Spirit of a Fighter – Chapter 1153
और फिर उन्होंने पूरी अदालत की तरफ़ देखकर, बिना ज़ोर लगाए, बिना रोए, कहा, "बीस साल मैंने उस आदमी का दिया आटा खाया। मेरे बेटे ने वो पानी पिया जो उसने भेजा। मुझे पता था — जो पानी उसने मेरे दरवाज़े पर भेजा, वो पानी नहीं, रस्सी है। वो हमें बाँधने के लिए था। पर मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था। मेरा बच्चा भूखा था। और उस रोज़ जब मैंने ये काग़ज़ लिया, मैंने ऊपर वाले से एक दुआ माँगी थी — प्रभु, मुझे इतनी उम्र देना कि मैं अपने बेटे को इस काग़ज़ के लायक बनता देख सकूँ। और आज मैंने उसे देख लिया। अब आप जो कहेंगी, मैं मानूँगी।"
जज साहिबा ने एक गहरी साँस ली। उन्होंने अपना चश्मा फिर पहना, और उसे पहनते हुए उनकी उँगलियाँ थोड़ी देर लगीं, जैसे कुछ सोच रही हों।
"काग़ज़ मेज़ पर रखिए," उन्होंने कहा। "धीरे से।"
माँ ने काग़ज़ आगे बढ़ाया। जज साहिबा ने उसे खोला। और फिर वो जो पढ़ रही थीं, वो पढ़ते हुए उनका चेहरा बदलता गया।
"ये बीस साल पुरानी लिखाई है," उन्होंने कहा, और उनके मुँह से धीरे से हवा निकली। "काग़ज़ पीला है, स्याही फीकी है, पर पढ़ी जा सकती है। भवानी सिंह की लिखाई है। और इसमें लिखा है —" उन्होंने रुककर एक बार हम सब की तरफ़ देखा, फिर पढ़ा, "मेरे भाई ने मुझे ज़हर दिया। मेरी हड्डियाँ कुएँ की सीढ़ियों के नीचे हैं। जो मेरा बेटा मिले, उसे बताना — माफ़ी माँगने से मरा हुआ ज़िंदा नहीं होता।"
कमरे में हवा नहीं थी। मुझे ऐसा लगा जैसे छत मेरे सिर पर झुक आई हो।
वकील एक कदम आगे आया, फिर रुक गया। उसका चेहरा पसीने से चमक रहा था और उसके होंठ बार-बार खुल-बंद हो रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी। वो अपना रूमाल निकालकर माथा पोंछने लगा, और उसका रूमाल भी हाथ से छूटकर गिर गया। उसने उसे उठाया नहीं।
"जज साहिबा," वो फिर बोला, और उसकी आवाज़ में वो चिल्लाहट नहीं थी, बस एक फटी हुई बात थी, "ये काग़ज़ अदालत में पेश होने की तारीख़… इसे बीस साल देर से आना चाहिए था या बिलकुल भी नहीं आना चाहिए था। इसकी सत्यता जाँची जानी चाहिए। कोई भी काग़ज़ —"
"वकील साहब।"
जज साहिबा की आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने चाकू मेज़ पर रख दिया हो।
"आप अपने मुवक्किल के बचाव के लिए जो काग़ज़ पेश करते हैं, उसकी जाँच की बात आप कभी नहीं करते। आज आप पहली बार कर रहे हैं। मैं समझ गई आप क्यों कर रहे हैं। आप बैठिए।"
वकील बैठ गया। उसकी कुर्सी की टाँगें चरमराईं। और उसके बैठते ही मेरी नज़र ठाकुर पर गई।
वो अब तक अपनी जगह पर बैठा था, सिपाहियों के बीच, हाथ जोड़े हुए, बिलकुल शांत। पर उसका शांत होना मुझे पहले से ज़्यादा डरावना लगा। उसके बड़ी-बड़ी तेल लगी मूँछों का एक सिरा अब भी सीधा था। उसकी आँखें माँ की तरफ़ थीं, और उनमें कुछ नहीं था — न गुस्सा, न डर, बस एक ऐसी खालीपन जो कुएँ के पानी में होता है।
मैंने महसूस किया कि मेरी मुट्ठी में कुछ है। मैंने देखा — मेरी उँगलियों में माँ की पीली शीशी थी, जो मैंने खुद उनसे ली थी जब अदालत में आए थे। मैंने उसे जेब में रखा, और मेरी हथेली में उसका ठंडा निशान रह गया।
"बच्चू को बुलाइए," जज साहिबा ने कहा।
सिपाही दरवाज़े की तरफ़ गया। दरवाज़ा खुला, बाहर की धूप अंदर आई, और उस धूप में एक आदमी खड़ा था। दुबला-पतला, फटी कमीज़, हाथ में पुरानी पगड़ी। वो अंदर आया, और चलते हुए उसके पैरों की आवाज़ चप्पल में से आ रही थी।
"नाम?" जज ने पूछा।
"बच्चू, जज साहिबा। ठाकुर के यहाँ मज़दूर था। चालीस साल।"
"तुमने क्या देखा?"
बच्चू ने एक बार ठाकुर की तरफ़ देखा। ठाकुर ने भी उसकी तरफ़ देखा। मैंने देखा, ठाकुर की उँगली अपनी जाँघ पर धीरे से एक बार थपथपाई, और बच्चू ने अपनी गर्दन झुका ली।
"कुछ नहीं," बच्चू ने कहा। "मैंने कुछ नहीं देखा।"
मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई। माँ के हाथ मेरी कुर्सी की पीठ पर रखे थे, और मैंने उन्हें महसूस किया कि उनके हाथ काँपने लगे।
"तुमने शीशी नहीं दी थी?" जज ने पूछा। "तुमने ये गवाही नहीं दी थी?"
बच्चू ने अपनी पगड़ी पकड़ी और उसे उतारकर हाथ में ले लिया। उसके सिर पर पसीना था।
"जज साहिबा," वो बोला, और उसकी आवाज़ फट गई, "मेरे चार बच्चे हैं। दो लड़के, दो लड़कियाँ। सबसे छोटी पाँच साल की। वो अभी भी ठाकुर के भट्ठे पर रहती है। उसका खाना… मेरी बीवी का… वो सब…" उसने गला साफ़ किया। "मुझे माफ़ कर दीजिए।"
"जज साहिबा," मैं उठ गया, "मैं उन बच्चों की हिफ़ाज़त की कसम खाता हूँ। आज से, आज से ही। मेरे पास जो भी है —"
"बैठ जाइए, वीर सिंह," जज ने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार थोड़ी नरमी थी। "मैं समझती हूँ।" वो बच्चू की तरफ़ मुड़ीं। "बच्चू, मैं तुमसे एक बात कहूँगी। तुम्हारी गवाही के बिना भी आज ये अदालत अपना फ़ैसला सुनाएगी। पर तुम्हारे चार बच्चों के सामने एक दिन ऐसा आएगा जब उन्हें पता चलेगा कि उनका बाप उस आदमी के सामने चुप रहा जिसने उनके गाँव को बीस साल ज़हर दिया। तुम अपने बेटों के सामने क्या मुँह दिखाओगे?"
बच्चू की पगड़ी उसके हाथ से छूटकर गिर गई। और फिर उसने अपना हाथ उठाया, और उसकी उँगली ठाकुर की तरफ़ गई।
"मैंने शीशी दी थी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी। "ठाकुर के कमरे से। उसी अलमारी से। ऊपर वाले खाने में, एक पुरानी धोती के नीचे। दो शीशियाँ थीं। एक मैंने वीर को दी, एक मैंने अपने पास छिपाई थी।" उसने अपनी कमीज़ की जेब से कुछ निकाला। एक छोटी सी शीशी, जिसका ढक्कन मैला था। वो उसे मेज़ की तरफ़ बढ़ाने लगा, पर उसके हाथ इतने काँप रहे थे कि शीशी उसकी उँगलियों से फिसल गई और ज़मीन पर गिरकर लुढ़क गई।
मीरा उठी, झुकी, और शीशी उठाकर जज की मेज़ पर रख दी।
"शुक्रिया," जज ने कहा। "अब सिपाही, ठाकुर महेंद्र सिंह —"
वो ठाकुर की तरफ़ मुड़ीं।
"आपके खिलाफ़ गिरफ़्तारी का आदेश —"
और तभी ठाकुर उठा।
मैंने उसे उठते नहीं देखा, मैंने बस महसूस किया — कुर्सी की आवाज़, सिपाहियों की चीख, और हवा का एक झोंका जो मेरे चेहरे पर लगा। वो उठकर सीधा दीवार की तरफ़ भागा, जहाँ अदालत के कमरे की खिड़की थी, ऊँची, चौड़ी, बाहर आँगन की धूप दिख रही थी।
पर वो रास्ते में एक कुर्सी के पीछे से गुज़रा, और उस कुर्सी पर चंदा बैठी थी।
मैंने चंदा को पहले नहीं देखा था। वो पीछे की बेंच पर अकेली बैठी थी, सफ़ेद कुर्ते में, हाथ गोद में रखे, और उसकी आँखें सूजी हुई थीं। और जब ठाकुर भागा, तो उसने बिना रुके अपना हाथ बढ़ाया — और चंदा को बालों से खींच लिया।
चंदा चीखी। उसकी कुर्सी पीछे गिरी और उसका सिर मेज़ के कोने से टकराया। ठाकुर ने उसे अपनी छाती से चिपकाया, और उसकी बाँह चंदा के गले पर थी, और उसकी आँखें पूरे कमरे पर घूम रही थीं।
"एक कदम भी आगे बढ़ा," ठाकुर ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास नहीं थी, कुछ और था, कुछ जो बहुत पुराना और बहुत थका हुआ था, "तो ये लड़की मेरे साथ जाएगी।"
मैंने अपनी कुर्सी के पीछे से माँ का हाथ खींचकर छुड़ाया और एक कदम आगे रखा। मेरी चप्पल ज़मीन पर चरमराई, और मेरी साँस रुक गई थी।
"छोड़ उसे," मैंने कहा।
"क्यों छोड़ूँ?" उसने कहा, और उसके होंठ मुड़े। "ये मेरी बेटी है। मेरा खून। मैं इसे जहाँ चाहूँ ले जाऊँ।"
चंदा की आँखें मेरी तरफ़ उठीं। उसके गले पर ठाकुर की बाँह थी, उसकी साँस रुकी हुई थी, पर उसने मुझे देखकर अपनी आँखों में कुछ भेजा — जो मैं समझ गया। वो डर नहीं था। वो कह रही थी, मत रुक।
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