़ी थी। उसका सिर मीरा की गोद में था। मीरा ने अपनी बैग से हरी शीशी निकाली — वो अदरक-तुलसी वाली — और उसके घाव पर उँगली से लगाई। चंदा के चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ीं। दर्द से।
टिंकू भागकर आया। उसके हाथ में मटके का पानी था। उसने मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने पिया। पानी में धुएँ की गंध थी। पर वो ज़िंदगी जैसा लगा।
"तेरे हाथ," मीरा ने कहा।
उसकी आवाज़ अजीब थी। मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो मेरे हाथों को देख रही थी, और उसका चेहरा सफ़ेद था — बिलकुल वैसा सफ़ेद जैसे उस रात नहर किनारे था, जब मैंने उसके कंधे पर सिर रखकर रोया था।
"कुछ नहीं है," मैंने कहा।
"कुछ नहीं?" वो मेरे हाथ के पास आई। "वीर, तेरी हथेली की खाल जलकर उतर गई है।"
"तो फिर आ जाएगी।"
"तुम पागल हो।" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "बिलकुल पागल। तुमने फिर अपनी जान दाँव पर लगा दी। बिना सोचे। बिना —"
"आदत है," मैंने कहा। हँसने की कोशिश की। हँसी निकली पर उसमें दर्द था। छाती जल रही थी, धुएँ से।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में गुस्सा था और उस गुस्से के पीछे कुछ और भी था — डर। मेरे लिए डर।
उसने अपनी कुर्ता का पल्ला चीरा। पट्टी बनाई। मेरा हाथ पकड़ा और उस पर बाँधने लगी। उसके हाथ काँप रहे थे। उसकी उँगलियाँ मेरी जली हथेली पर लगीं तो मैंने दाँत भींचे। वो रुक गई।
"दर्द हो रहा है?"
"नहीं।"
"झूठे।" उसने धीरे से पट्टी कसी। "अगली बार बिना मुझे बताए आग में मत घुसना।"
"तुझे बताता तो तू मना कर देती।"
"तो मना कर देती।" उसने गाँठ बाँधी और मेरी आँखों में देखा। "पर कम से कम मुझे पता होता। मैं यहाँ खड़ी इंतज़ार नहीं करती कि तू ज़िंदा निकलेगा या नहीं।"
उसकी आवाज़ आख़िरी शब्दों पर टूट गई। उसने मुँह फेर लिया। बालों की लट उसके कान पर आ गई, और उसने उसे कान के पीछे नहीं किया। बस ऐसे ही छोड़ दिया।
तभी चंदा ने आँखें खोलीं।
उसने पहले आसमान देखा। फिर मीरा को देखा। फिर मेरी तरफ़ देखा। उसके आँखों में पहले कुछ समझ नहीं आया। फिर आया।
और उसके होंठ हिले।
"बाबा…"
मीरा ने उसका सिर सहलाया। "आराम करो, चंदा। अब सब ठीक है।"
"बाबा ने…" उसकी आवाज़ सूखी थी, टूटी हुई। "बाबा ने मुझे अंदर बंद कर दिया था।"
अखाड़े के आँगन में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा कि मुझे अपनी साँस की आवाज़ सुनाई दी।
"उन्होंने कहा," चंदा ने धीरे से कहा, जैसे कोई पुरानी बात याद कर रही हो, "कि अगर तेरे भैया को कोई नहीं बचा पाएगा, तो वो अपने आप अंदर आ जाएगा। और अंदर आकर वो कभी बाहर नहीं जाएगा। उन्होंने मुझे दरवाज़े के पास खड़ा किया। मैंने कहा, बाबा, मुझे डर लग रहा है। उन्होंने मेरा हाथ नहीं पकड़ा।" उसकी आँखों से पानी बहा। "उन्होंने सिर्फ़ कहा — तेरी जगह यहीं है, तू भी उसी तरह जाएगी जैसे तेरी माँ गई।"
मैंने अपना हाथ उसके सिर पर रखा। कुछ नहीं कहा। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहूँ। सिर्फ़ हाथ रखा और वहीं रहा। उसके सिर के घाव पर मीरा की पट्टी धीरे-धीरे लाल हो रही थी। पर उसकी साँस चल रही थी। चल रही थी।
चंदा ने मेरी कलाई पकड़ा। उसकी उँगलियाँ कमज़ोर थीं।
"उन्होंने मुझे कुछ और भी दिया था," उसने फुसफुसाया। "अंदर जाने से पहले। एक डिबिया। उन्होंने कहा कि अगर मैं ज़िंदा बची, तो ये वीर सिंह को देना। और अगर नहीं बची, तो कोई नहीं देगा।"
"डिबिया कहाँ है?"
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