Spirit of a Fighter – Chapter 1159
अंदर अंधेरा था, पर दूर, सीढ़ियों के ऊपर, एक कमरे से पीली रोशनी आ रही थी। और उस रोशनी में एक परछाईं हिल रही थी — छोटी, बच्ची जैसी।
मेरी नाक में गंध आई — कपूर, चंदन, और जला हुआ काग़ज़।
मैं सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा। पहली सीढ़ी चरमराई। मैं रुका, और सुना — ऊपर से किसी के धीरे-धीरे गिनने की आवाज़ आ रही थी।
"एक… दो… तीन…"
मैंने सीढ़ियाँ चढ़नी शुरू कीं, और मेरे कानों में वो गिनती गूँज रही थी — जैसे कोई इंतज़ार कर रहा हो, और गिनती गिनकर बता रहा हो कि उसका सब्र कब खत्म होगा।
और तभी, पीछे से, बाहर से, मुझे एक आवाज़ सुनाई दी — टिंकू की आवाज़, बहुत दूर से, चिल्लाती हुई।
"भाई!"
मैं सीढ़ी पर ही रुका।
"भाई, अंदर मत जा!" उसकी आवाज़ फट रही थी। "ये आग इंसान की नहीं, जान-बूझकर लगाई गई है! भाई, सुन!"
मैंने सीढ़ी की रेलिंग पकड़ी और पलटकर नीचे देखा। टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था, हाँफता हुआ, और उसके चेहरे पर कालिख थी। उसने अखाड़े की तरफ़ से दौड़कर आना — मैं बता सकता था कि वो कितना दौड़ा था।
"मीरा?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ में सवाल था, और डर।
"वो ठीक है!" टिंकू ने कहा। "कालू काका और इंस्पेक्टर ने आठ पहलवान निकाल लिए! माँ भी ठीक है — वो बाहर हैं! पर भाई, ये कोठी भी जलाने की तैयारी है! नीचे तेल बिछा है! मैंने देखा!"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था और वो काँप रहा था, पर वो रुका नहीं।
"भाई, अंदर मत जा," उसने फिर कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी। "प्लीज। मैंने आज एक बार तुझे खोने से बचाया है। दोबारा मत कर।"
मैंने ऊपर देखा — सीढ़ियों के ऊपर, उस पीली रोशनी की तरफ़, जहाँ गिनती चल रही थी।
"टिंकू," मैंने कहा, और मैंने अपनी धोती का कोना उतारा, "अगर मैं नहीं जाऊँगा, तो ऊपर एक नौ साल की बच्ची है। वो अकेली है। और उसके बाप ने आज मुझ पर भरोसा किया है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तू बाहर जा," मैंने कहा। "और अगर मैं न लौटूँ… तो माँ को बता देना कि मैंने वो किया जो सही था।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो पुरानी मुस्कान नहीं थी। फिर उसने अपनी जेब से एक छोटा-सा गीला कपड़ा निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"ले," उसने कहा। "ये मैंने पानी में भिगोया है। मुँह पर बाँध ले। और भाई — तेरी मिठाई मेरे पास रहेगी। तू लौटकर आया, तो खाएगा।"
मैंने कपड़ा लिया और अपने मुँह पर बाँध लिया। ठंडा पानी मेरे होठों से टकराया, और मेरी साँस थोड़ी साफ़ हुई।
मैं पलटा और सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। ऊपर से गिनती की आवाज़ अभी भी आ रही थी — "चार… पाँच… छह…"
मेरे हाथ काँप रहे थे। और मेरी पीठ पर टिंकू की आवाज़ आई, बहुत धीमी, बहुत दूर — "लौटकर आ, भाई। वरना मैं तेरी मिठाई किसी और को खिला दूँगा।"
॥
सीढ़ी की सातवीं पौड़ी पर मेरा पैर फिसला।
नीचे गिरा हुआ काग़ज़ जल रहा था, और उसकी लौ ने सीढ़ी के कोने को पकड़ लिया था। मैंने रेलिंग पकड़ी — लोहे की रेलिंग गरम थी, जैसे अभी-अभी तवे पर रखी हो। हथेली की चमड़ी चटकी, पर मैंने हाथ नहीं छोड़ा।
ऊपर गिनती चल रही थी। "नौ… दस… ग्यारह…"
आवाज़ बच्ची की नहीं थी। बच्ची तो रो रही थी — बहुत धीमे, दबी हुई आवाज़ में, जैसे अपने ही हाथ से मुँह दबा लिया हो। गिनती करने वाला कोई और था। कोई जो जानता था कि मैं आ रहा हूँ, और जान-बूझकर धीरे गिन रहा था।
मैंने मुँह पर बँधा गीला कपड़ा कसा। धुआँ अब भी आँखों में घुस रहा था, और मेरी आँखों से पानी बह रहा था। ऊपर की पीली रोशनी दीवार पर काँप रही थी।
सीढ़ियों के ऊपर एक छोटा दालान था, और उस दालान के आख़िर में एक कमरा — जिसका दरवाज़ा आधा जला हुआ था, और उसके अंदर से वो पीली रोशनी आ रही थी।
मैं दरवाज़े के पास पहुँचा।
कमरे के बीच में एक लालटेन जल रही थी। लालटेन के पास एक लोहे की कुर्सी थी, और उस कुर्सी पर कोई नहीं था। पर कुर्सी के चारों तरफ़ ज़मीन पर काग़ज़ बिछे थे — जले हुए, आधे जले हुए, और कुछ साबुत। और उन काग़ज़ों के बीच, एक टूटे पलंग के नीचे, एक छोटी-सी परछाईं काँप रही थी।
गिनती की आवाज़ आई — "तेरह…"
ये आवाज़ लालटेन के पीछे से आ रही थी। वहाँ अंधेरा था, और उस अंधेरे में कोई बैठा था। मुझे उसकी गंध आई — कपूर, बादाम का तेल, और उसके ऊपर, बहुत हल्की, गुड़ की चाशनी।
मेरा पूरा शरीर कड़ा हो गया।
"चौदह…" वो आवाज़ आई। "पंद्रह…"
"चंदा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धुएँ से फटी हुई थी। "चंदा, मैं आ गया।"
पलंग के नीचे की परछाईं रुकी। फिर एक छोटा-सा चेहरा बाहर झाँका — कालिख से भरा, आँखें लाल, और होठ काँपते हुए।
"वीर भैया?" उसकी आवाज़ फूट गई।
"हाँ। निकल बाहर। अभी।"
वो रेंगकर पलंग के नीचे से बाहर आई, पर आधे रास्ते में रुक गई। उसकी नज़र मेरे पीछे कहीं गई, और उसकी आँखें फैल गईं।
"पीछे मत देख," मैंने कहा। "सिर्फ़ मेरी तरफ़ देख। मेरी आवाज़ सुन।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगी।
"अब रेंगकर बाहर आ," मैंने कहा। "धीरे। ज़मीन पर पेट के बल। मैं तेरा हाथ पकड़ता हूँ।"
वो आगे बढ़ी। उसका छोटा हाथ पलंग के नीचे से बाहर आया, और मैंने उसे पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं — बर्फ़ जैसी ठंडी, इस जलते कमरे में भी।
मैंने उसे खींचा।
पर तभी लालटेन के पीछे से वो आवाज़ फिर आई, और इस बार गिनती नहीं थी।
"सोलह।"
और फिर एक हँसी — छोटी, सूखी, जैसे किसी पुराने ताले में चाबी घूम गई हो।
"तू आ गया, भवानी के बेटे। मैंने सोचा था तू अठारह तक आएगा। तूने मेरा हिसाब बिगाड़ दिया।"
मैंने चंदा को अपने पीछे किया और लालटेन के पीछे देखा।
अंधेरे में एक आदमी बैठा था — बहुत दुबला, बहुत बूढ़ा, सिर पर सफ़ेद बालों की कुछ लटें, और गोद में एक खुली किताब। उसके हाथ में एक जली हुई मोमबत्ती थी जिसकी लौ अब भी काँप रही थी, और उसके चेहरे पर वो रोशनी पड़ रही थी जो इंसान को इंसान नहीं दिखाती।
"तू कौन है?" मैंने कहा।
"मैं वही हूँ," उसने कहा, और उसने किताब बंद कर दी, "जिसे तेरे बाप ने सबसे आख़िर में याद किया था। और मैं वही हूँ जिसे तेरे बाप ने सबसे पहले भुला दिया था। दोनों एक ही हूँ।"
मेरी नाक में उसकी गंध आ रही थी, और वो गंध मुझे कहीं से जानी लग रही थी — पर मैं पकड़ नहीं पा रहा था। धुएँ ने मेरी सूंघने की शक्ति पर पर्दा डाल दिया था, और ये पहली बार था जब मुझे अपनी ही नाक पर गुस्सा आया।
"चंदा," मैंने धीरे से कहा, अपनी पीठ के पीछे। "तू दरवाज़े के पास जा। जब मैं कहूँ, तब सीढ़ियाँ उतरना। सीढ़ियाँ उतरकर नीचे टिंकू खड़ा है। उसे पुकारना।"
"पर तू?"
"मैं तेरे पीछे आ रहा हूँ।"
बूढ़े ने हँसी, और वो हँसी उसके गले में अटक गई, जैसे किसी सूखे कुएँ में पत्थर गिरा हो।
"बड़ी बातें," उसने कहा। "तेरे बाप भी ऐसी ही बातें करता था। और देख, आज वो हड्डियाँ बनकर पड़ा है, और मैं यहाँ बैठा हूँ।"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए।
"तूने उसे मारा?" मैंने पूछा।
"मैंने किसी को नहीं मारा," उसने कहा, और उसने किताब अपनी गोद में रखी। "मैं तो सिर्फ़ वो लिखता हूँ जो होता है। लिखने वाला मारता नहीं, बस याद रखता है।"
"तू वैद्य है," मैंने कहा। और मेरी आवाज़ में वो सारा गुस्सा आ गया जो सुरंग से लेकर अब तक जमा हो रहा था। "तू वही है जो कटोरी लेकर बैठा था। तू वही है जिसने माँ को पीली शीशी दी थी।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno