Spirit of a Fighter1158 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1158

7 min read November 5, 2026

तभी मुझे याद आया — सुक्खी बुआ का वो डरा हुआ चेहरा, जब उसने कहा था कि चंपा के डेरे पर पोटली लेकर एक आदमी आया था। और वो आदमी वैद्य था। और वैद्य ने कहा था — ठाकुर फ़र्ज़ी अस्पताल गाड़ी से भाग गया और चंदा को धमकी दे गया।

धमकी दे गया।

मेरे पैर फिर रुके। सामने, बहुत दूर, श्मशान की पुरानी दीवार दिख रही थी — टूटी हुई, काई लगी, पीली। उसके पार कोठी थी।

मैंने एक गहरी साँस ली और आगे बढ़ा। पगडंडी सँकरी हो रही थी। दोनों तरफ़ बबूल के पेड़ थे, और उनके काँटे धुएँ में भी चमक रहे थे।

और तभी मुझे वो सुनाई दिया — बहुत धीमा, बहुत दूर, पर साफ़। किसी के रोने की आवाज़। बच्ची के रोने की आवाज़।

मैं दौड़ा।

श्मशान की दीवार के पास पहुँचकर मैंने देखा — फाटक खुला था, और उसके अंदर, जली हुई चिताओं के बीच, धुएँ के बीच, एक आदमी खड़ा था। उसके हाथ में मशाल थी और उसके सामने, घुटनों के बल, चंदा बैठी थी — हाथ बँधे, मुँह पर कपड़ा, और आँखों में पानी।

और उस आदमी के पीछे, चिता की राख पर, एक और आदमी बैठा था — व्हीलचेयर पर। रणवीर सिंह।

मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई।

"आ गया," मशाल वाले आदमी ने कहा, और वो पलटा। शेराज़ था — वही लंगड़ा, घसीटते पैरों वाला, जिसके दाँत टूटे थे और आँख में पुरानी चोट का निशान। "देख, भवानी का बेटा। मैंने कहा था न — तेरी माँ भी यहाँ है और तेरी बहन भी। झूठ नहीं बोला मैंने।"

"माँ कहाँ है?" मेरी आवाज़ काली थी।

"माँ तो अखाड़े में है," शेराज़ ने कहा, और वो हँसा — एक छोटी, टूटी हँसी। "और वहाँ जो आग लगी है, वो तेरी माँ को नहीं जलाएगी। वो तुझे जलाएगी। क्योंकि तू वहाँ होता, तो मीरा मरती नहीं। और मीरा मरेगी, तो तेरा दिल मरेगा। और तेरा दिल मरा, तो तू ज़िंदा नहीं रहेगा।"

मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए।

"शेराज़।" रणवीर सिंह की आवाज़ आई — धीमी, थकी, पर उसमें वो गरज थी जो पैंसठ साल की बीमारी भी नहीं खा सकी। "ये बातें छोड़। तू मुझे यहाँ लाकर अपने मालिक का काम कर रहा है। काम कर।"

शेराज़ ने उनकी तरफ़ देखा और फिर मेरी तरफ़। "सुन, भवानी के बेटे। तेरे पास एक चीज़ है जो मेरे मालिक को चाहिए — भवानी की किताब। और वो किताब तू देगा, तो ये लड़की ज़िंदा जाएगी। और ये बूढ़ा भी।"

"किताब?" मैंने कहा।

"वो किताब जिसमें भवानी ने लिखा है कि मिट्टी का राज़ क्या है। वो किताब जो बिशन ने तुझे दी।" उसकी आवाज़ में लालच था। "मालिक कहता है — किताब दे, और सब भूल जा। तेरी माँ, तेरी बहन, तेरी मीरा — सब ज़िंदा।"

मैंने एक कदम आगे बढ़ा। शेराज़ ने मशाल चंदा की तरफ़ झुकाई, और चंदा ने आँखें बंद कर लीं, पर एक आवाज़ नहीं निकली।

"तू मालिक-मालिक करता है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी, बहुत धीमी। "तेरा मालिक अभी जेल में है। ठाकुर महेंद्र सिंह। और तू उसका गुर्गा है — वही गुर्गा जिसे भवानी सिंह ने बचाया था।"

शेराज़ का चेहरा बदला। मशाल का लाल उसके चेहरे पर और गहरा हो गया।

"तू मेरे बाप का नाम मत ले," वो बोला, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ टूटा।

"तो तू बता," मैंने कहा, और मैं एक और कदम बढ़ा। "तू उस आदमी की गुलामी कर रहा है जिसने भवानी सिंह को ज़हर दिया। तेरे चाचा बिशन ने मुझे सब बताया। वो बूढ़ा भट्ठे पर रोया था — तेरे लिए। कह रहा था कि मैंने इसे भवानी की क़सम खिलाकर जाल में फँसाया।"

शेराज़ का हाथ काँपा। मशाल की लौ काँपी।

"झूठ," वो बोला, पर उसकी आवाज़ में दम नहीं था।

"बिशन तेरा चाचा है," मैंने कहा। "और भवानी सिंह तेरे बाप का दूधभाई था। तू उसी घर का है जिसे तू जला रहा है।"

उसने मशाल नीचे की। चंदा ने आँखें खोलीं और मेरी तरफ़ देखा। और उसकी आँखों में उम्मीद थी — वो उम्मीद जो डर से भी बड़ी होती है।

"मुझे किताब नहीं चाहिए," शेराज़ ने धीरे से कहा, और वो जैसे खुद से बोल रहा था। "मुझे तो बस… मुझे तो बस ये जगह छोड़नी है। पर मालिक कहता है — जब तक ये काम नहीं होगा, तब तक मेरी बेटी उसके पास रहेगी।"

मैं रुक गया।

"तेरी बेटी?"

