Spirit of a Fighter1160 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1160

7 min read November 5, 2026

"वैद्य," उसने दोहराया, और उसके सूखे होठों पर एक अजीब मुस्कान आई। "हाँ, लोग मुझे यही कहते हैं। पर मेरा एक और नाम भी है, जो तेरे बाप ने रखा था। वो नाम अब किसी को याद नहीं।"

"तो बता," मैंने कहा, और मैंने एक कदम आगे रखा। "मैं याद रखूँगा।"

वो हँसा, पर इस बार हँसी में कुछ और था — कुछ ऐसा जो बहुत पुराना था, बहुत थका हुआ।

"तेरे बाप ने मुझे 'छाया' कहा था," उसने कहा। "क्योंकि मैं हमेशा उसके पीछे चलता था। जब वो अखाड़े में उतरता, मैं बाहर बैठकर उसके लिए पानी तैयार रखता। जब वो घायल होता, मैं उसके घाव सीता। जब वो जीतता, मैं उसके पैरों में हल्दी मलता। और जब उसे ज़हर दिया गया — तब भी मैं वहीं था।"

मेरी साँस रुक गई।

"तू वहाँ था?"

"मैं वही था जिसने वो ज़हर उसके गिलास में डाला।"

कमरे में एक पल को सब रुक गया। लालटेन की लौ भी, मुझे लगा, काँपकर रुक गई।

पीछे चंदा की साँस तेज़ हुई।

"क्यों?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ किसी और की लग रही थी। "तू उसका दोस्त था।"

"क्योंकि तेरे बाप ने मुझसे एक वादा किया था," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ टूटा। "उसने कहा था कि अखाड़े की मिट्टी हम दोनों की है। बराबर की। उसने कहा था कि जिस दिन वो बड़ा पहलवान बनेगा, उस दिन मेरा नाम भी उसके साथ लिखा जाएगा। और फिर उसने अपना नाम अकेले लिखवा लिया। और मेरा नाम उसने मिटा दिया।"

"इसलिए तूने उसे मार डाला?"

"मैंने उसे नहीं मारा," उसने फिर कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में ज़िद थी, बच्चों जैसी ज़िद। "मैंने तो सिर्फ़ उसका घमंड तोड़ा। ज़हर तो उसके भाई ने दिया। मैंने तो बस हाथ बढ़ाया — उसके हाथ में गिलास पकड़ाया।"

मेरा सिर घूम गया। मैंने दीवार का सहारा लिया।

"तू झूठ बोल रहा है," मैंने कहा।

"मैं बीस साल से यही लिख रहा हूँ," उसने कहा, और उसने किताब उठाई। "हर मौत, हर बीमारी, हर शीशी। मैंने सब लिखा है। क्योंकि जो लिखा नहीं जाता, वो होता नहीं।"

तभी ऊपर छत से एक जली लकड़ी गिरी — चंदा के ठीक पीछे। वो चीखी और मेरी तरफ़ लपकी। मैंने उसे अपनी बाँह में ले लिया, और मेरी पीठ पर उसके छोटे हाथ बंध गए।

"अब मत रुक," मैंने उसके कान में कहा। "जब मैं कहूँ, दौड़ना। दरवाज़े तक। सीढ़ियाँ। नीचे टिंकू। समझी?"

उसने मेरे कंधे पर सिर हिलाया। उसका चेहरा मेरी गर्दन में दबा था, और मैं उसकी साँस महसूस कर रहा था — तेज़, छोटी, डरी हुई।

मैंने बूढ़े की तरफ़ देखा।

"किताब दे," मैंने कहा।

"ये किताब तेरे बाप की है," उसने कहा। "ये मेरी नहीं। मैं तो सिर्फ़ इसका रखवाला हूँ।"

"तो रखवाली करके क्या किया? तूने इसे बचाया, पर जिसका ये है, उसे नहीं बचाया।"

वो चुप हो गया।

और उस चुप्पी में मुझे कुछ दिखा — उसके हाथ काँप रहे थे। बूढ़े, झुर्रीदार हाथ, जिनकी नसें उभरी हुई थीं। और उन हाथों में वो किताब किसी चीज़ से ज़्यादा भारी लग रही थी।

"मैं तुझे नहीं मारूँगा," मैंने कहा।

उसने सिर उठाया।

"तू मुझे मार नहीं सकता," उसने कहा। "मैं तेरे बाप का सबसे पुराना साथी हूँ।"

"इसलिए नहीं मारूँगा," मैंने कहा। "क्योंकि तू ज़िंदा रहेगा तो सब बता सकेगा। तेरी किताब में जो लिखा है, वो अदालत में पढ़ा जाएगा। और वो पढ़ेगा वही, जो तेरे बाप ने लिखा था।"

उसके चेहरे पर कुछ बदला। डर नहीं — कुछ और। जैसे कोई बहुत दिनों के बाद अपना ही नाम सुन ले।

"पर पहले," मैंने कहा, और मैंने चंदा को अपनी बाँह से थोड़ा ढीला किया, "इस बच्ची को बाहर जाने दे।"

बूढ़े ने चंदा की तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ पिघला।

"वो ठाकुर की बेटी है," उसने कहा।

"वो एक बच्ची है," मैंने कहा। "और वो नौ साल की है। उसने कुछ नहीं किया।"

बूढ़ा कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसने धीरे से सिर हिलाया — बस एक बार, हल्का-सा।

"जा," उसने चंदा से कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार नरम थी। "तेरे पिता ने जो किया, वो तेरा नहीं है।"

चंदा ने मेरी गर्दन और कसकर पकड़ ली।

"चंदा," मैंने कहा। "अब।"

उसने एक पल मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो डर था जो बच्चों की आँखों में होता है जब उन्हें पहली बार लगता है कि बड़े भी हार सकते हैं।

"तू आएगा ना?" उसने पूछा।

"मैं तेरे पीछे-पीछे आ रहा हूँ," मैंने कहा। "दौड़।"

वो दौड़ी।

मैंने उसे दरवाज़े तक जाते देखा, दालान में घुसते देखा, और फिर सीढ़ियों की तरफ़ मुड़ते देखा।

और तभी — जैसे किसी ने इंतज़ार कर रखा हो — छत के बीच से एक बड़ा जली हुआ शहतीर टूटकर गिरा।

वो सीधे दरवाज़े के सामने गिरा। चंदा चीखी और पीछे हट गई। आग की चिंगारियाँ हवा में उड़ीं, और दरवाज़े का रास्ता पूरा बंद हो गया — जलती लकड़ी, गिरती राख, और धुआँ।

चंदा दालान में फँस गई थी, मुझसे अलग।

"वीर भैया!" उसकी आवाज़ आई, और वो रो रही थी।

मैं आगे बढ़ा, पर बूढ़े ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

"रुक," उसने कहा। "वो रास्ता बंद है।"

मैंने अपना हाथ झटका।

"मेरे पास एक और रास्ता है," मैंने कहा, और मैंने कमरे के दूसरी तरफ़ देखा — जहाँ दीवार में एक छोटी-सी खिड़की थी, जिसके शीशे टूटे थे और जिससे बाहर का अंधेरा दिख रहा था।

उस खिड़की से नीचे, मुझे पता था, पिछला आँगन था। और उस आँगन में घास थी, और थोड़ी दूर पर वो पुराना कुआँ।

मैंने चंदा की तरफ़ देखा — वो दालान में खड़ी थी, आग के उस पार, और उसका चेहरा पीला पड़ गया था।

"चंदा!" मैंने ज़ोर से कहा। "मेरी तरफ़ देख। बस मेरी तरफ़।"

वो मेरी तरफ़ देखने लगी।

"अब दीवार के सहारे-सहारे मेरी तरफ़ आ। आग से दूर रह। दीवार पकड़ के चल।"

वो दीवार पकड़कर चलने लगी। आग उसके पीछे दहक रही थी, और उसकी चोटी की लटें हवा में उड़ रही थीं। वो रेंगती हुई आगे आई, और फिर — एक लंबी साँस लेकर — दौड़कर मेरी तरफ़ आई और मेरे पैरों से लिपट गई।

मैंने उसे उठाया।

उसके हाथ मेरी गर्दन में बंध गए, और उसका चेहरा मेरे कंधे में दब गया। उसका पूरा शरीर काँप रहा था।

"मुझे पता था तुम आओगे," उसने मेरे कान में फुसफुसाया। "मैं गिन रही थी, और मैं सोच रही थी — जब तक बीस नहीं होते, तब तक तुम आ जाओगे। तुम आ गए।"

मेरा गला भर आया।

"हाँ," मैंने कहा। "मैं आ गया।"

मैंने उसे खिड़की के पास ले जाकर नीचे देखा। खिड़की से नीचे की ऊँचाई कम थी — शायद आठ-दस हाथ। नीचे घास दिख रही थी, और उस घास में पानी की चमक।

"चंदा," मैंने कहा, और मैंने उसे खिड़की की चौखट पर बैठाया। "मैं तुझे यहाँ से नीचे उतारूँगा। मैं तेरे हाथ पकड़े रहूँगा, और तू लटक जाएगी। और फिर मैं छोड़ूँगा, और तू घास पर गिरेगी। घास नरम है। समझी?"

उसने नीचे देखा, और उसकी आँखें फिर डर से फैल गईं।

"मुझे डर लग रहा है," उसने कहा।

"मुझे भी," मैंने कहा।

उसने मेरी तरफ़ देखा, हैरानी से।

"अच्छा? तुम्हें भी?"

"बहुत," मैंने कहा। "मेरे हाथ जल रहे हैं। मेरी नाक से खून आ रहा है। और मेरी साँस फूल रही है। पर मैं डर के मारे नहीं रुकूँगा। क्योंकि तू मेरे साथ है।"

उसने मेरे हाथ की तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में पानी आ गया।

"तुम्हारा हाथ…"

"बाद में देखेंगे," मैंने कहा। "अब हिम्मत कर। मेरी गर्दन पकड़।"

मैंने उसे खिड़की से बाहर लटकाया। मेरी हथेली की चमड़ी उसके छोटे हाथों पर चिपक रही थी, और मुझे लगा जैसे कोई मेरे जले हुए हाथ को नाखूनों से खींच रहा हो। मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया, पर मैंने हाथ नहीं छोड़ा।

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