Spirit of a Fighter – Chapter 1162
मैंने उनका हाथ पकड़ा और अपने सीने से लगाया।
"माफ़ी किस बात की?" मैंने कहा, और मेरा गला भर गया। "तूने मुझे बचाया। तू बोलती, तो मैं आज यहाँ नहीं होता।"
उन्होंने मेरा सिर अपने सीने से लगा लिया, और उनका शरीर काँप रहा था। मैंने उनकी कमर में हाथ डाल दिए, और मैंने महसूस किया कि वो कितनी दुबली हो गई हैं — जैसे बीस साल की चुप्पी ने उन्हें अंदर से खा लिया हो।
टिंकू ने पीछे से कहा, और उसकी आवाज़ भी भारी थी — "माँ, तेरे हाथ में हल्दी का टीका टूट गया है। मैं दूसरा लगा दूँ?"
माँ हँसी — पहली बार उस रात में। वो हँसी आँसुओं के बीच से निकली, और वो टूटी हुई थी, पर असली थी।
"लगा दे," उन्होंने कहा। "और टिंकू — तू मेरा बेटा है। अगली बार मुझे 'माँ' कहने से पहले मत सोचना।"
टिंकू ने मुँह फेर लिया, पर मैंने उसकी आवाज़ सुनी — वो रो रहा था, और वो छिपा रहा था।
मीरा ने मेरा हाथ पट्टी से बाँध दिया। फिर उसने शीशी उठाई और उसे खोलकर सूँघा।
"ये क्या है?" उसने पूछा।
"पिता जी का बनाया इलाज," मैंने कहा। "वैद्य ने कहा — पानी में घोलकर पीना, और जले पर लगाना।"
उसने शीशी सूँघी, और उसकी आँखें बंद हो गईं।
"तुलसी," उसने कहा। "अदरक। काली मिर्च। और… कुछ और। कुछ जो मैं नहीं पहचानती।"
"कुछ और?" मैंने पूछा।
"हल्दी। और शहद।" मीरा ने ढक्कन बंद किया। "पर इन सबके नीचे एक गंध है जो मैं नहीं जानती। मेरे पिता कहते थे — हर इलाज में एक गुप्त चीज़ होती है जो वैद्य अपने साथ ले जाता है।"
उसने शीशी मेरी तरफ़ बढ़ाई। मैंने सूँघा। अदरक की तेज़ गंध के नीचे, कुछ मीठा-सा, जला हुआ, गीली मिट्टी जैसा।
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"ये तो… इसकी गंध मुझे अखाड़े के पानी से आती है।"
सब चुप हो गए।
"मतलब?" मीरा ने पूछा।
"मतलब ये इलाज भी उसी पानी से बना है," मैंने धीरे से कहा। "पिता जी ने ज़हर से इलाज बनाया था। यही बात वैद्य ने छिपाई।"
माँ ने शीशी मेरे हाथ से ले ली और उसे आँखों से लगाकर देखा।
"तेरे पिता बीस साल पहले इसी पर काम कर रहे थे," उन्होंने कहा। "वो कहते थे — जो चीज़ जान लेती है, वही चीज़ मार भी सकती है।"
तभी पीछे से आवाज़ आई — कोठी की तरफ़ से एक भारी गड़गड़ाहट, और फिर शीशे टूटने की आवाज़। छत का एक टुकड़ा धुएँ के साथ हवा में उड़कर हमारे सामने गिरा।
"आग फैल रही है!" मीरा ने चिल्लाया। "कुछ अंदर रह गया है!"
मैं उठा। पर मेरी टाँगें जवाब नहीं दे रही थीं — जले हाथ, थका शरीर, और साँस जो छाती में फँसी थी।
"वीर, नहीं!" चंदा ने मेरा हाथ खींचा।
"चंदा की किताबें हैं उसमें," मैंने कहा। "उसकी माँ की किताबें। वो कह रही थी सुबह।"
चंदा का चेहरा सफ़ेद हो गया। उसने कुछ कहना चाहा, पर माँ ने उसे पकड़ लिया।
"तू नहीं जाएगा," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो दम था जो बीस साल से दबा हुआ था। "तूने आज बहुत किया।"
"माँ—"
"मैंने एक बार चुप रहकर तेरी जान बचाई थी," उन्होंने कहा, और उनकी आँखें मेरी आँखों में गड़ी थीं। "अब मैं तुझे जाने से रोककर बचाऊँगी।"
पर तभी कोठी की खिड़की से एक आवाज़ आई। किसी के रोने की आवाज़। बहुत छोटी, बहुत पतली।
सबकी नज़र वहाँ गई।
"ये… ये तो बच्चे की आवाज़ है," मीरा ने कहा।
मैंने चंदा की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर आ गया जो मैं पहचानता था।
"कोठी में एक और था," वो धीरे से बोली। "वैद्य के साथ। एक बच्चा। जिसकी आवाज़ मुझे रोज़ रात सुनाई देती थी, और मैं सोचती थी सपना है।"
मैंने अपना जला हाथ पट्टी से छुड़ाया और उसकी तरफ़ बढ़ाया।
"तो अब पता चला," मैंने कहा। "वो सपना नहीं था।"
चंदा ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, और फिर उसने अपना हाथ मेरे हाथ में रख दिया।
"मैं साथ चलूँगी," उसने कहा।
"नहीं—"
"तू अकेला रेंगता रहा आज पूरी रात," उसने कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी पर तय थी। "अब मैं तेरे साथ जाऊँगी। चाहे आग हो या वो बूढ़ा फिर आए।"
माँ ने एक गहरी साँस ली, और फिर उन्होंने अपना दुपट्टा मेरे मुँह पर बाँध दिया।
"चल," वो बोलीं। "पर अगर तू अंदर गया, तो मेरी लाश से होकर जाएगा। समझा?"
