Spirit of a Fighter – Chapter 1156
मैं रुका। मेरे अंदर वो पुरानी गली की बात दौड़ गई — एक बात जो मैंने कभी किसी को नहीं बताई थी। मैंने पोटली को करीब लाकर सूंघा।
कपूर। भवानी की गंध। और हल्की-सी कड़वाहट — वही जो शीशियों में थी।
"इसमें ज़हर है," मैंने कहा और पोटली पकड़ ली।
"हाँ," वैद्य ने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मुझे समझ नहीं आया। "बीस साल से है। और मैं हर रोज़ इसे खोलकर देखता हूँ। पता है क्यों? क्योंकि मैं चाहता हूँ कि ये तुम्हारे हाथ लगे। मैं बीस साल से इस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ।"
टिंकू ने पीछे कदम रखा। "ये क्या बोल रहा है?"
मैंने पोटली खोली। अंदर एक कटोरी थी, छोटी, पीतल की, और उसमें सूखा हुआ पाउडर — हल्का पीला, रेत जैसा। और उसके नीचे एक तह किया हुआ काग़ज़।
मैंने काग़ज़ खोला।
उस पर लिखाई थी — भवानी की लिखाई, वही जो मैंने हवेली में देखी थी। पर ये कोई चिट्ठी नहीं थी। ये एक नुस्ख़ा था। कुछ शब्दों के ऊपर लकीर खींची थी, और नीचे लिखा था —
"इसका इलाज यही है। जो इसे पिए, उसे हर दिन ये कटोरी चाटनी पड़ेगी। बीस साल। तब जाकर शरीर साफ़ होगा। मैंने अपने लिए बनाया था। पर मेरा भाई मुझसे पहले पहुँच गया।"
मेरे हाथ काँपने लगे।
"मतलब," टिंकू ने धीरे से कहा, "तुम्हारे बाप ने अपने लिए ज़हर का इलाज बनाया था?"
"नहीं," वैद्य ने कहा। "उसने ज़हर का नहीं, बीमारी का इलाज बनाया था। भवानी को पता था कि उसका भाई उसके पानी में कुछ मिलाता है। पर वो यह नहीं जानता था कि क्या मिलाता है। तो उसने एक-एक चीज़ अलग करके देखी। महीनों लगाए। और जब उसे पता चला, तो उसने ये कटोरी बनाई।" उसने उँगली से पाउडर की तरफ़ इशारा किया। "ये वो इलाज है। अगर भवानी ने इसे खाया होता, तो वो बच गया होता।"
कमरे में सन्नाटा था।
"तो उसने क्यों नहीं खाया?" मेरी आवाज़ फटी हुई थी।
वैद्य ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में पहली बार कुछ ऐसा आया जो मुझे छू गया — शर्म।
"क्योंकि मैंने उसे देर से दिया," उसने कहा। "मैंने उसे उस रात दिया जब वो मर रहा था। मैं डर गया था। मुझे लगा अगर मैं ये दूँगा, तो नंदकिशोर को पता चल जाएगा कि मैं जानता हूँ। तो मैं चुप रहा। बीस साल चुप रहा।" उसने अपनी कटोरी उठाई। "और आज जब तुम्हारी माँ ने अदालत में सब बताया, तो मुझे लगा अब मेरी चुप्पी की उम्र पूरी हो गई।"
मैंने कटोरी को अपनी मुट्ठी में कस लिया।
"एक बात बताओ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी। "मेरी माँ का यहाँ क्या काम था? उसकी गंध इन दीवारों में क्यों बसी है?"
वैद्य ने सिर झुकाया। "वो यहाँ आती थी। भवानी के मरने के बाद भी, कुछ महीने तक आती रही। मुझसे पूछती थी — 'कुछ बचा है? कोई चीज़ जो उसने छोड़ी हो?' मैंने उसे कुछ नहीं बताया। मैंने उसे ये कटोरी नहीं दिखाई। मैंने उसे ये काग़ज़ नहीं दिखाया।" उसकी आवाज़ टूटी। "मैंने उसे यह कहकर भेज दिया कि भवानी ने कुछ नहीं छोड़ा। और वो रोती हुई चली गई। और मैं ये सब लेकर बैठा रहा, बीस साल।"
मेरे अंदर कुछ ऐसा उठा जो मैं रोक नहीं पाया। मैंने कटोरी टिंकू के हाथ में थमाई और वैद्य की तरफ़ बढ़ा। टिंकू ने मेरा बाज़ू पकड़ लिया।
"भाई, नहीं।"
"छोड़," मैंने कहा।
"भाई, ये बूढ़ा है—"
"मैंने कहा छोड़।"
पर तभी बाहर से आवाज़ आई। तेज़, दौड़ते कदमों की, और फिर मीरा की आवाज़ — "वीर! वीर, बाहर आओ!"
मैं रुक गया। मेरी साँस अभी भी गरम थी, पर मैंने हाथ नीचे कर लिया।
मीरा दरवाज़े पर खड़ी थी, हाँफती हुई, और उसके हाथ में काग़ज़ों का बंडल था। उसके बाल बिखरे थे और उसके कपड़ों पर धूल थी — जैसे वो दौड़कर आई हो।
"वो भाग गया," उसने कहा।
"कौन?"
"ठाकुर।" उसने एक काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "जज ने उसे हिरासत में भेजा, पर रास्ते में उसका वकील आया और उसने अपना दावा बदल दिया। अब वो कह रहा है कि ठाकुर बीमार है और उसे अस्पताल ले जाना है। और अस्पताल की गाड़ी में वो फ़र्ज़ी सिपाही थे, वीर। असली पुलिस अभी रास्ते में है।"
मेरा दिल धड़का। "चंदा?"
"वो अभी अदालत में है। मैंने उसे वहीं रोका है। पर ठाकुर ने धमकी दी है — उसने बाहर जाते वक़्त कहा, 'मेरी बेटी मेरे पास आएगी, और तब कोई नहीं बचेगा।'"
वैद्य ने पीछे से धीरे से कहा, "वो झूठ नहीं बोल रहा।"
हम सब उसकी तरफ़ पलटे।
"क्या मतलब?" मैंने पूछा।
वैद्य ने अपनी कटोरी उठाई। "नंदकिशोर के पास एक और चीज़ है जो मैंने बनाई थी। शीशियाँ नहीं। एक चीज़ और। वो इसे कभी इस्तेमाल नहीं करता, क्योंकि वो इसे अपने लिए रखता है।"
"क्या है वो?"
"वो एक चीज़ है जो आदमी को बोलने पर मजबूर करती है। सच बोलने पर।" वैद्य की आँखें मेरी आँखों से मिलीं। "वो इसे 'आख़िरी सवाल' कहता है। अगर वो ये किसी को पिला दे, तो उस आदमी के मुँह से वो सब निकल आता है जो उसने ज़िंदगी भर छिपाया।"
मीरा ने काग़ज़ों का बंडल अपनी छाती से लगाया। "तो फिर हमें उससे पहले चंदा को बचाना होगा।"
"नहीं," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में अब वो घबराहट नहीं थी जो अभी थी। "हमें चंदा को नहीं, उससे पहले उस वकील को पकड़ना होगा। वो वकील उसे गाड़ी तक ले गया, तो वो जानता है गाड़ी कहाँ जाएगी।"
मीरा ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, और फिर उसने सिर हिलाया। "वकील अदालत के पीछे वाले कमरे में है। वो अपनी फ़ाइलें समेट रहा है।"
"चलो।"
हम निकले। रास्ते में मैंने वैद्य की कटोरी अपनी जेब में रख ली — पीली शीशी के पास। दोनों ठंडी थीं, पर एक दूसरे से अलग। जैसे एक ज़ख़्म और उसका मरहम, एक जेब में।
बाहर निकलते वक़्त वैद्य ने मुझे रोका। "वीर सिंह।"
मैं रुका, पर पलटा नहीं।
"जब तुम उसे पकड़ो," उसने कहा, "तो उससे ये पूछना — कि भवानी ने मरते वक़्त किसका नाम लिया था। वो नाम जानकर तुम्हारी दुनिया बदल जाएगी।"
मैंने कुछ नहीं कहा। पर मेरे पैर एक पल के लिए भारी हो गए।
अदालत के पिछले हिस्से में पहुँचने पर हमें सिर्फ़ एक खाली कमरा मिला। मेज़ पर फ़ाइलें बिखरी थीं और कुर्सी गरम थी। मैंने हवा में साँस ली।
"अभी गया है," मैंने कहा। "दो मिनट पहले।"
"कहाँ से?" मीरा ने पूछा।
मैंने खिड़की की तरफ़ देखा। वो खुली थी, और उसके नीचे घास पर पैरों के निशान थे — जल्दी में बने, कीचड़ में धँसे।
"बाहर," मैंने कहा। "वो गाड़ी के पास जा रहा है।"
हम खिड़की से कूदे। मेरी चप्पल फिसली, पर मैंने खुद को सँभाला। सामने अदालत का पिछला आँगन था, और उसके पार एक छोटी सड़क जो सीधे बाज़ार को जाती थी। और उस सड़क पर एक बैलगाड़ी खड़ी थी — काली, ऊँची, और उस पर एक आदमी बैठा था जो कुछ बोल रहा था।
मैंने दौड़ना शुरू किया।
तभी वकील सामने से आया, हाथ में फ़ाइलें, और वो मुझे देखकर रुक गया। उसका चेहरा पीला पड़ गया और वो पलटकर भागने लगा।
"टिंकू!" मैंने चिल्लाया।
टिंकू ने अपनी डिब्बी एक तरफ़ रखी और वकील के आगे आकर खड़ा हो गया। उसने अपने दोनों हाथ फैलाए, और वकील उससे टकराकर गिर पड़ा। काग़ज़ हवा में उड़ गए।
"माफ़ करना सर," टिंकू ने कहा और उसे दबोच लिया, "पर आज मेरी मिठाई का डिब्बा भारी है और मैं इसे अकेला नहीं छोड़ सकता।"
मैं वकील के पास पहुँचा और उसका कॉलर पकड़ लिया। "गाड़ी कहाँ जाएगी?"
"मुझे नहीं पता—"
"झूठ मत बोलो।" मेरी आवाज़ ऐसी थी जो मैंने खुद नहीं सुनी थी। "तुमने उसे गाड़ी तक पहुँचाया। तुम जानते हो।"
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