Spirit of a Fighter1163 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1163

7 min read November 5, 2026

मैंने खुद को पीछे खींचना शुरू किया। छत का टुकड़ा मेरी पीठ पर रगड़ खाता रहा, और मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। मुँह में जला हुआ स्वाद भर गया। मैंने अपने पैरों को ज़मीन पर जमाया, और एक आख़िरी झटके में अपने आप को पीछे धकेला — और गौरी का पूरा छोटा शरीर मेरे साथ खिंचकर आ गया।

वो मेरी छाती पर गिरी। उसके कपड़ों से धुआँ उठ रहा था। मैंने अपने दुपट्टे का बचा हुआ हिस्सा उसके मुँह पर रखा।

"अब बाहर," मैंने कहा। "बाहर निकलना है। तू रो मत, बस मेरी आवाज़ सुनती रह।"

"तुम्हारी आवाज़…" वो हाँफते हुए बोली। "तुम्हारी आवाज़ में कुछ है। जैसे… जैसे मेरे गाँव का कुआँ। जब बाल्टी गिरती थी और देर तक आवाज़ आती थी।"

मुझे हँसी आई — जलते गले में हँसी कैसी लगती है, वो मुझे पता है। दर्द के साथ।

"तो तू मुझे अच्छा लड़का समझ रही है," मैंने कहा। "यही काफ़ी है।"

बाहर, खिड़की के नीचे, मीरा का हाथ मेरे हाथ को खोज रहा था जो अंदर था।

मीरा ने जब रोशनी को छत से टूटते देखा था, तो उसकी साँस एक पल को रुक गई थी। फिर वो भागी थी — सीधी खिड़की की तरफ़, जिससे धुआँ रस्सी की तरह ऊपर जा रहा था। टिंकू उसके पीछे भागा, और उसकी टोपी कब गिर गई, उसे खुद भी पता नहीं चला।

"मीरा, रुक! रुक जा!" टिंकू ने उसकी बाँह पकड़ी, पर उसने झटक दी।

"वो अंदर है!" मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो टिंकू ने पहले कभी नहीं सुनी थी — डर नहीं, बल्कि उससे भी बड़ी कोई चीज़। "तूने सुना नहीं? वो अंदर है और छत गिर गई है!"

"मैं जानता हूँ! पर अगर तू भी अंदर घुसी तो—"

"तो क्या?" मीरा ने पलटकर उसे देखा। "तो क्या, टिंकू? वो मेरे पिता की मिट्टी के लिए लड़ रहा है। वो तेरे भाई है। तू मुझे बताता है कि मैं क्या करूँ?"

टिंकू एक पल के लिए चुप हो गया। पर उसकी आँखों में पानी था और उसने उसे छिपाया नहीं। "मैं तुझे नहीं रोक रहा," वो धीरे बोला। "मैं बस ये कह रहा हूँ कि अगर तू अंदर घुसी और तुझे कुछ हो गया, तो वो बाहर आकर मुझसे पूछेगा — 'टिंकू, मेरी मीरा कहाँ है?' और मैं क्या जवाब दूँगा? बता, मैं क्या जवाब दूँगा?"

मीरा की आँखें भर आईं। उसने मुँह फेर लिया और खिड़की की तरफ़ हाथ बढ़ाया।

"वीर!" वो चिल्लाई। "वीर सिंह! सुनाई दे तो जवाब दे! वीर!"

अंदर से सिर्फ़ लकड़ी के टूटने की आवाज़ आई।

तभी चंदा दौड़ती हुई आई, उसके हाथ में माँ का दुपट्टा था जो किसी ने गिरते वक़्त छोड़ दिया था। "वो अंदर गया," वो हाँफते हुए बोली। "माँ ने रोका, मैंने रोका… पर वो गया। क्योंकि मैंने कहा कि अंदर बच्चा है। मेरी वजह से।"

मीरा ने उसकी तरफ़ देखा, और उसके चेहरे से गुस्सा उतर गया। "तेरी वजह से नहीं," उसने कहा। "उसकी वजह से। वो ऐसा ही है। और यही उसकी सबसे बड़ी बीमारी है।"

तभी मलबे के नीचे से एक आवाज़ आई। खाँसी। फिर छोटी-सी आवाज़, जो गाने जैसी थी, जो मीरा और टिंकू दोनों ने सुनी।

टिंकू ने एक पल इंतज़ार किया, फिर वो पागलों की तरह चिल्लाया — "वो ज़िंदा है! वो ज़िंदा है! अरे कोई है? लाठी लाओ, कोई डंडा लाओ!"

दो पहलवान दौड़कर आए, जो गाँव से लाठियाँ लेकर आए थे। तीनों ने मिलकर जली लकड़ियों को हटाना शुरू किया। खिड़की के नीचे का हिस्सा टूटा हुआ था, और सामने का दरवाज़ा भी अब खुल गया था — आग ने उसे खा लिया था।

"यहाँ से खींचो!" टिंकू ने कहा। "ये शहतीर अभी टिका हुआ है, अगर ये गिरा तो—"

"तो मत गिरने दे," मीरा ने कहा, और वो खुद उस शहतीर को कंधे से सहारा देने लगी।

मलबे के नीचे से पहले एक जली हुई बाँह निकली, फिर कंधा, फिर पूरा सिर। मैंने अपनी आँखें खोलीं और पहली चीज़ जो देखी, वो मीरा का चेहरा था — धुएँ से काला, आँसुओं से गीला, और उन दोनों के बीच से मुझे देखता हुआ।

"निकल!" वो चिल्लाई। "निकल, वीर!"

मैंने आख़िरी ताकत लगाई और अपने आप को बाहर धकेला। मेरी बाँह में गौरी थी, जो मेरी गर्दन में अपना चेहरा छिपाए हुई थी। टिंकू ने उसे मुझसे अलग किया और मीरा ने मुझे खींचकर दूर ले जाकर ज़मीन पर गिरा दिया।

मैं ज़मीन पर पड़ा हाँफ रहा था। मेरे कपड़े जले थे, हाथ फिर झुलस गए थे, और मेरी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई कुएँ में से बोल रहा हो।

"चंदा ठीक है?" मैंने सबसे पहले पूछा।

मीरा एक पल मेरे ऊपर झुकी रही। फिर उसने मेरे कान के पास, बहुत धीरे, कहा — "तू पागल है। पूरा गाँव जानता है। पर आज तूने हद कर दी।"

मैं हँसा। हँसी फेफड़ों में चुभी, और मैंने दाँत भींच लिए।

"आदत है," मैंने कहा।

"आदत है?" उसने मेरा चेहरा दोनों हाथों में लिया। उसके हाथ ठंडे थे, मेरा चेहरा जल रहा था। "आदत है? वीर, तेरे कपड़े जल रहे थे। तू अंदर जलकर मर सकता था। और तू मुझसे ये कहता है कि आदत है?"

"मीरा—"

"चुप!" उसकी आवाज़ टूटी। "बस एक पल चुप रह।"

मैं चुप हो गया।

वो मेरे पास घुटनों के बल बैठी थी। उसने मेरा जला हुआ दाहिना हाथ अपने हाथों में लिया। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर वो हाथ मेरे हाथ पर जमाए हुए थी। फिर उसने अपना मुँह मेरे हाथ के पास ले जाकर फूँक मारी — धीरे-धीरे, तीन बार। उसकी साँस ठंडी थी। और जब वो फूँक मार रही थी, उसकी एक आँसू की बूँद मेरी हथेली पर गिरी।

वो बूँद जले हुए हिस्से पर गिरी। जलन हुई। पर मैंने हाथ नहीं खींचा।

"तू रो रही है," मैंने कहा। और मेरी आवाज़ काँप रही थी, भले मैं नहीं चाहता था।

"हाँ," उसने कहा, बिना मुँह उठाए। "रो रही हूँ। और तू मुझे रोक मत।"

"मैं रोक नहीं रहा। बस… बस ये कह रहा हूँ कि रो मत। मैं ठीक हूँ।"

वो उठी। उसकी आँखों में आँसू थे, पर उसने उन्हें पोंछा नहीं। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आवाज़ वो हो गई जो बारिश में बंद कमरे में आती है — धीमी, गीली।

"तू ठीक नहीं है," उसने कहा। "और अब मैं तेरी बात नहीं मानूँगी। आज से तेरे हर घाव पर मेरा हाथ होगा, चाहे तू कहे या न कहे। और अगर तू फिर कभी बिना मुझे बताए आग में घुसा, तो मैं तेरे पीछे-पीछे आग में घुसूँगी। और तब देखना, कौन पहले मरता है।"

मैंने उसे देखा। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसकी आँखों में वो ज़िद थी जो पहली बार मैंने अखाड़े के दरवाज़े पर देखी थी — जब उसने मुझे मिट्टी में से खींचकर बाहर किया था।

"तो ये वादा है?" मैंने पूछा।

"वादा है," उसने कहा। "और मेरे वादे निभते हैं। पिता से पूछ लेना।"

तभी गौरी की आवाज़ आई। "तुम… तुम मेरे पास बैठोगे?"

सबने पलटकर देखा। गौरी ज़मीन पर बैठी थी, टिंकू उसके पास बैठा था, और वो अपनी उँगलियों से मिट्टी खुरच रही थी। उसकी उम्र शायद छह साल थी। दुबली, बड़ी आँखें, और उसके पैरों में चप्पल नहीं थी।

मैं उसके पास पहुँचा, घुटनों के बल — क्योंकि खड़ा होना मेरे लिए अब एक सपना था।

"मैं तेरे पास हूँ," मैंने कहा।

उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने धीरे से कहा — "बूढ़ा कहता था कि मेरा कोई नहीं है। कि मुझे यहाँ से कोई नहीं ले जाएगा। कि मैं उसी बक्से में रहूँगी जब तक मैं बड़ी नहीं हो जाती।"

मेरे अंदर कुछ टूटा। मैंने अपना हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाया।

"अब बक्सा नहीं है," मैंने कहा। "अब तेरे पास मैं हूँ। और ये मीरा है, और ये टिंकू है। और ये माँ हैं। अब तेरे पास सब हैं।"

गौरी ने एक लंबी साँस ली। फिर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया, और उसकी पकड़ में वो ज़ोर था जो बच्चों में तब आता है जब उन्हें पहली बार लगता है कि कोई उन्हें छोड़ेगा नहीं।

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