मैंने सिर हिलाया। और हम चले, धुएँ की तरफ़, उस छोटी आवाज़ की तरफ़ जो अब भी रो रही थी — और जो अब किसी और की नहीं, हमारी ज़िम्मेदारी थी।
पर हम बमुश्किल दस कदम चले थे कि कोठी की छत से एक बड़ी चीख़ निकली — लकड़ी की, दरार की, टूटने की। और फिर सब कुछ एक साथ आया। धुआँ गाढ़ा हो गया, आग की लपटें बाहर निकलीं, और पीछे से मीरा की आवाज़ आई, फटी हुई, दूर से —
"वीर! वो छत! वो छत गिर रही है!"
मैंने ऊपर देखा। बस एक पल के लिए। और उसी पल में मैंने चंदा को अपनी तरफ़ खींचा, और उस छोटी आवाज़ को अंदर फँसते देखा, और अपने आप को उसके और आग के बीच पाया।
फिर सब कुछ अंधेरा हो गया।
॥
अंधेरा सिर्फ़ एक पल रहा। फिर आग की लपट ने ऊपर से नीचे तक सब कुछ लाल कर दिया, और मुझे एहसास हुआ कि मैं ज़िंदा हूँ — क्योंकि जलती लकड़ी की गरमी चेहरे पर लग रही थी, और ज़िंदा आदमी ही गरमी महसूस करता है।
मेरी पीठ पर कुछ भारी था। छत का एक बड़ा टुकड़ा मेरे ऊपर आ गिरा था, पर वो सीधा नहीं गिरा — बीच में किसी शहतीर पर टिककर झुक गया था। मेरे और ज़मीन के बीच अब सिर्फ़ मेरी छाती जितनी जगह बची थी। धुआँ अंदर भर रहा था। मैंने मुँह को दुपट्टे में और गहरा दबाया, जो माँ ने बाँधा था, और खाँसते हुए करवट ली।
तभी मुझे वो आवाज़ सुनाई दी। रोने की। बहुत पास। मेरे बाएँ हाथ से शायद दो हाथ की दूरी पर।
"बच्चे?" मैंने आवाज़ निकाली। आवाज़ निकली नहीं, सिर्फ़ फुफकार बनी। "सुनाई दे रहा है? मैं वीर हूँ। मैं तेरे पास आ रहा हूँ।"
रोना थोड़ा रुका। फिर एक छोटी-सी आवाज़ आई, जो काँप रही थी पर साफ़ थी।
"तुम… तुम वो हो जो बाहर से आया था? जिसने दरवाज़ा तोड़ा?"
"हाँ। तू कहाँ है? बोल, कुछ गिरा है तेरे ऊपर?"
"एक… एक बक्सा है। पर वो खोखला है, अंदर से। मैं उसमें बैठी हूँ। बूढ़ा मुझे इसमें बैठाता था। कहता था — बाहर मत आना।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा उतरा। बूढ़ा उसे बक्से में बैठाता था। जानवर को पिंजरे में रखते हैं, बच्ची को बक्से में। मैंने अपनी जली हथेली ज़मीन पर टिकाई और अपने आप को उस आवाज़ की तरफ़ खींचा। हर इंच पर छत का वो टुकड़ा मेरी पीठ को चीरता गया। दाँत भींचकर मैंने एक और खींचा मारा, और मेरे हाथ को लकड़ी का कोना छू गया।
"अब तेरे सामने हूँ," मैंने कहा। "बक्से की सींक पकड़ सकती है?"
"हाँ… हाँ, पकड़ ली।"
"अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ा। जितना बढ़ा सकती है।"
महीन, छोटी उँगलियाँ मेरी हथेली पर आईं। इतनी छोटी कि मुझे लगा जैसे कोई चिड़िया मेरे हाथ में बैठी है।
"तेरा नाम क्या है?" मैंने पूछा, ताकि वो अपनी साँस पर काबू कर सके।
"गौरी," उसने कहा। "बूढ़ा कहता था मेरा नाम नहीं है। पर मुझे अपना नाम याद है। गौरी।"
"गौरी," मैंने दोहराया। "अच्छा नाम है। अब सुन, मैं तुझे खींचूँगा। तू मेरे हाथ को ज़ोर से पकड़े रहना। छोड़ना मत, चाहे कुछ भी हो जाए।"
"पर… पर बूढ़ा कहता था अगर मैं बाहर निकली तो—"
"बूढ़ा अब यहाँ नहीं है," मैंने कहा। "वो गिर गया। नीचे। और अब तू मेरे साथ है। समझी?"
एक पल की चुप्पी। फिर उसकी उँगलियों ने मेरी हथेली कस ली, इतनी ज़ोर से जैसे वो डूब रही हो और मैं किनारा हूँ।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno