Spirit of a Fighter – Chapter 1157
वकील की आँखें भर आईं। "भाई साहब, मैं तो बस—"
"कहाँ?"
"श्मशान," उसने हाँफते हुए कहा। "पुराने श्मशान के पार, वहाँ एक बंद कोठी है। ठाकुर ने कहा कि अगर कोई उसे रोकने आए, तो वो उस कोठी में सबको जला देगा।"
मेरी मुट्ठी ढीली पड़ गई।
मीरा मेरे पास आई। उसका हाथ मेरे बाज़ू पर था। "वीर, वो श्मशान वही है जिसका पता माँ की थैली में मिला था।"
"हाँ," मैंने कहा। "और वही जगह है जहाँ भैरव का नाम बीस साल से बंद है।"
मैंने वकील को छोड़ दिया और सिपाहियों की तरफ़ इशारा किया जो दौड़कर आ रहे थे। "इसे रखो," मैंने कहा। "और इंस्पेक्टर शर्मा को बोलो — श्मशान के पार वाली कोठी। अभी।"
फिर मैं पलटा और टिंकू की तरफ़ देखा।
"भाई," टिंकू ने कहा और अपनी डिब्बी उठाई, "मैं साथ चलूँगा। और इस बार मैं अपनी मिठाई नहीं छोड़ूँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर वहाँ कोई बच्चा होगा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो पुरानी मुस्कान लौट आई, "तो उसे मिठाई चाहिए होगी। और अगर कोई बूढ़ा होगा, तो भी।"
मेरी आँखें भर आईं। मैंने उसका कंधा थामा और कुछ नहीं कहा।
हम निकले। सड़क पर धूल उड़ रही थी और दूर श्मशान की तरफ़ जाने वाला रास्ता खाली पड़ा था। पर हम दस कदम भी नहीं चले थे कि मेरी नाक में कुछ आया — जला हुआ कपड़ा, गरम लोहा, और तेल।
मैं रुक गया।
"क्या?" मीरा ने पूछा।
"आग," मैंने कहा। "बहुत बड़ी आग।"
तभी शहर की तरफ़ से एक आवाज़ आई — बहुत दूर से, पर साफ़। और फिर एक और, और फिर कई सारी।
मैंने पलटकर देखा।
आसमान में, शहर के उस पार, धुएँ का एक बड़ा गोला उठ रहा था — काला, मोटा, जैसे कोई पहाड़ उठ रहा हो।
और दूर से लोग चिल्लाते हुए दौड़ते आ रहे थे।
"अखाड़ा जल रहा है!" एक आदमी चिल्ला रहा था, हाँफते हुए, और उसका चेहरा काला था। "बड़ा अखाड़ा! बड़ा अखाड़ा जल रहा है!"
मेरे पैर जम गए।
टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा। "भाई, वो तो—"
"वहाँ माँ है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ सिर्फ़ फुसफुसाहट थी। "गुड़िया है। सुक्खी बुआ है।"
मीरा ने मेरे दूसरे हाथ पर हाथ रखा। उसकी हथेली ठंडी थी, पर उसकी पकड़ मज़बूत।
"वीर," उसने कहा, और सिर्फ़ मेरा नाम बोला।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था, पर वो रो नहीं रही थी। और उसकी आवाज़ में वो डर था जो अब तक कभी नहीं था — डर मेरे लिए, अखाड़े के लिए नहीं।
"हम दो जगह नहीं जा सकते," मैंने कहा। "श्मशान और अखाड़ा। एक चुनना पड़ेगा।"
"नहीं," मीरा ने कहा, और उसने मेरा हाथ नहीं छोड़ा। "आज कोई चुनाव नहीं है। आज हम बँटेंगे।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तू श्मशान चल," उसने कहा। "चंदा और ठाकुर तेरे पास हैं। अखाड़ा मेरे पास। मैं और टिंकू जाएँगे।"
टिंकू ने एक पल के लिए कुछ नहीं कहा। फिर उसने अपनी डिब्बी मीरा की तरफ़ बढ़ाई। "मैडम, ये पकड़ो। और मेरी बात सुनो — अगर वहाँ कोई बच्चा फँसा हो, तो उसे पहले बाहर निकालना। मिठाई बाद में।"
मैंने मीरा का हाथ पकड़ा। मेरे हाथ काँप रहे थे, और वो जानती थी।
"तू अकेली नहीं है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ टूटी।
"मुझे पता है," उसने कहा, और एक पल के लिए उसने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे कुछ और कहना चाहती हो, पर नहीं कहा। "तू भी अकेला नहीं है।"
फिर वो पलटी और टिंकू के साथ अखाड़े की तरफ़ दौड़ पड़ी, और मैं उन्हें जाते देखता रहा — एक लंबी लड़की अपने कंधे पर काग़ज़ों का बंडल लिए, और एक लंबा दुबला आदमी अपनी टोपी पकड़े, दोनों धूल में दौड़ते हुए।
मैंने आँखें बंद कीं और साँस ली। हवा में अभी भी जली हुई मिट्टी थी, और उसके नीचे — दूर, बहुत दूर — श्मशान की राख।
