Spirit of a Fighter1165 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1165

7 min read November 5, 2026

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसका चेहरा पसीने से भीगा था, उसकी टोपी तिरछी हो गई थी, और उसके हाथ अभी भी काँप रहे थे — पर वो मेरे सामने खड़ा था, और उसकी आँखों में सवाल था, डर नहीं।

"मैं जाऊँगा," मैंने कहा।

"भैया —" गुड़िया ने कहना शुरू किया, पर मैंने उसे रोक दिया।

"सुनो पहले।" मैंने सबको पास बुलाया — माँ, गुड़िया, मीरा, टिंकू, और कालू काका जो अभी भी लालटेन लिए खड़े थे। "वो चिट्ठी में लिखता है कि मैं अकेला आऊँ। पर उसने ये नहीं लिखा कि मैं सामने से आऊँ।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में कुछ बदला — पहले गुस्सा था, फिर समझ आई।

"तू सामने से जाएगा," उसने कहा। "और हम पीछे से।"

"हाँ। चबूतरे के नीचे सुरंग है। कालू काका, तुम जानते हो उस सुरंग का दूसरा मुँह कहाँ है?"

कालू काका ने लालटेन ऊपर उठाई। उनका चेहरा झुर्रियों में डूबा था, पर आँखें साफ़ थीं। "बीस साल पहले वहाँ से एक रास्ता बाज़ार के पीछे वाले कुएँ तक जाता था। अब वो कुआँ बंद है, पर मुँह तो है।"

"तो तुम वहाँ से जाओ," मैंने कहा। "मीरा, तुम टिंकू के साथ। मैं सामने से जाऊँगा।"

टिंकू ने अपना मुँह खोला। "मैं नहीं जाऊँगा तो क्या? तू अकेला कैसे जाएगा?"

"तू अकेला नहीं जाएगा," मीरा ने कहा, और उसका हाथ मेरी बाँह पर आया। "मैं तेरे साथ रहूँगी — पीछे से।"

मैंने दोनों की तरफ़ देखा। टिंकू मेरा भाई था — माँ ने अभी-अभी बताया था, और उस सच ने मेरे भीतर कुछ ऐसा हिलाया था जो अभी तक शांत नहीं हुआ। और मीरा — मीरा वो थी जिसने मेरे घावों पर पट्टी बाँधी थी, जिसने मेरे काँपते हाथ थामे थे, जिसकी आवाज़ में वो दम था जो मुझमें नहीं था।

"तुम दोनों पीछे से आना," मैंने कहा। "मैं सामने से जाऊँगा। और कोई भी, किसी भी हालत में, समय से पहले बाहर मत निकलना।"

"और माँ?" गुड़िया ने पूछा। उसकी आवाज़ छोटी थी, बच्चों वाली, और मेरा दिल भर आया।

"माँ यहीं रहेंगी," मैंने कहा। "गौरी के साथ। कालू काका, आप इन दोनों के पास रहिए।"

कालू काका ने सिर हिलाया। माँ ने कोई शिकायत नहीं की — उन्होंने सिर्फ़ मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में वो बात थी जो हर माँ की आँखों में होती है जब उसका बेटा लड़ने जाता है। उन्होंने कुछ नहीं कहा। मेरा हाथ थामा, दबाया, और छोड़ दिया।

मैं मुड़ा। मेरे हाथों की जलन अब भीतर तक जा रही थी, और मेरी उँगलियाँ कड़ी हो गई थीं। मैंने उन्हें धोती में छिपाया।

पर मीरा ने देख लिया।

वो कुछ नहीं बोली। बस अपना बैग खोला, उसमें से एक साफ़ कपड़ा निकाला, और मेरे सामने आकर खड़ी हो गई। उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया — उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं — और धीरे-धीरे पट्टी बाँधने लगी। जले हिस्से पर कपड़ा छुआ तो मेरी साँस हिचकी, और मैंने दाँत भींच लिए।

"दर्द होता है तो मुँह से निकल जाने दे," वो बोली, बिना मेरी तरफ़ देखे। "बहादुरी दिखाने की ज़रूरत नहीं।"

"दर्द नहीं हो रहा," मैंने कहा।

वो रुकी। मेरी तरफ़ देखा। फिर बोली, "झूठ बोलता है।"

और मुझे हँसी आ गई — पहली बार उस रात में। छोटी-सी हँसी, जो गले में अटक गई, पर आई ज़रूर। मीरा ने पट्टी कस दी और मेरा हाथ छोड़ दिया।

"चल," मैंने कहा।

रास्ते में हम कम बोले। गाँव की गलियाँ उस रात खाली थीं — लोग अखाड़े की आग बुझाने में लगे थे, और जो नहीं लगे थे वो अपने दरवाज़े बंद करके बैठे थे। सिर्फ़ एक जगह रोशनी थी — दूर, पंचायत के चबूतरे की तरफ़, जहाँ मशालें जल रही थीं।

मीरा मेरे बगल में चल रही थी। उसके कंधे का बैग हिल रहा था, और उसकी साँस की आवाज़ मुझे साफ़ सुनाई दे रही थी। टिंकू पीछे था — वो कुछ बड़बड़ा रहा था, अपने आप से, जैसे हिम्मत जुटा रहा हो।

"भाई," उसने अचानक कहा। "एक बात पूछूँ?"

