Spirit of a Fighter – Chapter 1154
"तूने इसकी माँ को ज़हर दिया," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी, पर कमरे में सबने सुनी। "तूने इसके भाई को मारा। तू इसे अपनी बेटी कहता है? तेरे खून का कोई मोल नहीं, ठाकुर। तेरे खून का एक ही काम है — किसी को मारना।"
ठाकुर की बाँह थोड़ी ढीली हुई। बस एक पल के लिए।
और उस पल में माँ बोलीं।
"चंदा," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई घर से बाहर किसी बच्चे को बुला रहा हो, खाने के वक़्त पर। "बेटी, उसके हाथ पर दाँत गड़ा दे।"
चंदा ने किया। उसने अपनी गर्दन घुमाई और ठाकुर की बाँह के ऊपर, उसकी कलाई के पास, अपने दाँत गड़ा दिए, और ज़ोर से खींचा।
ठाकुर चीखा। उसका हाथ खुला, चंदा उससे फिसलकर नीचे गिरी और फिर फर्श पर लुढ़ककर मेरी तरफ़ आई। मैंने उसे उठाया। उसके होंठ पर खून था, और उसकी आँखों में पानी, पर वो मेरे कंधे पर सिर रखकर काँप रही थी, और मैंने उसे अपनी बाँह में कस लिया।
और सिपाही ठाकुर पर टूट पड़े।
वो दीवार से टकराया, फिर सिपाहियों के हाथों में घिर गया। उसने अपना हाथ हिलाया, अपनी कलाई खींची, पर चार सिपाही उसे दबोच चुके थे। खिड़की में से आती धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी और उसका चेहरा पसीने से चमक रहा था, और उसकी मूँछों का तेल अब उसके गाल पर फैल गया था।
"हटाओ मुझे!" वो चिल्लाया। "मैं ठाकुर हूँ! महेंद्र सिंह! मेरे पास पूरे इलाक़े की ज़मीन है! तुम सब मेरे पैरों के नीचे पले हो!"
जज साहिबा खड़ी हो गईं।
"ठाकुर महेंद्र सिंह," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ कमरे के हर कोने तक गई, "आपको गिरफ़्तार किया जाता है। हत्या, ज़हर देकर हत्या की साज़िश, जाली काग़ज़ात, और अदालत में भागने की कोशिश — इन सबके आरोप में।"
ठाकुर रुका। उसने अपना सिर घुमाया और उसकी आँखें मेरी माँ पर गईं।
"सरस्वती," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो पुरानी मिठास लौट आई थी, "तूने बीस साल मेरे पीछे सोचा कि तू बहादुर है। पर एक बात सोचना — तेरे बेटे का हर दिन मेरे दिए पैसों से चला। तेरा आटा, तेरा चूल्हा, तेरे बेटे की मिट्टी — सब मेरा। तो सच किसने जीता, हाँ?"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा। और मैंने देखा कि उनकी आँखों में पानी था, पर वो नीचे नहीं गिर रहा था।
"जो आदमी भीख देकर एहसान जताए, वो कभी कुछ नहीं जीतता," उन्होंने कहा। "वो सिर्फ़ किराया देता है। और मैंने वो किराया चुका दिया — बीस साल के अपने पसीने से।"
ठाकुर का चेहरा बदला। कुछ कहता, उससे पहले सिपाही उसे खींचकर दरवाज़े की तरफ़ ले गए। दरवाज़ा खुला और बाहर की गरम हवा अंदर आई, और उस हवा में धूल की गंध थी, और पीछे से किसी के रोने की आवाज़।
मैंने चंदा को माँ की गोद में दिया। चंदा ने माँ के कंधे में अपना चेहरा छिपा लिया और रोने लगी। माँ ने उसका सिर सहलाया, धीरे-धीरे, जैसे बचपन में मेरा सहलाती थीं।
"बेटी," माँ ने कहा, "चुप हो। अब कोई नहीं आएगा।"
जज साहिबा ने अपनी कुर्सी पर बैठकर काग़ज़ों को समेटना शुरू किया। वो एक काग़ज़ उठाती थीं, उसे देखती थीं, फिर दूसरा। उनकी उँगलियाँ तेज़ थीं, पर उनका चेहरा शांत।
"आज के लिए इतना काफ़ी है," उन्होंने कहा। "कल सुबह ग्यारह बजे फिर बैठक होगी। बचू की गवाही दर्ज हो चुकी। शीशी की जाँच होगी। और फिर फ़ैसला।"
वकील ने अपनी फ़ाइल उठाई और बिना कुछ बोले बाहर चला गया। उसका चश्मा उसकी जेब में था, और उसकी गर्दन झुकी हुई थी। दरवाज़े के बाहर जाते हुए उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा, मेरी माँ की तरफ़, और उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा था — शर्म।
कमरा खाली होने लगा। गाँव वाले उठने लगे, धीरे-धीरे, एक-एक करके, जैसे किसी की नींद से जगा हुआ कोई आदमी अपनी आँखें मल रहा हो। सुक्खी बुआ मेरे पास आईं और उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"अरे वीर," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो चुगलखोर नहीं, कुछ और थी, "तेरी माँ… तेरी माँ ने आज वो कर दिया जो पूरा गाँव नहीं कर पाया।"
"हाँ, बुआ," मैंने कहा।
"और सुन," उन्होंने धीरे से जोड़ा, और मेरे कान के पास झुकीं, "मैंने तो सुना है कि ठाकुर के भट्ठे पर उसके आदमी अब भी बैठे हैं। उसके जाने के बाद कोई भाग गया, कोई बैठा है। मुझे बता रही थी चंपा — वो जो जग्गू की बीवी है, वो कह रही थी कि आज सुबह उसके डेरे पर कोई आया था।"
मैंने सुक्खी बुआ की तरफ़ देखा। उनका पान का बीड़ा गिर चुका था और उनके हाथ खाली थे।
"कौन आया था?"