मैं पलटा और दूसरी तरफ़ दौड़ा।
॥
मैं दौड़ रहा था, पर मेरे पैर मेरे साथ नहीं थे।
धूल, कंकड़, सूखी घास — सब पैरों के नीचे से ऐसे निकल रहे थे जैसे ज़मीन मुझे उल्टी गिनती सुना रही हो। सामने शहर की तरफ़ जाने वाला रास्ता था, और उस रास्ते के ऊपर धुआँ — मोटा, काला, धीरे-धीरे फैलता हुआ, जैसे किसी ने आसमान पर चादर तान दी हो।
मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मीरा और टिंकू अखाड़े की तरफ़ गए थे, और मैं श्मशान की तरफ़। बीच में एक पल के लिए मेरा दिल कह रहा था कि पलट जा, उनके साथ चल। पर पैर नहीं रुके। क्योंकि अगर मैं पलटता, तो चंदा वहाँ अकेली रह जाती — ठाकुर के हाथ में, उस कोठी में, जहाँ से किसी को लौटना नहीं था।
रास्ते में पहला आदमी मिला — एक बूढ़ा, जिसकी आँखें धुएँ से लाल थीं और हाथ में टूटा हुआ डंडा। वो मेरी तरफ़ नहीं देख रहा था, बस अपने आगे देख रहा था, और मुँह से झाग जैसी बातें निकल रही थीं।
"भाई, अखाड़े की तरफ़ मत जाना!" मैंने उसका कंधा पकड़ा। "मेरी माँ वहाँ है, बताओ क्या हुआ!"
उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो डर था जो इंसान को जानवर बना देता है।
"अंदर पहलवान फँसे हैं," वो बोला, और उसकी आवाज़ काँप रही थी। "आठ-दस। सोए थे। दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया किसी ने। और फिर… और फिर आग।"
मेरे पैर वहीं जम गए। मेरे पीछे शहर था, जहाँ मीरा और टिंकू दौड़ रहे थे, और मेरे सामने श्मशान का रास्ता।
"तुम पुलिस को बोलो," मैंने उस बूढ़े से कहा, और मेरी आवाज़ खुद मुझे पराई लगी। "इंस्पेक्टर शर्मा को। बोलो कि वीर सिंह ने भेजा है। और बोलो कि अखाड़े के पीछे वाला कुआँ — वहाँ से लोग बचाए जा सकते हैं। कालू काका वहाँ हैं, वो रास्ता जानते हैं।"
वो बूढ़ा सिर हिलाता रह गया, और मैं पलटकर आगे बढ़ गया। मेरे कानों में अभी भी उसकी आवाज़ थी — "आठ-दस। सोए थे। दरवाज़ा बाहर से बंद।"
किसी ने सोए हुए पहलवानों का दरवाज़ा बंद किया और आग लगाई। ये हादसा नहीं था। ये इंतज़ार था — मेरे लिए। मुझे दो जगहों के बीच फाड़ने के लिए।
मैं दौड़ता रहा, और रास्ता बदलने लगा। पक्की सड़क छूट गई, अब कच्ची पगडंडी थी, जिसके दोनों तरफ़ ऊँची सूखी घास थी और दूर-दूर तक कोई घर नहीं। श्मशान की तरफ़ जाने वाला रास्ता हमेशा से ही सुनसान था — यहाँ दिन में भी लोग अकेले नहीं आते थे।
हवा बदल गई।
मैंने अपनी चाल धीमी की और आँखें बंद कर लीं। मेरी नाक भरी हुई थी, जलन से, और सिर के पीछे एक दर्द उभर रहा था जो मुझे पता था — अगर मैंने इस शक्ति को ज़्यादा इस्तेमाल किया तो नाक से खून बहेगा। पर यहाँ, इस वक़्त, इसके सिवा कोई रास्ता नहीं था।
जली लकड़ी। गरम लोहा — वो लोहा जो आग में तपकर लाल हो जाता है और फिर ठंडा होते-होते काला पड़ जाता है। राख। गोबर के उपले का धुआँ। और उसके नीचे, बहुत गहरे में, एक और गंध — मीठी, चिकनी, जैसे किसी ने नारियल तोड़कर उसका तेल हाथों में मला हो।
नारियल का तेल।
चंदा के बालों में वही लगा था। उस रात कोठे में जब मैंने उसे छुड़ाया था, तब भी वही गंध आई थी — उसके सिर से, जब वो मेरे कंधे पर गिरी थी। और उससे पहले, हवेली में, जब वो चुपचाप बैठी थी और उसकी माँ की बातें सुन रही थी।
मैंने आँखें खोलीं और मीरा की तरफ़ देखा — नहीं, मीरा वहाँ नहीं थी। मैं अकेला था, सुनसान रास्ते पर, और मेरे सामने सिर्फ़ धुआँ था।
"वो अंदर है," मैंने खुद से कहा, और मेरी आवाज़ रेत में गिरी।
पर ये कैसे हो सकता था? चंदा अखाड़े में थी? जब मैं उसे छोड़कर आया था, तो वो सुक्खी बुआ के पास थी। और माँ भी वहीं थी। और गुड़िया भी।
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