Spirit of a Fighter1161 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1161

7 min read November 5, 2026

"अब छोड़ता हूँ," मैंने कहा। "पैर सीधे कर। घुटने मोड़।"

"वीर भैया—"

"भरोसा कर," मैंने कहा। "और मैं तेरे पीछे आ रहा हूँ।"

मैंने अपने हाथ खोले।

वो गिरी — एक पल के लिए हवा में थी, और फिर घास पर गिरी, और मैंने उसकी छोटी-सी चीख सुनी, और फिर उसका उठना देखा, और उसकी आवाज़ सुनी — "मैं ठीक हूँ! मैं ठीक हूँ!"

मैंने आँखें बंद कर लीं और दीवार का सहारा लिया। मेरे हाथ की हथेली जल गई थी, और उस पर एक नई पपड़ी बन रही थी। मेरी नाक से खून मेरे होठों तक आ रहा था, और उसका स्वाद मुँह में फैल रहा था — पीतल जैसा।

"तू भी जा," पीछे से आवाज़ आई।

मैं पलटा। बूढ़ा खड़ा था, किताब उसके हाथ में थी, और वो मेरी तरफ़ बढ़ा रहा था।

"ले," उसने कहा। "ये तेरे बाप की है। और इसके साथ ये भी ले।" उसने अपनी जेब से एक छोटी पीली शीशी निकाली। "इसमें वो है जो तेरे बाप ने बनाया था — ज़हर नहीं। इलाज। इसे पानी में घोलकर पीना। जले हुए हाथ पर भी लगाना।"

मैंने किताब और शीशी ली। उसका हाथ अब भी काँप रहा था।

"तू क्यों?" मैंने पूछा।

वो मुस्कुराया, और वो मुस्कान बहुत थकी हुई थी।

"क्योंकि मैं बीस साल से गिन रहा था," उसने कहा। "और आज मेरी गिनती पूरी हो गई।"

फिर उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो पहले नहीं था — शायद पछतावा, शायद सिर्फ़ थकान।

"जा," उसने कहा। "खिड़की से। और जब अदालत में बैठे, तो मेरी किताब पढ़ना। जो मैंने लिखा है, वो किसी ने नहीं पढ़ा। अब कोई पढ़ेगा।"

मैं खिड़की की चौखट पर चढ़ा। नीचे देखा — चंदा घास में खड़ी थी, और उसके हाथ में एक टूटी डाली थी, और वो ऊपर देख रही थी।

"नीचे हट!" मैंने चिल्लाया।

वो पीछे हटी।

मैंने शीशी और किताब अपनी धोती की कमर में खोंसी, और खुद को खिड़की से बाहर गिराया।

हवा मेरे चेहरे से टकराई, और फिर मेरा शरीर घास पर गिरा, और मेरी पसलियों में एक झटका लगा। मैंने करवट लेकर खुद को सँभाला और ज़मीन पर लेटा रहा, साँस भरता हुआ।

तभी ऊपर से एक आवाज़ आई — नहीं, आवाज़ नहीं, आवाज़ से बड़ा कुछ। जैसे पहाड़ का कोई टुकड़ा टूटकर गिरा हो।

मैंने ऊपर देखा।

कोठी की छत का बीच का हिस्सा धँस रहा था। पहले धीरे, फिर तेज़, और फिर पूरा कमरा अपने भीतर समेटकर नीचे आने लगा — जलती लकड़ियाँ, टूटी कुर्सी, और लालटेन।

"वीर!" चंदा चीखी।

मैं उठा, उसे अपनी बाँह में लिया और दौड़ा — पीछे आँगन से दूर, दीवार की तरफ़, उस आख़िरी कोने की तरफ़ जहाँ कुआँ था।

और पीछे, बहुत पीछे, कोठी की छत गिरी — एक भारी, गड़गड़ाती आवाज़ के साथ जिसने हवा को हिला दिया, और धूल और राख का बादल आसमान तक उठा।

मैं कुएँ के पास रुका और पलटकर देखा।

कोठी अब जलती हुई ढेर थी। और उस ढेर के नीचे, मुझे पता था, वो बूढ़ा था — जिसने बीस साल गिना, और आज अपनी गिनती पूरी की।

चंदा मेरी बाँह में रो रही थी। और मैं खड़ा था, हाँफता हुआ, उसकी छोटी पीठ को सहलाते हुए।

तभी सामने की तरफ़ से आवाज़ें आईं — भागते पैरों की, चिल्लाने की, और मशालों की रोशनी दीवारों पर दौड़ने लगी।

"वीर! वीर!"

