Spirit of a Fighter1172 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1172

7 min read November 5, 2026

"बस कर!" करण ने कहा। उसकी आवाज़ पहली बार ऊँची हुई, और वो आवाज़ किसी और की लगी। "बस कर, वीर सिंह। मैं तेरी बात नहीं सुनना चाहता।"

इंस्पेक्टर शर्मा ने एक सिपाही को इशारा किया। वो आगे बढ़ा और ठाकुर को पकड़कर ले जाने लगा।

और जाते-जाते ठाकुर एक बार पलटा।

"करण," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो बाप जैसी मिठास भरी थी। "आज रात अखाड़े में वो तुझसे लड़ने आएगा। मैंने उसे बता दिया है कि तूने उसके बाप को जेल में डाला। अब तू देख लेना — कौन सच्चा है।"

शर्मा ने उसे धकेला और वो अंधेरे में गायब हो गया।

करण ने मेरी तरफ़ एक आख़िरी बार देखा। उसकी आँखों में वो कुछ था जो अभी-अभी टूटा था।

"मुझे अकेला छोड़ दे," उसने कहा। और वो गंगा देवी की तरफ़ भी नहीं देखा — सीधा पलटा और अंधेरे में चला गया।

गंगा देवी ने अपना मुँह हाथों से ढक लिया।

मीरा ने मेरी बाँह पकड़ी।

"करण को अभी सच बताना होगा," उसने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर उसमें वो काट थी जो मीरा में हमेशा रहती है। "वरना ये ठाकुर का हथियार बन जाएगा। और एक बार बन गया, तो फिर सालों तक नहीं छूटेगा।"

मैंने सिर हिलाया। पर मेरी ज़ुबान नहीं चली।

टिंकू मेरे पास आया। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा।

"भाई," उसने कहा, बहुत धीरे। "करण बुरा नहीं है। मैंने उसे देखा है। जब वो अखाड़े में आता था, तो किसी की चोट पर पानी लेकर दौड़ता था। जिसे कोई नहीं देखता, उसे वो देखता है। ये ठाकुर की बातें उसके दिल में घुसी हुई हैं। बस।"

"पर वो मेरी बात नहीं सुन रहा," मैंने कहा।

"तो सुनाओ ना," गंगा देवी ने कहा। उन्होंने अपना मुँह हाथ से हटाया। उनकी आँखें लाल थीं, पर आवाज़ अब काँप नहीं रही थी। "वो मेरी बात नहीं सुनेगा। मैं बीस साल उसके पास नहीं रही, मैं उसके लिए कोई नहीं हूँ। पर तू — तू भवानी का बेटा है। भवानी का नाम उसने बचपन में सुना है, अच्छे के लिए सुना है। भैरव भी उससे भवानी की इज़्ज़त करवाता था। तू उससे भवानी की क़सम देकर बात कर।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो थकान थी जो बीस साल की चुप्पी के बाद आती है।

"आप मेरे साथ चलिए," मैंने कहा।

"नहीं," उन्होंने कहा। "वो मुझे देखकर भागेगा। तू अकेला जा। और सुन — अगर वो न माने, तो उसे ये दे देना।"

उन्होंने अपने गले से एक छोटी पोटली उतारी। अंदर कुछ था — नरम, कपड़े जैसा।

"ये क्या है?" मैंने पूछा।

"भैरव की धोती का कोना," उन्होंने कहा। "उस दिन का, जिस दिन करण पैदा हुआ था। उसने इसे अपने हाथ से काटकर मुझे दिया था और कहा था — 'इसे करण के पास रखना, जब वो बड़ा हो तो देना। और कहना कि उसका बाप उसे प्यार करता था।'"

मैंने पोटली अपनी जेब में रखी।

गाँव लौटते वक़्त आसमान में तारे निकल आए थे। रास्ते में कोई कुछ नहीं बोला। मीरा मेरे साथ चल रही थी और उसका हाथ मेरे हाथ में था — कब पकड़ा, मुझे पता भी नहीं चला।

रामपुर पहुँचे तो सुक्खी बुआ चबूतरे पर बैठी थीं, और उनके साथ आधा गाँव था। मुझे देखते ही वो उठीं।

"अरे वीर!" वो चिल्लाईं। "सब ठीक है ना? मैंने तो सुना है कि ठाकुर ने —"

"बुआ," मैंने काटा। "करण कहीं दिखा?"

उनका चेहरा उतर गया।

"वो तो…" उन्होंने इधर-उधर देखा। "वो अभी-अभी यहाँ से गुज़रा। बोला कुछ नहीं। बस गया। मैंने पूछा भी तो मुँह फेर लिया।"

"किधर गया?"

"अखाड़े की तरफ़," सुक्खी बुआ ने कहा। और फिर उन्होंने वो जोड़ा जो सुक्खी बुआ ही जोड़ सकती थीं। "पर वीर, उसके हाथ में कुछ था। कुछ लोहे जैसा। और उसकी आँखें — अरे, मैंने तो ऐसी आँखें कभी नहीं देखीं। जैसे किसी ने उसके अंदर का दीया बुझा दिया हो।"

अखाड़े का फाटक खुला था। अंदर अंधेरा था, सिर्फ़ दूर तहखाने की तरफ़ जाती सीढ़ियों पर एक लालटेन की रोशनी हिल रही थी।

कालू काका दीवार के सहारे खड़े थे। उनकी सफ़ेद दाढ़ी में हवा चल रही थी।

"काका," मैंने कहा। "वो तहखाने में गया?"

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें सूखी थीं, पर उनमें वो डर था जो मैंने उनमें पहले भी देखा था — बीस साल पुराना डर।

"वो गया," उन्होंने कहा। "और वीर — मैंने उसे रोका। मैंने कहा, बेटा, वहाँ मत जा। वहाँ की मिट्टी में सिर्फ़ दर्द है। पर उसने मेरी बात नहीं सुनी।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आवाज़ धीमी हुई। "वो तेरे बाप की डायरी लेकर गया। भैरव की लिखी चिट्ठी भी उसके हाथ में थी। और वो बोला — 'काका, मैं आज सच का आख़िरी पन्ना पढ़ूँगा।'"

मैंने अखाड़े की मिट्टी में पैर रखा। वो मिट्टी अब भी वैसी ही थी — ठंडी, गीली, और उसमें वो पुरानी गंध थी जो मुझे हमेशा मेरे बाप के पास ले जाती है।

तहखाने की सीढ़ियाँ अंधेरी थीं। नीचे से लालटेन की पीली रोशनी आ रही थी, और साथ में एक आवाज़ — किसी के रोने की आवाज़, पर अजीब तरह से रुक-रुक कर, जैसे कोई रोने को भी छुपा रहा हो।

मैं सीढ़ियाँ उतरा। मेरे पीछे मीरा थी, और उसके पीछे टिंकू — उसके हाथ में वही लोहे का डंडा था जो उसने सुरंग में पकड़ा था।

तहखाने के फ़र्श पर करण बैठा था। उसके घुटनों के बीच एक काग़ज़ था, और उसके दोनों हाथों में — एक हाथ में काग़ज़, और दूसरे हाथ में लोहे की छड़। छड़ की नोक फ़र्श पर टिकी थी और उसकी आवाज़ से तहखाना गूँज रहा था।

वो रो रहा था। सच में रो रहा था। उसके आँसू उस काग़ज़ पर गिर रहे थे और स्याही फैल रही थी।

"करण," मैंने कहा।

उसने सिर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं, और उनमें वो कुछ था जो तालाब के किनारे नहीं था। यहाँ वो कुछ और था। कुछ टूटा हुआ।

"तूने मेरे बाप को जेल में डाला," उसने कहा। उसकी आवाज़ में रोना था, और गुस्सा था, और वो सब कुछ जो एक बेटे के दिल में होता है जब उसे पता चलता है कि उसका बाप वो नहीं था जो उसने सोचा था।

"करण, सुन—"

"मैंने ये चिट्ठी पढ़ी," उसने कहा, और काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "भैरव की लिखाई। देख — 'मेरा बेटा करण, तू मुझे माफ़ कर देना। मैंने जो किया, तेरे लिए किया। तेरे बड़े होने के लिए। ताकि तेरे पास नाम हो, ज़मीन हो, अखाड़ा हो। मैंने सब कुछ तेरे लिए किया।'"

उसकी आवाज़ टूटी।

"ये सच है," उसने कहा। "ये सच है ना? बोल!"

"करण," मीरा ने कहा। वो मेरे बगल से आगे आई। "ये सच नहीं है। तेरे बाप ने जो किया, वो तेरे लिए नहीं किया। वो अपने लिए किया। अपने पैसे के लिए, अपने नाम के लिए। तू तो बस उसका बहाना था।"

करण ने छड़ उठाई। मीरा पीछे नहीं हटी।

और मैंने वो किया जो मुझे करना चाहिए था — मैं करण के सामने घुटनों के बल बैठ गया।

तहखाने की ठंडी मिट्टी पर। उसके सामने। अपने दुश्मन के बेटे के सामने।

"तू क्या कर रहा है?" करण ने कहा। उसकी आवाज़ ऊँची हुई। "उठ! उठ ना!"

"नहीं," मैंने कहा। "मैं तब तक नहीं उठूँगा जब तक तू मेरी बात नहीं सुनता।"

"मेरे बाप—"

"तेरे बाप ने बीस साल में उन्नीस पहलवानों को मारा।"

मैंने कहा। ठंडे पानी की तरह। बिना चिल्लाए।

करण की छड़ हवा में रुकी।

"उन्नीस," मैंने दोहराया। "उन्नीस नौजवान, करण। जो अखाड़े में आए, मेहनत करने। जिनकी माँएँ बैठी हैं आज भी, और सोचती हैं कि उनके बेटे की मौत कुदरत का सितम थी। तेरे बाप ने उनके पैसे खाए और उनकी जान लीं। और तेरे बाप ने मेरे बाप को ज़हर दिया — भवानी सिंह को। जिसने तुझे बचपन में कंधे पर बिठाया था, जिसकी गोद में तू खेला था।"

करण की छड़ धीरे-धीरे नीचे आई।

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