Spirit of a Fighter – Chapter 1170
भीड़ में सन्नाटा छा गया। सिर्फ़ मशालों की आवाज़ बची — चट-चट, चट-चट।
"मैं आज तेरे सामने खड़ी हूँ," माँ ने कहा, और उसका एक हाथ मेरे कंधे पर आया, और उसकी पकड़ मज़बूत थी, "और मैं तुझे माफ़ नहीं करूँगी। न आज, न कल, न कभी। तू जहाँ जाएगा, मेरा ये शब्द तेरे पीछे जाएगा।"
ठाकुर ने उसकी तरफ़ देखा। बहुत देर तक। और फिर वो हँसा।
वो हँसी मेरे रोंगटे खड़े कर गई। क्योंकि वो हँसी किसी हारे हुए आदमी की नहीं थी। वो हँसी किसी ऐसे आदमी की थी जिसके पास अभी भी कुछ बचा था।
"माफ़ करने की बात कौन कर रहा है?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो पुराना ज़हर लौट आया था। "माँ, तू समझती है कि मैं यहाँ खत्म हो गया? मैं तो अभी शुरू हुआ हूँ।"
इंस्पेक्टर शर्मा ने उसका हाथ पकड़ा — "चलो, ज़्यादा मत बोलो।"
"एक बात," ठाकुर ने कहा, और वो रुका। "मेरे पास एक आखिरी तोहफा है। तुम सबके लिए।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। और मुझे कुछ ठंडा सा महसूस हुआ, पेट में, जैसे कोई बर्फ़ का टुकड़ा निगल गया हो।
"क्या तोहफा?" मैंने पूछा।
वो मुस्कुराया। "भैरव का बेटा। करण।"
मैं सुन्न रह गया।
"क्या बोला तूने?" मैंने कहा।
"करण," ठाकुर ने दोहराया, और उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो सिर्फ़ ज़हर में होती है। "भैरव सिंह का बेटा। तुझे पता नहीं? तेरे पिता भवानी ने भैरव को मारा था — नहीं, माफ़ करना, भैरव ने तेरे पिता को मारा था, और भैरव का बेटा बीस साल से तेरे पीछे लगा है।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"तू झूठ बोल रहा है," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ सख़्त थी, पर उसके होंठ काँप रहे थे। "करण — करण तो अखाड़े का सबसे ईमानदार पहलवान है। वो मेरे पिता के साथ काम करता है। वो—"
"वो भैरव का बेटा है," ठाकुर ने कहा। "और वो बीस साल से तुम सबके बीच रहा है। तुम्हारी रोटी खाई है, तुम्हारा पानी पिया है, और वो अपने बाप की मौत का बदला लेने का इंतज़ार कर रहा है।"
भीड़ में फुसफुसाहट फैली। कुछ लोग करण को ढूँढने लगे। वो वहाँ नहीं था।
"कहाँ है करण?" किसी ने पूछा।
"वो यहाँ था," किसी और ने कहा। "मैंने उसे अभी देखा था।"
"वो चला गया," ठाकुर ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो विजय थी जो मुझे चुभ गई। "मैंने उसे बता दिया था कि आज रात सब कुछ खत्म हो जाएगा। वो जानता था कि उसे क्या करना है।"
मैंने ठाकुर का कॉलर पकड़ा। मेरे हाथ काँप रहे थे, पर मेरी आवाज़ नहीं।
"क्या करना है?" मैंने कहा। "करण को क्या करना है?"
ठाकुर हँसा। "पूछता है? तेरी माँ। तेरी बहन। तेरे दोस्त। तू सोचता है कि तूने सब बचा लिया? तूने कुछ नहीं बचाया। तूने सिर्फ़ मुझे बचाया — मुझे, जो अब जेल में आराम से बैठेगा, और करण बाहर तुम सबका हिसाब करेगा।"
इंस्पेक्टर शर्मा ने उसे खींचा। "बस। बहुत हुआ।"
पर ठाकुर ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने सिर्फ़ एक बार देखी थी — कब्र के पास, जब उसने कहा था "तेरे पास दो दिन हैं"।
"तेरा बाप," उसने धीरे से कहा, इतना धीरे कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ, "तेरा बाप भी ऐसे ही खड़ा था। बीस साल पहले। और वो भी सोचता था कि उसने सब जीत लिया।"
और सिपाही उसे ले गए।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे हाथ में छुरी थी — माँ ने वो मुझे वापस दी थी, या मैंने उठा ली थी, मुझे याद नहीं — और मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था।
"करण," मैंने कहा।
मीरा मेरे पास आई। उसका चेहरा सफ़ेद था।
"वो झूठ बोल रहा है," उसने कहा। "करण — मैं उसे दस साल से जानती हूँ। वो मेरे पिता के साथ अखाड़े में काम करता है। वो—"
"तूने उसके बारे में कभी सोचा?" मैंने पूछा। "उसका कोई घर? उसका कोई परिवार?"
मीरा रुक गई।
"वो अकेला रहता है," उसने धीरे से कहा। "अखाड़े के पीछे, छोटे कमरे में। उसने कभी किसी को अपने घर नहीं बुलाया।"
"और उसकी गंध?" मैंने कहा, और अपनी आवाज़ में वो कड़वाहट आई जो मुझे खुद से नफ़रत दिला रही थी। "मैंने उसे सौ बार सूंघा है। उसके पसीने में वो कुछ है। मैंने सोचा था अखाड़े की मिट्टी है। पर अब—"
मैं रुक गया।
"अब क्या?" मीरा ने पूछा।
"अब समझ आया," मैंने कहा। "वो मिट्टी नहीं थी। वो भैरव की गंध थी।"
टिंकू मेरे पास आया। उसके हाथ में डिब्बी थी, पर उसने उसे नीचे रख दिया। "भाई," उसने कहा, "करण अभी भी अखाड़े में है। मैंने देखा — जब हम सुरंग में थे, वो बाहर खड़ा था। और जब भीड़ आई, तो वो पीछे हट गया।"
"कहाँ?"
"पुराने तालाब की तरफ़।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा।
वो शांत खड़ी थी। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने आज पहली बार देखी — डर नहीं, थकान नहीं। सिर्फ़ एक सवाल। "तू जाएगा?"
"हाँ।"
"अकेला?"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। टिंकू की तरफ़। फिर भीड़ की तरफ़ — वो तीन पहलवान, जिन्होंने शेराज़ को रोका था, अभी भी वहीं खड़े थे। और कालू काका — वो भीड़ में से निकलकर आए और मेरे पास खड़े हो गए।
"नहीं," मैंने कहा। "अकेला नहीं।"
माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ मज़बूत थी। "जा," उसने कहा। "पर एक बात याद रख। करण भैरव का बेटा हो सकता है। पर वो तेरे पिता का हत्यारा नहीं है। उसे सुन लेना। और फिर फ़ैसला करना।"
मैंने सिर हिलाया।
और जब मैं पलटा, तो देखा — गुड़िया भीड़ में से निकलकर आ रही थी। उसकी आँखें सूजी हुई थीं, उसके हाथ में अभी भी वो टूटी कॉपी थी, और वो सीधे मेरे पास आई और मेरे हाथ में कुछ रख दिया।
मैंने देखा। अखाड़े की लाल मिट्टी की थैली। वही थैली जो उसने हमेशा मेरे लिए भरी थी।
"भैया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी, "ये आज तक मेरे पास थी। मैंने इसे अपने साथ रखा था जब वो लोग मुझे उठा कर ले गए। मुझे पता था तू आएगा। और मैं जानती थी कि तेरे हाथ मज़बूत होंगे।"
मैंने थैली अपनी जेब में रखी। और मैंने गुड़िया का सिर सहलाया। मेरी आवाज़ भर आई थी।
"तू ठीक है?" मैंने पूछा।
"अब ठीक हूँ," उसने कहा, और वो रोई, पर मुस्कुराते हुए। "भैया, माँ को डर लग रहा था। पर मैंने कहा — भैया आएगा। भैया आएगा। और तू आ गया।"
मैंने उसे गले लगाया। मेरे हाथ काँप रहे थे।
"अब घर जा," मैंने कहा। "माँ के साथ।"
"पर तू—"
"मैं आऊँगा। वादा।"
गुड़िया ने माँ की तरफ़ देखा। माँ ने सिर हिलाया। और दोनों मेरे पीछे से हट गईं।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। "तैयार है?"
टिंकू ने अपनी टोपी ठीक की, कान के पीछे पेंसिल ठीक की, और डिब्बी उठाई। "एक बात पूछूँ, भाई?"
"पूछ।"
"अगर करण हमारा दुश्मन निकला, तो क्या मैं उसे भी मिठाई खिलाऊँगा? क्योंकि मेरी मिठाई किसी को भी मार सकती है, ऐसा मेरी माँ कहती है।"
मैं हँसा। पहली बार आज रात मैं सच में हँसा।
"हाँ," मैंने कहा। "उसे भी खिलाएगा।"
और हम चले।
भीड़ हमारे लिए रास्ता छोड़ती गई। मशालें हमारे साथ चलीं कुछ देर, फिर रुक गईं — सिर्फ़ गाँव के किनारे तक। उसके आगे अंधेरा था, और उस अंधेरे में पुराना तालाब, और उस तालाब के पास वो जगह जहाँ कालू काका ने कहा था सुरंग का मुँह है।
रास्ते में मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।
"वीर," उसने कहा।
"हाँ?"
"अगर करण सच में भैरव का बेटा है, तो मैं भी तेरे साथ हूँ। मैं माफ़ी नहीं माँगूँगी। पर मैं उसे सुनूँगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मशालों की रोशनी उसके चेहरे पर थी, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मुझे हर बार मज़बूत करती थी।
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