"पता नहीं," उन्होंने कहा। "पर चंपा ने बताया कि वो आदमी एक छोटी सी पोटली लेकर आया था। और उस पोटली से कुछ गिर रहा था — रेत जैसा। या कोई बीज।"
मेरे मन में कुछ हिला। बीज।
"बुआ," मैंने कहा, "चंपा कहाँ है अभी?"
"अपने डेरे पर होगी। भट्ठे के पीछे, उस पुरानी झोपड़ी में।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मेरे पास खड़ी थी, और उसने मेरी आँखों में कुछ पढ़ा।
"तुम जाओ," उसने कहा। "मैं माँ जी और चंदा के साथ रहूँगी।"
"अकेला जाऊँ?"
"टिंकू को साथ ले जाओ," उसने कहा, और फिर उसने अपना हाथ मेरी बाँह पर रखा, बस एक पल के लिए। "और वीर — अगर वहाँ कुछ हो, तो लड़ना नहीं। पहले देखना। तुम्हारी नाक जो है न, उससे पहले सूंघ लेना।"
मैंने सिर हिलाया।
बाहर आँगन में टिंकू बैठा था, एक पत्थर पर, और उसकी गोद में मिठाई की एक खुली डिब्बी थी, और वो उसमें से एक-एक लड्डू उठाकर देख रहा था, जैसे गिन रहा हो। मेरे पास जाते ही उसने अपना सिर उठाया।
"भाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो पुरानी मुस्कान लौट रही थी, पर हल्की, "आज तो तेरी माँ ने कमाल कर दिया। मैंने सोचा था बस, आज मिठाई बेकार जाएगी। पर नहीं — आज तो मिठाई की ज़रूरत है।" उसने एक लड्डू मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ले, पहले तू खा। फिर बताना क्या करना है।"
मैंने लड्डू लिया और एक ही बार में खा लिया। मिठास मेरे मुँह में फैली, और उसके साथ इलायची की गंध आई। मैंने उसे चबाते हुए कहा, "चल। भट्ठे के पीछे चंपा के डेरे पर। कुछ आदमी आया था, पोटली लेकर। मुझे देखना है क्या है।"
टिंकू ने डिब्बी का ढक्कन बंद किया और उसे अपनी काँख में दबाया।
"भाई," उसने कहा, और वो उठा, "एक बात पूछूँ? वो सब जो आज हुआ — तेरे बाप की चिट्ठी, तेरी माँ की गवाही — उसके बाद भी तुझे लगता है कि कुछ बचा है? मतलब, ठाकुर तो जा रहा है।"
"नहीं," मैंने कहा, और मैंने अपने कदम तेज़ किए। "अब भी कुछ बचा है। और वो मुझे डरा रहा है।"
"क्या?"
"ये कि ठाकुर ने अपनी सबसे बड़ी चीज़ — अपनी बेटी — को छोड़कर भागने की कोशिश की। पर उसने वो नहीं किया जो मैं करता। उसने किसी को बचाने की कोशिश नहीं की। उसने किसी को अपने साथ ले जाने की कोशिश नहीं की। उसने सिर्फ़ अपनी जान बचाने की सोची।" मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। "जिस आदमी के पास कुछ नहीं बचा, वो सबसे ख़तरनाक होता है। और उसके पास अब भी एक चीज़ बची है।"
"क्या?"
"भैरव," मैंने कहा। "वो जेल से भागा था। वो अभी भी बाहर है। और ठाकुर जानता है कि भैरव कहाँ है।"
हम भट्ठे की तरफ़ चलने लगे। रास्ते में धूल उड़ रही थी, और मेरी चप्पलों के नीचे गरम मिट्टी थी। पीछे से टिंकू ने कहा, "भाई, एक बात और।"
"क्या?"
"वो पोटली में जो था — रेत या बीज, मुझे पता है क्या है।"
मैं रुक गया। "क्या?"
"चंपा के डेरे पर जो आदमी आया था, वो मुझे पता है कौन हो सकता है। सुक्खी बुआ ने मुझे भी बताया था। वो आदमी मिठाई वाला नहीं था, भाई। वो बीज वाला था। और हमारे इलाक़े में एक ही आदमी बीज बेचता है — पुराना वैद्य, जो अब भी उसी भट्ठे के पीछे बैठता है, जहाँ से मेरा दुकान का हिसाब आता है।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno