Spirit of a Fighter – Chapter 1164
"तुम्हारा नाम क्या है?" उसने पूछा।
"वीर सिंह," मैंने कहा।
"वीर सिंह," उसने दोहराया। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और कहा — "मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूँगी। मैं तुम्हारा नाम याद रखूँगी। हमेशा।"
टिंकू ने मुँह फेर लिया। उसके कंधे हिल रहे थे। माँ ने उसका सिर अपने सीने से लगा लिया।
माँ ने गौरी को अपनी गोद में लिया और उसके बालों में हाथ फेरा। फिर उन्होंने उसके कान के पीछे देखा — वहाँ एक छोटा-सा निशान था, जले हुए अक्षर जैसा। माँ का हाथ एक पल के लिए रुक गया।
"ये…" वो धीरे बोलीं। "ये निशान…"
"क्या हुआ, माँ?" मैंने पूछा।
उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस गौरी को और कसकर पकड़ लिया, और उनकी आँखें मेरी तरफ़ उठीं — और उनमें वो बात थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। पहचान। जैसे उन्होंने किसी को बहुत दिनों बाद देखा हो।
"माँ?" मैंने फिर कहा।
"बाद में," उन्होंने कहा। "अभी इसको पानी पिला।"
मैं उठने की कोशिश करने लगा, पर मेरी टाँगें जवाब नहीं दे रही थीं। टिंकू ने मुझे सहारा दिया और खींचकर दीवार के सहारे बैठा दिया। मीरा ने अपना बैग खोला और उसमें से एक छोटी पीली शीशी निकाली — वो हरी शीशी जो उसने रास्ते में दिखाई थी — और उसमें से कुछ बूँदें मेरे हाथ पर डालीं।
जलन कम हुई। कुछ। पर काफ़ी थी।
"तूने ये कब बनाया?" मैंने पूछा।
"रास्ते में नहीं बनाया," उसने कहा। "मैं इसे हमेशा अपने पास रखती हूँ। पिता के लिए बनाया था। पर आज तेरे काम आया।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो मेरे हाथ पर पट्टी बाँध रही थी, और उसकी उँगलियाँ अब नहीं काँप रही थीं।
"तूने ये अपने पिता के लिए बनाया था," मैंने कहा। "और मुझ पर लगा दिया।"
"हाँ," उसने सीधा कहा। "क्योंकि तू भी अब उतना ही ज़रूरी है।"
उसने ये बात ऐसे कही जैसे कोई रोज़ की बात कह रहा हो — जैसे कहे कि आज धूप तेज़ है। पर मेरे अंदर कुछ ऐसा हुआ जो मैं शब्दों में नहीं कह सकता। मैंने अपनी बाकी बची हुई हिम्मत से अपना दूसरा हाथ — जो कम जला था — उसकी तरफ़ बढ़ाया। उसने बिना कुछ कहे अपना हाथ उसमें रख दिया।
हम वहाँ बैठे रहे। जलती कोठी की गरमी हमारे चेहरों पर थी, दूर कहीं पानी की बाल्टियों की आवाज़ आ रही थी जो गाँव के लोग ला रहे थे, और माँ गौरी के बाल सहला रही थीं।
तभी कालू काका आए। वो हाँफ रहे थे, उनकी लालटेन हाथ में काँप रही थी, और उनके चेहरे पर वो डर था जो मैंने कभी नहीं देखा था।
"बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ फटी हुई थी। "मुझे कुछ दिखा। तहखाने के रास्ते में। वहाँ… वहाँ कोई और है।"
"कौन?" मैंने पूछा।
"पता नहीं। पर उसके हाथ में वही कटोरी थी जो वैद्य के पास थी। और वो जा रहा था — कुएँ की तरफ़।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा। और उसके चेहरे पर वो बात साफ़ थी जो मेरे दिल में थी।
कुछ अभी ख़त्म नहीं हुआ था। कुछ बचा था। और वो कुछ, वो कटोरी लेकर, कुएँ की तरफ़ जा रहा था।
मैं उठने लगा और मेरी टाँगों ने इस बार साथ दिया — शायद इसलिए कि उन्हें भी पता था कि अभी रुकना नहीं है।
पर तभी एक सिपाही भागता हुआ आया, उसका चेहरा पसीने से भीगा था, और उसके हाथ में एक लिफ़ाफ़ा था।
"सर!" वो हाँफते हुए बोला। "सर, इंस्पेक्टर शर्मा ने भेजा है। ठाकुर की बैलगाड़ी नहर के पुल पर रुकी मिली है — पर गाड़ी में सिर्फ़ उसका कोट है।"
"कोट?" मैंने कहा।
"हाँ सर। और कोट में लिपटी एक चिट्ठी है।" उसने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया। "और सर… वो चिट्ठी आपके नाम की है।"
मैंने वो लिफ़ाफ़ा लिया। मेरे जले हुए हाथ काँप रहे थे, और काग़ज़ पर मेरे खून की एक बूँद गिर गई।
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक काग़ज़ था, जिस पर मोटे अक्षरों में सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी — और नीचे ठाकुर का हस्ताक्षर।
मीरा ने पास आकर पढ़ा। उसकी साँस रुक गई।
मैंने वो काग़ज़ माँ की तरफ़ बढ़ाया। उन्होंने पढ़ा, और उनका चेहरा पत्थर हो गया।
काग़ज़ पर लिखा था —
"तेरे पास जो कुछ भी है, वो सब झूठ है। असली काग़ज़ मेरे पास है। और वो काग़ज़ तेरे पिता की मौत का नहीं, तेरे जन्म का है। मिल मुझसे — कुएँ के नीचे। अकेला। वरना वो काग़ज़ हर उस आदमी को मिल जाएगा जो तेरे पिता को मारना चाहता था।"
मैंने काग़ज़ को मोड़ा। मेरी मुट्ठी में वो काग़ज़ चुभ रहा था, जैसे कोई काँटा।
"ये झूठ है," टिंकू ने कहा, पर उसकी आवाज़ में भी वो यक़ीन नहीं था। "वो अब हार चुका है। ये उसकी आख़िरी चाल है।"
"हो सकता है," मैंने कहा। "पर वो जानता है कि मैं आऊँगा।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो आँसू नहीं थे जो अभी थे। अब वहाँ कुछ और था।
"तू जाएगा?" उन्होंने पूछा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा। फिर गौरी की तरफ़, जो मेरी उँगली पकड़े हुए थी। फिर मीरा की तरफ़, जिसने अभी-अभी मेरा हाथ छोड़ा था पर उसकी आँखें अभी भी मुझ पर थीं।
"हाँ," मैंने कहा। "पर इस बार अकेला नहीं।"
और मैंने वो काग़ज़ अपनी जेब में रखा — उसी जेब में जहाँ पहले भी काग़ज़ आ चुके थे। और मुझे लगा कि इस बार वो काग़ज़ जेब में नहीं, मेरी छाती में रखा जा रहा है।
॥
काग़ज़ मैंने जेब में रखा तो भीतर कुछ और भी महसूस हुआ — कुछ ठोस, जो पहले नहीं था। मैंने उँगली डालकर देखा तो एक छोटी-सी चाबी निकली, लोहे की, जंग लगी। किसने रखी, पता नहीं। पर जेब मेरी थी, और उसमें ये चीज़ मेरी नहीं थी। मैंने चारों तरफ़ देखा — सब अपनी-अपनी जगह पर थे, कोई पास नहीं आया था। सिर्फ़ हवा में अब भी जली लकड़ी की बू थी।
माँ ने मेरा चेहरा पढ़ा और बिना पूछे बोलीं, "क्या मिला?"
"कुछ नहीं।" मैंने चाबी मुट्ठी में दबा ली। "पहले चिट्ठी पढ़ो।"
वो चिट्ठी मैंने फिर खोली। जलती कोठी की रोशनी में अक्षर काँप रहे थे, जैसे वो खुद भी डरे हुए हों। मैंने ज़ोर से पढ़ा, ताकि सब सुन लें —
"वीर सिंह, तूने मेरा सब कुछ छीन लिया। मेरा घर, मेरा नाम, मेरी बेटी। अब मैं तुझसे वो छीनूँगा जो तुझे सबसे प्यारा है। तेरी माँ पंचायत के चबूतरे पर बैठी है, और मैं उसी चबूतरे के नीचे की सुरंग में हूँ। आ जा, अकेला। और हाँ, अपनी मिठाई वाले दोस्त को मत लाना, वरना माँ की जान जाएगी। तेरा — महेंद्र सिंह।"
पढ़ते-पढ़ते मेरी आवाज़ सूख गई। आख़िरी लाइन पर आकर तो जैसे ज़ुबान ही मुँह से चिपक गई। चारों तरफ़ खामोशी। दूर पानी की बाल्टियाँ अब भी चल रही थीं, पर यहाँ, इस जगह पर, हवा भी रुक गई थी।
मीरा ने काग़ज़ मेरे हाथ से लिया। उसने एक बार पढ़ा, दोबारा पढ़ा, और फिर वो काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाते हुए बोली, "ये जाल है।"
"माँ चबूतरे पर नहीं है," मैंने कहा। "वो हमारे साथ है।" मैंने पीछे मुड़कर देखा — माँ वहीं खड़ी थीं, गौरी का हाथ पकड़े। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और सिर हिलाया।
"तो फिर ये चिट्ठी किस बारे में है?" टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ में वो डर नहीं था जो जलती कोठी में था — अब कुछ और था, गुस्सा।
"ये चिट्ठी माँ के बारे में नहीं है," मीरा ने धीरे से कहा, और मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें काग़ज़ पर टिकी थीं पर उसका दिमाग़ कहीं और था। "ये चिट्ठी ये देखने के लिए है कि वीर अकेला आए। वो जानता है कि वीर के साथ कोई हो तो उसका कोई जाल नहीं चलता।"
"तो हम नहीं जाएँगे," टिंकू ने कहा। "इतना साफ़ जाल है तो फँसने की क्या ज़रूरत।"
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