"नौ साल की है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ फट गई। "भट्ठे पर रहती थी मेरी बीवी के साथ। मालिक ने उसे उठा लिया। कहता है — काम कर, तो लौटा दूँगा।"

अब मैं समझा।

मैंने मशाल की लौ देखी, चंदा के बँधे हाथ देखे, और पीछे रणवीर सिंह को देखा — जो व्हीलचेयर पर बैठे थे, और उनकी आँखें मुझ पर थीं। और उनकी आँखों में कुछ था — न डर, न हिम्मत — बस एक पुरानी थकान, और एक चुप्पी जो कह रही थी, बेटा, तू जानता है क्या करना है।

"शेराज़," मैंने कहा, और मैंने अपनी आवाज़ नरम की, "तेरी बेटी कहाँ है?"

"मालिक के पास," उसने कहा। "उसी बंद कोठी में।"

मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ। वही कोठी। जहाँ से कोई नहीं लौटता।

"तो सुन," मैंने कहा, और मैं एक कदम और बढ़ा। "आज तेरे पास दो रास्ते हैं। एक — तू मशाल चंदा पर रख दे, और मेरे हाथ बँध जाएँ, और तेरा मालिक तेरी बेटी को कभी नहीं लौटाएगा, क्योंकि जिसके पास किताब होगी, उसे बेटी की ज़रूरत नहीं रहेगी। और दूसरा — तू मेरे साथ चल, कोठी का दरवाज़ा खोल, और अपनी बेटी को खुद अपनी बाँहों में ले।"

शेराज़ ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँख में वो पुरानी चोट चमक रही थी।

"तू मुझ पर भरोसा करेगा?" उसने पूछा। "जिसने तेरे बाप को मारने में हाथ बँटाया?"

"मैं तुझ पर भरोसा नहीं कर रहा," मैंने कहा। "मैं तेरी बेटी पर भरोसा कर रहा हूँ। जो नौ साल की है और जिसे नहीं पता कि उसका बाप बुरा आदमी है या अच्छा। वो बस अपने बाप का इंतज़ार कर रही है।"

शेराज़ का हाथ काँपा। मशाल की लौ झुकी, और फिर वो उसने पूरी तरह नीचे कर दी। लौ ज़मीन पर लगी और राख में दब गई।

"मैं तुझे नहीं मारूँगा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में रोना था। "पर मालिक तुझे मारेगा। वो कोठी में है। और वो तैयार है।"

"मुझे पता है," मैंने कहा।

मैंने दो कदम बढ़कर चंदा के हाथ खोले। उसके मुँह से कपड़ा हटाया। वो मेरे गले लग गई और उसका शरीर काँप रहा था।

"मैं डर गई थी," उसने फुसफुसाया।

"अब नहीं," मैंने कहा, और मैंने उसका सिर सहलाया। "अब तू रणवीर दादा के पास जा। और उन्हें लेकर शेराज़ के साथ नहर किनारे चली जा। वहाँ कालू काका होंगे।"

"और तू?" चंदा ने पूछा।

मैंने उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखों में वही उम्मीद थी, और मैंने उसे झूठ नहीं बोला।

"मैं कोठी जा रहा हूँ," मैंने कहा।

शेराज़ ने रणवीर सिंह की व्हीलचेयर पकड़ी और मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में अब वो डर नहीं था — बस एक अधूरा सवाल।

"वीर सिंह," उसने कहा, "अगर तू मेरी बेटी को निकाल लाए… तो मैं तेरे सामने घुटने पर बैठूँगा।"

"मेरे सामने मत बैठ," मैंने कहा। "अपनी बेटी के सामने बैठ। और उसे बता कि तू क्या-क्या करता रहा। वो तुझे माफ़ करे या न करे — वो उसका हक़ है।"

वो सिर हिलाता रह गया, और फिर वो चंदा और रणवीर सिंह को लेकर नहर की तरफ़ चला। मैंने उन्हें जाते देखा — एक लंगड़ा आदमी व्हीलचेयर धकेल रहा था, और एक लड़की उसके पीछे-पीछे चल रही थी, और उसके कंधे अभी भी काँप रहे थे।

फिर मैं पलटा और कोठी की तरफ़ बढ़ा।

कोठी अब पहले जैसी नहीं थी। दीवारें काली पड़ गई थीं, और खिड़कियाँ टूटी हुई थीं। दरवाज़े पर ताला लगा था, पर वो टूटा हुआ था — जैसे किसी ने जल्दी में तोड़ा हो।

मैंने दरवाज़ा धकेला और अंदर गया।

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