Spirit of a Fighter1155 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1155

7 min read November 5, 2026

मेरे पैर ज़मीन पर जम गए।

"वैद्य?" मैंने कहा। "जिसने शीशी बनाई थी?"

"हाँ," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ अब हल्की नहीं थी। "और भाई, वो वैद्य अब भट्ठे के पीछे नहीं बैठता। चंपा कह रही थी कि वो अब ठाकुर के पुराने कमरे में बैठता है। उसी कमरे में जहाँ से शीशियाँ निकलती थीं।"

मैंने अपनी मुट्ठी कस ली। जेब में माँ की पीली शीशी ठंडी थी।

"तो चल," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी। "आज हम उस कमरे की तरफ़ जा रहे हैं जहाँ से सारी शीशियाँ निकली थीं। और इस बार, टिंकू —"

"क्या?"

"इस बार हम अंदर जाने से पहले सूंघ लेंगे।"

॥

"सूंघ लेंगे।" टिंकू ने मेरी बात दोहराई, पर उसकी आवाज़ में वो भरोसा नहीं था जो अभी लड्डू खाते वक़्त था। उसने अपनी टोपी ठीक की और डिब्बी कसकर पकड़ ली। "भाई, एक बात कहूँ? मैं तो आज तक मिठाई के डिब्बे से डरा नहीं, पर आज पता नहीं क्यों, ये डिब्बा भारी लग रहा है।"

"भारी नहीं है," मैंने कहा और चल पड़ा। "तू भारी सोच रहा है।"

हम भट्ठे की तरफ़ के रास्ते पर मुड़े ही थे कि पीछे से सुक्खी बुआ की आवाज़ आई। "अरे वीर! अरे वीर, रुक ज़रा!"

वो दौड़ती हुई आ रही थी, साड़ी का पल्लू एक हाथ से थामे, दूसरे हाथ में पान का बीड़ा। हाँफते हुए पास पहुँची और मेरे कंधे पर हाथ रखकर झुक गई।

"अरे मैंने तो सुना है," उसने कहा, और साँस भरने के लिए रुकी, "कि ठाकुर के पुराने कमरे में कोई बैठा है जो बीज बेचता है। पर सुन, वो आदमी अंधा नहीं है जैसा लोग कहते हैं। मैंने खुद देखा है — चंपा के डेरे पर जब वो पोटली रखकर गया, तो उसने पीछे मुड़कर देखा था। और उसकी आँखें… वो देख रही थीं, वीर। देख रही थीं।"

मेरे पेट में एक ठंडी गोली घूम गई। "बुआ, तुमने उसे कहाँ जाते देखा?"

"अरे वही तो," उसने पान का बीड़ा मुँह में दबाया और बोली, "वो भट्ठे के पीछे वाली पगडंडी से नहीं गया। वो सीधे गाँव के बीच से गया। बाज़ार से। और सुन — जाते वक़्त उसके हाथ में एक लालटेन थी। दिन में लालटेन। कौन दिन में लालटेन लेकर चलता है, बोल?"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।

"वो लालटेन नहीं थी," मैंने कहा। "वो शीशी थी। लाल रंग की।"

सुक्खी बुआ का मुँह खुला रह गया। फिर उसने अपना पल्लू ठीक किया और बोली, "मैं तो कहती हूँ वीर, अब तू सीधे थाने जा। मुझे तो नींद में भी वो आदमी दिखता है, मुँह पर कपड़ा बाँधे।"

"बुआ," मैंने कहा और उसके हाथ को हल्के से थामा, "तुम घर जाओ। माँ को देखना। और गुड़िया को अपने पास रखना।"

"अरे मैं तो—"

"प्लीज, बुआ।"

वो एक पल मेरे चेहरे को देखती रही। फिर उसने सिर हिलाया और पलट गई, पर जाते-जाते रुकी और बिना पलटे बोली, "तेरी माँ ने आज अदालत में जो किया, वो सबने देखा है। अब गाँव तेरे साथ है, वीर। पहले नहीं था, पर अब है।"

वो चली गई। मैं कुछ पल वहीं खड़ा रहा।

"भाई," टिंकू ने धीरे से कहा, "लाल शीशी। वो वही है ना जो—"

"हाँ। वही लाल शीशी जो माँ ने मुझे दिखाई थी, जिसमें ज़हर के दाने थे।" मैंने कदम बढ़ाए। "वैद्य ने वो शीशी किसी को देने के लिए निकाली है। और अगर वो उसे ठाकुर के आदमियों तक पहुँचा देता है, तो सारा सबूत बेकार।"

"तो फिर देर किस बात की," टिंकू ने कहा और मेरे साथ चल पड़ा। पर तीन कदम चलकर वो फिर बोला, "भाई, एक बात। वैद्य को मैं एक बार देख चुका हूँ। भट्ठे के पीछे, तब मैं छोटा था। वो मुझे गुड़ देता था। और कहता था — 'बेटा, मिठाई में शक्कर कम डालना। शक्कर ज़्यादा हो तो आदमी को पता चल जाता है कि कुछ मिलाया गया है।'"

मैं रुका। "उसने तुझे ये बताया था?"