टिंकू पहले आया, और उसके पीछे मीरा। और उनके पीछे— दौड़ते हुए, एक हाथ से अपनी साड़ी सँभालते हुए — माँ।

टिंकू मेरे पास पहुँचा और मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखें फैल गईं।

"तेरा हाथ—"

"बाद में," मैंने कहा। "पहले चंदा।"

पर चंदा मेरी बाँह से नहीं उतर रही थी। उसने मेरी गर्दन और कसकर पकड़ ली थी, और उसकी साँस मेरे कंधे पर गीली हो रही थी।

मीरा मेरे पास आई। उसने चंदा को देखा, फिर मेरा हाथ देखा, और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"ये जला है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डॉक्टर थी जो डर को छिपाती है। "पूरी हथेली। वीर, तू—"

"मैं ठीक हूँ," मैंने कहा।

"तू ठीक नहीं है," उसने कहा, और उसने अपना बैग खोला। "बैठ। अभी।"

मैं बैठ गया — घास पर, कुएँ के किनारे। चंदा मेरी गोद में थी, और माँ मेरे पास आकर घुटनों के बल बैठ गईं, और उन्होंने मेरा चेहरा अपने हाथों में लिया। उनके हाथ ठंडे थे, और उनकी आँखों में पानी था — पर वो रो नहीं रही थीं।

"तेरी नाक," उन्होंने कहा।

"धुआँ," मैंने कहा।

"झूठ," उन्होंने कहा, और उन्होंने अपनी साड़ी का कोना मेरी नाक पर दबा दिया। "ये खून है। तूने फिर सूंघा।"

मैं चुप रहा।

मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा और उस पर एक ठंडा लेप लगाया। उसकी उँगलियाँ मेरे जले हुए हाथ पर हल्की थीं — इतनी हल्की कि मुझे लगा कि वो छू ही नहीं रही, बस हवा से लगा रही है।

"दर्द होगा," उसने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे।

"हो रहा है," मैंने कहा।

उसने सिर उठाया और मेरी आँखों में देखा। उसकी आँखों में गुस्सा था — वो गुस्सा जो डर से आता है।

"तूने मुझे बाहर भेज दिया," उसने कहा। "तूने मुझे अखाड़े भेज दिया, और खुद अकेला अंदर आ गया। तूने सोचा भी नहीं—"

"मीरा—"

"मैं तेरी गर्दन पकड़कर तुझे हिलाना चाहती हूँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई। "पर तेरा हाथ जला है, इसलिए नहीं हिलाऊँगी।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तो हाथ ठीक होने के बाद हिला लेना," मैंने कहा।

वो एक पल मेरी तरफ़ देखती रही, और फिर उसके होठ काँपे, और वो मुस्कुराई — वो मुस्कान जो रोने से ठीक पहले आती है।

"पगल," उसने कहा, धीरे से।

माँ ने मेरी नाक साफ़ की और मेरे बालों में हाथ फेरा।

"टिंकू," उन्होंने कहा, बिना पीछे देखे। "तेरे भाई को पानी पिला।"

टिंकू ने पानी की थैली बढ़ाई। मैंने पिया, और पानी मेरे गले से नीचे उतरा, और मुझे लगा जैसे मैं ज़िंदा हूँ — सच में ज़िंदा।

तभी मुझे याद आया। मैंने अपनी धोती की कमर से किताब निकाली, और उसकी जिल्द पर मेरे जले हाथ के निशान लग गए।

"ये," मैंने कहा, और आवाज़ मेरी भारी थी। "वो बूढ़ा… वैद्य… उसने दी। और ये शीशी भी।"

माँ ने किताब देखी, और उनका चेहरा बदल गया।

"ये तेरे पिता की लिखाई है," उन्होंने धीरे से कहा। उनकी उँगलियाँ जिल्द पर फिरीं, और उनके हाथ रुक गए। "मैंने ये किताब बीस साल पहले देखी थी। मैंने सोचा था जल गई।"

"वो ज़िंदा था," मैंने कहा। "वैद्य। वो बीस साल से इसी कोठी में था। वो जानता था सब। उसने कबूल किया कि उसने पिता जी के गिलास में ज़हर डाला।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था — न गुस्सा, न दुख। कुछ और। जैसे कोई बहुत पुरानी गाँठ खुल गई हो।

"वो मेरा भाई था," उन्होंने कहा।

मेरे हाथ से शीशी छूटते-छूटते बची।

"क्या?"

"तेरे पिता का दूधभाई," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी। "दोनों एक ही माँ के दूध पिए थे। उसका नाम गोविंदा था। और वो मेरे सामने ही मेरे पति के गिलास में ज़हर डालता था, और मैं कुछ नहीं बोल सकी क्योंकि उसने मेरे हाथ में तेरी जान रखी थी — तू तब तीन साल का था। उसने कहा था कि अगर मैंने एक शब्द बोला, तो तू अगली सुबह नहीं उठेगा।"

चंदा मेरी गोद में सिसक रही थी। मीरा का हाथ मेरे हाथ पर रुक गया।

"तो तू जानती थी?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ फट गई। "बीस साल?"

"मैं जानती थी," माँ ने कहा, और उनकी आँखों से पहला आँसू गिरा — बहुत धीरे, जैसे वो भी डर रहा हो। "और मैं चुप रही। हर रोज़, हर सुबह, जब मैं चक्की चलाती, मैं सोचती — आज बोल दूँ। और फिर तेरा चेहरा देखती, और चुप हो जाती। मुझे माफ़ कर दे, बेटा।"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho