Spirit of a Fighter – Chapter 1171
"तू मेरे साथ क्यों आ रही है?" मैंने पूछा। "ये तेरी लड़ाई नहीं है।"
वो रुकी। और फिर उसने वो कहा जो मैंने सोचा नहीं था।
"मेरे पिता के पैर कैसे गए," उसने कहा, "वो आज तक कोई नहीं बता रहा। और आज ठाकुर ने कहा — भैरव का बेटा। तो अगर करण भैरव का बेटा है, तो शायद वो जानता है कि मेरे पिता को किसने ज़हर दिया।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मैं अपने पिता के लिए आ रही हूँ। और तेरे लिए भी।"
मैंने उसका हाथ कसकर पकड़ा।
हम तालाब के पास पहुँचे। पानी काला था, स्थिर, और उस पर चाँद की रोशनी पड़ रही थी — एक पतली लकीर, जैसे कोई चाकू रखा हो।
और तालाब के किनारे, एक पत्थर पर, करण बैठा था।
वो अकेला था। उसके हाथ खाली थे। कोई हथियार नहीं, कोई आदमी नहीं। सिर्फ़ वो, और उसके सामने रखी एक छोटी लोहे की डिब्बी।
वो उठा। और उसने मेरी तरफ़ देखा।
"तू आ गया," उसने कहा। उसकी आवाज़ शांत थी। "मैं जानता था तू आएगा।"
"तू भैरव का बेटा है?" मैंने पूछा। सीधा। बिना घुमाए।
करण ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। और फिर उसने वो किया जो मैंने सोचा नहीं था — वो हँसा। पर वो हँसी ठाकुर की हँसी नहीं थी। वो थकी हुई थी, बहुत थकी हुई।
"मैं बीस साल से इस सवाल का जवाब ढूँढ रहा हूँ," उसने कहा। "और आज भी मुझे नहीं पता।"
उसने लोहे की डिब्बी उठाई और मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"ये ले," उसने कहा। "ये तेरे बाप की है। भैरव ने मुझे दी थी — कहा था 'ये तेरे बाप की है, इसे सँभाल के रख।' और मैंने बीस साल इसे खोला नहीं। क्योंकि मुझे डर था कि अंदर क्या मिलेगा।"
मैंने डिब्बी नहीं छुई। "तू पहले बता," मैंने कहा। "तू किसके साथ है?"
करण ने डिब्बी नीचे रख दी। और उसने अपनी कलाई उठाई, और उस पर वो निशान दिखाया जो मैंने सिर्फ़ एक बार देखा था — चाँदी की चेन का निशान, कलाई पर, बहुत पुराना।
"मैं किसी के साथ नहीं हूँ," उसने कहा। "मैं बीस साल से अकेला हूँ। और आज मुझे पता चला कि मेरे बाप ने क्या किया।" उसकी आवाज़ टूटी। "मैंने सोचा था वो मर गया। मैंने सोचा था वो एक अच्छा आदमी था। और आज — आज मुझे पता चला कि वो वही था जिसने सबको ज़हर दिया।"
तालाब के पानी में हवा चली। एक ठंडी हवा, जिसमें गीली मिट्टी की गंध थी।
"तो तूने ठाकुर की बात क्यों मानी?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ में गुस्सा था। "तूने उसका साथ क्यों दिया?"
"मैंने साथ नहीं दिया," करण ने कहा। "मैंने सिर्फ़ सुना। और मैं यहाँ इसलिए आया कि मैं तुम्हें बता सकूँ।" उसने डिब्बी की तरफ़ इशारा किया। "ये तेरे बाप की डायरी है। और इसमें वो सब लिखा है जो भैरव ने किया। और एक बात और — मेरी माँ का नाम।"
मैंने डिब्बी खोली।
अंदर एक छोटी डायरी थी, जली हुई किनारों वाली, और उसके नीचे एक काग़ज़ — जिस पर सिर्फ़ एक नाम लिखा था।
"गंगा देवी।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"ये—" मैंने कहा।
"मेरी माँ," करण ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो दर्द था जो सिर्फ़ सच में होता है। "भैरव ने मुझे बताया था कि मेरी माँ मर गई। पर ये काग़ज़ — ये भैरव की लिखाई है। और इसमें लिखा है कि मेरी माँ ज़िंदा है। और वो — वो तेरी माँ के साथ रहती है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद था।
"गंगा देवी," मीरा ने धीरे से कहा, "वो औरत जिसने हवेली में हमें सब कुछ बताया था? वो?"
करण ने सिर हिलाया।
और तभी — तालाब के पार, अंधेरे में — एक आवाज़ आई। बहुत धीमी, बहुत शांत।
"करण। बेटा।"
हम सब पलटे।
और अंधेरे में, एक लालटेन की रोशनी में, एक औरत खड़ी थी। उसके हाथ में लालटेन थी, और उसका चेहरा — मैंने उसे हवेली में देखा था, पर आज उस पर से वो नकाब उतर गया था। वो कोई और नहीं थी।
वो गंगा देवी थीं।
और वो रो रही थीं।
॥
लालटेन की रोशनी उसके हाथ में काँप रही थी। और उसका रोना चुप था — ऐसा रोना जो सालों से अंदर दबा हो और आज पहली बार बाहर आया हो।
करण अपनी जगह से हिला नहीं। उसने उस औरत को देखा, और उसके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले किसी के चेहरे पर नहीं देखा था — डर और उम्मीद एक साथ।
"तू… तू मेरी माँ है?" उसकी आवाज़ बच्चे जैसी हो गई थी।
गंगा देवी ने लालटेन नीचे रख दी। उनके हाथ ऐसे फैले जैसे कोई पक्षी अपने बच्चे को ढूँढ रहा हो।
"बीस साल," उन्होंने कहा। "बीस साल मैंने तुझे दूर से देखा। जब तू अखाड़े में आया, मैं दीवार के पीछे खड़ी रही। जब तूने पहली बार मिट्टी में हाथ डाला, मैंने वो मिट्टी अपने आँचल में बाँधी।" उनकी आवाज़ रुकी, फिर चली। "मैं तेरे पास आ सकती थी। पर भैरव ने कहा था — अगर मैंने तुझे गले लगाया, तो वो तुझे उसी रात उठा ले जाएगा। और मैंने सोचा — दूर से देख लेना ही काफ़ी है।"
करण ने एक कदम आगे रखा। फिर रुक गया।
"तो तू जानती थी?" उसकी आवाज़ में अब कुछ और था — गुस्सा की पहली लपट। "तू जानती थी कि मेरा बाप कौन है? तू जानती थी कि वो क्या करता है? और तूने मुझे कुछ नहीं बताया?"
"मैंने तुझे बताया होता," गंगा देवी ने धीरे से कहा, "तो तू उसी दिन मर जाता। भैरव का हाथ उस पर था जो उसका हिस्सा था। और तू—तू उसका बेटा था।"
तालाब के पानी में एक मछली उछली और गिरी। वो आवाज़ इतनी ज़ोर से आई कि मैं चौंक गया।
करण ने अपना सिर नीचे किया। उसके कंधे हिल रहे थे।
तभी पीछे से पैरों की आवाज़ आई — और साथ में लोहे की ज़ंजीर की खनक। इंस्पेक्टर शर्मा अपने दो सिपाहियों के साथ आए, और उनके बीच में ठाकुर महेंद्र सिंह था — हाथ बँधे, कपड़े फटे, पर चेहरे पर वो हँसी अभी भी।
"अरे अरे," ठाकुर ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो पुरानी चाशनी वापस आ गई थी। "इतनी जल्दी सब मिल गए। परिवार का मिलन। क्या बात है।"
इंस्पेक्टर शर्मा ने उसकी बाँह पकड़ी और आगे बढ़ाया।
"ये औरत कौन है?" शर्मा ने पूछा।
"ये?" ठाकुर ने गंगा देवी की तरफ़ देखा और हँसा। "ये भैरव सिंह की बीवी है। और ये लड़का —" उसने करण की तरफ़ सिर हिलाया, "— इसका बेटा। भैरव का बेटा। खून का रिश्ता। बाप जेल में, बेटा यहाँ।"
शर्मा ने कुछ नहीं कहा। पर उनकी आँखें मेरी तरफ़ आईं।
"सर," मैंने कहा, "करण तो हमारे साथ है। उसने ही मुझे डिब्बी दी। उसने ही बताया कि क्या-क्या हुआ।"
ठाकुर ने वो हँसी फिर छोड़ी। और यह हँसी पहले से अलग थी — इसमें कुछ और था। जैसे कोई आख़िरी पत्ता खेल रहा हो।
"बेटा, करण तुझे क्या बताएगा?" उसने कहा। "करण को पता ही नहीं कि उसका बाप कौन है। मैंने उसे बीस साल तक यही सिखाया — कि भैरव सिंह एक बेगुनाह पहलवान था। जिसे रणवीर सिंह और भवानी सिंह ने मिलकर मारा। मैंने उसे ये भी बताया कि रणवीर सिंह ने उसके बाप की ज़मीन हड़पी और उसकी माँ को भगा दिया।"
मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन खिसक गई।
मैंने करण की तरफ़ देखा। वो अपनी माँ से दूर हट गया था, और उसका चेहरा — उसका चेहरा अब वैसा नहीं था जैसा अभी था। उसकी आँखों में कुछ बदल गया था। वो उलझन जो सिर्फ़ झूठ पीने से आती है।
"करण," मैंने कहा। "ये आदमी झूठ बोल रहा है। तेरे बाप ने खुद —"
"मेरे बाप ने क्या किया, ये मुझे तू बताएगा?" करण ने काट दिया। फिर उसकी आवाज़ थोड़ी नरम हुई, पर सिर्फ़ थोड़ी। "मुझे सब पता है। मुझे पता है कि मेरे बाप ने क्या-क्या किया। पर ये भी पता है — कि तेरे बाप ने उसे नीचा दिखाया। और तूने उसे जेल भिजवाया।"
"वो जेल में इसलिए है क्योंकि उसने बीस साल तक —"
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