"हाँ। मैं तब समझा नहीं था। अब समझ रहा हूँ।" उसका चेहरा बदल गया। "वो आदमी ज़हर बनाता है, भाई। और वो ज़हर को मिठाई की तरह बनाता है। इतना हल्का कि पीने वाले को लगे बस पानी है।"

मेरी जेब में पीली शीशी बैठी थी, ठंडी, जैसे कोई पत्थर। मैंने उसे एक बार छुआ और फिर तेज़ चलने लगा।

अखाड़े का पुराना हिस्सा जिसे सब भूल चुके थे, वहाँ पहुँचने में हमें आधा घंटा लगा। रास्ते में बाज़ार पड़ा, और बाज़ार में लोग मुझे देखकर रुक गए। एक बुढ़िया ने हाथ जोड़े। एक लड़के ने मेरी तरफ़ उँगली दिखाई और कुछ कहा जो सुनाई नहीं दिया। पर कोई भी मेरे रास्ते में नहीं आया। यही सबसे अजीब बात थी — आज पहली बार मैं गाँव के बीच से ऐसे चला जैसे रास्ता मेरा हो।

पुराने हिस्से का दरवाज़ा लोहे का था, जंग खाया, और उस पर ताला लटक रहा था। पर ताला खुला था।

मैंने हाथ से इशारा किया। टिंकू रुक गया।

मैंने आँखें बंद कीं और साँस अंदर खींची।

हवा में कई चीज़ें थीं। गीली मिट्टी, जो पुरानी दीवारों से आती है। जला हुआ तेल, जो लालटेन का था। कुछ सूखा, कड़वा — वही कड़वाहट जो उस पानी में थी, पर बहुत हल्की। और उसके नीचे… गीली हल्दी। मुल्तानी मिट्टी। और एक चीज़ जो मुझे अखाड़े की मिट्टी से मिलती थी, पर नहीं भी — जैसे वही मिट्टी हो, पर किसी और जगह की, बहुत गहरी जगह की।

"क्या?" टिंकू ने फुसफुसाया।

"अंदर कोई है," मैंने कहा। "पर वो अकेला नहीं है। वहाँ दो गंध हैं। एक वैद्य की — हल्दी और मुल्तानी मिट्टी। और दूसरी…" मैंने फिर साँस ली, और इस बार मेरी नाक में एक झुनझुनी दौड़ गई, अंदर तक। "दूसरी मेरी माँ की है।"

टिंकू का मुँह खुला रह गया। "माँ यहाँ? पर वो तो—"

"वो गंध माँ की है, पर पुरानी है। बीस साल पुरानी। दीवारों में बैठी हुई।" मैंने आँखें खोलीं। "वैद्य के पास कुछ ऐसा है जो माँ का है। कुछ जो उसने बीस साल पहले रख लिया था।"

हम अंदर गए। रास्ता सीधा एक लंबे कमरे में जाता था जिसकी छत ऊँची थी और जिसमें रोशनी सिर्फ़ एक छोटी खिड़की से आती थी। फ़र्श पर बिछी चटाई पर बहुत सारी शीशियाँ रखी थीं, एक कतार में, रंग के हिसाब से। पीली, लाल, हरी, काली। और उनके पीछे, एक कोने में, एक बूढ़ा आदमी बैठा था।

उसने हमें देखकर अपना सिर नहीं उठाया। उसके हाथ में एक कटोरी थी और वो उसमें कुछ पीस रहा था, धीरे-धीरे, जैसे कोई रोज़ का काम कर रहा हो।

"आ गए," उसने कहा, और उसकी आवाज़ सूखी थी, जैसे पुराने पेड़ की छाल। "मैं सोच रहा था तुम आज नहीं आओगे। पर तुम्हारी माँ ने आज अदालत में जो किया, उसके बाद मुझे पता था तुम आओगे। तुम उसी के बेटे हो।"

"तुमने मेरी माँ का क्या रखा है?" मैंने पूछा।

उसने पीसना रोका और पहली बार सिर उठाया। उसके चेहरे पर झुर्रियाँ इतनी गहरी थीं कि जैसे नक़्शा बना हो। आँखें धुँधली थीं, पर सुक्खी बुआ सही कह रही थी — वो देख रही थीं। बस देखने का ढंग अलग था, जैसे कोई बहुत दूर से देख रहा हो।

"मैंने उसका कुछ नहीं रखा," उसने कहा। "मैंने तो उसके हाथ से एक चीज़ ली थी, बीस साल पहले, और आज तक वो मेरे पास है। पर वो उसकी नहीं, वो तेरे बाप की थी।"

"भवानी की?"

"हाँ।" उसने कटोरी एक तरफ़ रखी और उठा। उसकी कमर झुकी हुई थी और चलने में उसे तकलीफ़ हो रही थी। वो दीवार के पास गया जहाँ एक लकड़ी की अलमारी थी, और उसकी सबसे नीचे की दराज़ खोली। उसमें से उसने एक छोटी पोटली निकाली। कपड़े की, काली, धूल से ढकी।

"ले," उसने कहा और मेरी तरफ़ बढ़ा दी।

मैंने हाथ बढ़ाया, पर टिंकू ने मेरा हाथ रोक दिया। "भाई, सूंघ पहले।"

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