"पूछ।"

"अगर वो सच में माँ को कुछ कर दे… तो?"

मैं रुक गया। मैंने पीछे मुड़कर उसे देखा। उसका चेहरा चाँद की रोशनी में पीला लग रहा था।

"माँ हमारे साथ है," मैंने कहा। "वो चिट्ठी में झूठ लिखा है। उसका डर ही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है — वो सोचता है कि मैं चिट्ठी पढ़कर डर जाऊँगा और अकेला भागा-भागा आऊँगा। पर मैं आ रहा हूँ — अपने हिसाब से।"

टिंकू ने कुछ सोचा। फिर बोला, "और अगर उसके पास सच में वो काग़ज़ हो जो उसने लिखा है? तेरे जन्म का?"

मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई। मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो भी मेरी तरफ़ देख रही थी।

"अगर उसके पास काग़ज़ है," मीरा ने धीरे से कहा, "तो वो हमें दिखाएगा ज़रूर। पर वो काग़ज़ हमारे हाथ लगे बिना वो बाहर नहीं जाएगा — ये उसकी आख़िरी ताकत है।"

"तो फिर हम क्या करेंगे?" टिंकू ने पूछा।

"हम उससे पहले उसका काग़ज़ लेंगे," मैंने कहा। "और उसके लिए… उसे लगेगा कि मैं अकेला आया हूँ।"

हम बाज़ार के पीछे वाले कुएँ के पास पहुँचे। वो कुआँ सच में बंद था — ऊपर लकड़ी का ढक्कन, और उस पर पत्थर रखे हुए। कालू काका ने सही कहा था।

"यहाँ से नीचे जाओ," मैंने मीरा और टिंकू की तरफ़ देखकर कहा। "सुरंग सीधी चबूतरे के नीचे जाएगी। मैं सामने से जाऊँगा और उसे बातों में उलझाए रखूँगा। जब तुम लोग पहुँच जाओ, तो मुझे आवाज़ सुनाई देगी।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो वो कहना चाहती थी, पर नहीं कह रही थी। फिर उसने अपना बैग खोला और उसमें से एक छोटी-सी थैली निकाली — हरी शीशी वाली।

"ये अपने पास रख," उसने कहा। "अगर ज़रूरत पड़े तो।"

"तुम्हारे पास क्या रहेगा?"

"मेरे पास और भी है," वो बोली, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मुझे पहली बार अखाड़े में सुनाई दी थी — जब उसने मुझे मिट्टी से बाहर धकेला था। "अब जा। और वादा कर — अकेले कुछ नहीं करेगा।"

"वादा," मैंने कहा।

वो एक पल और रुकी, फिर उसने मेरा हाथ — वो हाथ जिस पर उसने अभी पट्टी बाँधी थी — धीरे से दबाया और पलट गई। मैंने उसे कुएँ के ढक्कन को सरकाते देखा, और फिर टिंकू को उसके पीछे उतरते देखा। टिंकू ने उतरने से पहले मेरी तरफ़ देखा और बोला, "अगर तू मर गया तो मैं तेरी खीर खुद खा जाऊँगा।"

"तू तो खा ही रहा है," मैंने कहा।

वो हँसा — छोटी-सी हँसी — और अंधेरे में गायब हो गया।

अब मैं अकेला था। मैंने अपने जले हाथों को पट्टी में छिपाया और पंचायत के चबूतरे की तरफ़ बढ़ा।

चबूतरा पुराना था — बड़े पत्थरों का, जिस पर बैठकर गाँव के बुज़ुर्ग फ़ैसले किया करते थे। उसके चारों तरफ़ अब मशालें जल रही थीं, पर कोई आदमी नहीं था। सिर्फ़ खाली चबूतरा, और उसके नीचे — एक अंधेरा, जहाँ से कोई सीढ़ी नीचे जाती थी।

मैं चबूतरे के पास पहुँचा तो रुक गया। हवा में एक गंध आई — मीठी, चिपचिपी। गुड़ की चाशनी। और उसके नीचे, बहुत हल्का, बादाम का तेल।

वही गंध। शेराज़ की गंध।

मैंने आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली। मेरी नाक भरने लगी — जलन, और पीछे सिर में दर्द की एक लकीर खिंच गई। मैंने उसे जाने दिया। अब रुकने का वक़्त नहीं था।

और तभी, चबूतरे के नीचे से, एक आवाज़ आई।

"आ गया, भवानी का बेटा।" वो आवाज़ खुरदरी थी, जैसे किसी ने गला साफ़ किए बिना बोला हो। "देर कर दी तूने। मैं तो सोच रहा था कि तेरे पिता की तरह तू भी डर के मारे भाग जाएगा।"

मैंने अपनी मुट्ठी कसी। जेब में वो चाबी मेरी जाँघ से चुभ रही थी, और भीतर कहीं, मेरे दिल के पास, एक आवाज़ उठी — वो आवाज़ जो हमेशा ख़तरे से पहले उठती है।

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