Spirit of a Fighter1147 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1147

7 min read November 5, 2026

टिंकू मेरे बगल में आ खड़ा हुआ। उसकी नाक फड़की।

"वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ बदल गई। "ये गंध… तेल की है। और राख की।"

मेरे पैर अपने आप आगे बढ़े। दीवार के पीछे एक टूटी-फूटी जगह थी — पुरानी इमारत, जिसका आधा हिस्सा जल चुका था। और वहीं, उस जली इमारत के दरवाज़े पर, सलेटी कपड़े में लिपटी एक छोटी-सी शक्ल पड़ी थी।

मेरे भीतर कुछ ठंडा हो गया।

गुड़िया।

वो मेरी आँखों के सामने थी — बेहोश, ज़मीन पर, और उसके हाथ में स्कूल की कॉपी दबी थी। मैं दौड़ा। मैंने उसे गोद में उठाया। उसका शरीर ठंडा था, पर साँस चल रही थी। नाक से काली राख फँसी थी।

"गुड़िया," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई। "गुड़िया, आँख खोल।"

मीरा मेरे पास बैठ गई। उसने गुड़िया का चेहरा साफ़ किया, और उसकी उँगलियाँ कॉपी पर रुकीं। उसने कॉपी खोली। पन्नों पर बच्चों के अक्षर थे, और आख़िरी पन्ने पर कुछ लिखा था, बड़े-बड़े — जल्दी में लिखा हुआ, टेढ़ा।

मीरा ने पढ़ा। उसका चेहरा उतर गया।

"वीर…"

"क्या है?"

"ये मेरी लिखाई है," उसने फुसफुसाया। "नहीं… ये मेरी लिखाई जैसी है। गुड़िया ने मेरी तरह लिखा है।"

मैंने कॉपी उसके हाथ से ली।

उस पन्ने पर एक ही लाइन थी, और वो लाइन मेरे दिल को चीर गई।

"चंदा दीदी को उसी जगह ले चलो जहाँ से कोई नहीं लौटता।"

मैंने पन्ना पलटा। अगले पन्ने पर, और छोटे अक्षरों में, गुड़िया ने लिखा था — "कुआँ।"

तभी गुड़िया ने आँख खोली।

उसकी आँखें लाल थीं। वो मेरी तरफ़ देखकर फूट-फूटकर रोने लगी, पर आवाज़ नहीं निकली। सिर्फ़ उसका शरीर काँप रहा था। उसने मेरी कमीज़ पकड़ ली।

"भैया," उसकी आवाज़ फुसफुसाहट थी, फटी हुई। "मैं सो रही थी… कोई मेरे मुँह पर कपड़ा रखकर उठा ले गया।"

"कौन?" मैंने पूछा।

"ठाकुर का आदमी," उसने कहा, और उसकी आँखों में वो डर था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा। "वो चंदा दीदी को खींचकर ले जा रहा था। दीदी रो रही थी। मैंने उसे पुकारा, तो उसने मेरा मुँह दबा दिया।"

उसने मेरी कमीज़ और कसकर पकड़ ली।

"भैया, ठाकुर ने उस आदमी से कहा था — 'उसे उसी जगह ले चलो जहाँ से कोई नहीं लौटता।' और उस आदमी ने कहा — 'कुआँ?' तो ठाकुर हँसा। बोला — 'हाँ, वही कुआँ। जहाँ से तेरी माँ भी नहीं लौटी थी।'"

मेरे हाथ से कॉपी गिर गई।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।

मैंने गुड़िया को मीरा की गोद में दिया। मेरे हाथ काँप रहे थे।

"टिंकू," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ सुनकर मुझे खुद अजीब लगी। "वो कुआँ कहाँ है?"

टिंकू ने अपना जला हाथ सीने से लगाया। उसका चेहरा पहले से भी ज़्यादा सफ़ेद हो गया।

"अखाड़े के नीचे," उसने धीरे से कहा। "वही कुआँ जिसके बारे में कहते हैं कि उसका पानी कभी नहीं सूखता। पर कोई उसके पास जाता नहीं।" उसने रुककर मेरी आँखों में देखा। "क्योंकि जो जाता है, वो लौटकर नहीं आता।"

॥

"कुआँ।"

टिंकू का ये एक शब्द हवा में लटका रह गया। मैंने गुड़िया के चेहरे को अपने हाथों में लिया। उसके गाल ठंडे थे, पर आँखों में अब भी वो डर बैठा था जो रोने से कम नहीं होता।

"गुड़िया, देख मेरी तरफ़," मैंने धीरे से कहा। "तूने और क्या सुना? ज़रा सोच। उन आदमियों ने और कुछ कहा था?"

गुड़िया ने होंठ कसे। उसकी आँखें ऊपर गईं, जैसे वो उन बातों को वापस बुला रही हो जो उसने डर के मारे दबा दी थीं।

"एक आदमी बोल रहा था — मोटी आवाज़ वाला। वो कह रहा था कि 'बूढ़े की हड्डियाँ जहाँ गई हैं, वही जगह है।'" उसने मेरी कमीज़ और कस ली। "और दूसरा हँसा। बोला — 'हड्डियाँ तो बहुत नीचे हैं। उतनी नीचे कि कोई उन्हें ढूँढने भी नहीं जाता।'"

मेरी गर्दन के पीछे ठंडी हवा फिर गई।

"बूढ़े की हड्डियाँ," मीरा ने धीरे से दोहराया। वो गुड़िया के बाल सहला रही थी, पर उसकी आँखें मुझ पर टिकी थीं। "वीर… बूढ़े की हड्डियाँ मतलब भवानी की हड्डियाँ। और वो जगह…"

"तहखाने के नीचे," मैंने कहा।

तभी पीछे से कदमों की आवाज़ आई — तेज़, बेकाबू, जैसे कोई भागता हुआ आ रहा हो। मैंने पलटकर देखा तो कालू काका थे। उनकी लालटेन हाथ में थी, पर आग बुझी हुई थी। उनका चेहरा पसीने से भीगा था और साँस ऐसे फूल रही थी जैसे वो दौड़कर आए हों।

वो मेरे सामने रुके, झुके, घुटनों पर हाथ रखकर साँस लेने लगे।

"काका, आप…" मैंने शुरू किया।

"मैंने सुना," उन्होंने हाँफते हुए कहा। "मैं धुएँ की गंध लेकर यहाँ तक आया और मैंने सब सुन लिया।" उन्होंने सीधा होकर मेरी आँखों में देखा। "वो जगह… वो कोई आम जगह नहीं है, बेटा।"

"कौन-सी जगह, काका?"

कालू काका ने गुड़िया और मीरा की तरफ़ देखा, फिर टिंकू की तरफ़। जैसे वो शब्द तौल रहे हों कि कितना बोलें। फिर उन्होंने अपनी सूखी ज़ुबान से होंठ भिगोए।

"तहखाने के नीचे एक और सुरंग है," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी। "सीढ़ियाँ नीचे जाती हैं, और फिर एक जगह ऐसी आती है जहाँ मिट्टी काली हो जाती है। वहाँ हवा भारी है, बेटा। वहाँ बीस साल पहले भैरव ने कुछ छिपाया था — कुछ ऐसा जो आज तक किसी ने नहीं देखा।"

"आपने देखा?" मैंने पूछा।

कालू काका ने आँखें नीची कर लीं। उनकी उँगलियाँ लालटेन के हैंडल पर कस गईं।

"मैंने देखा," उन्होंने फुसफुसाया। "पर देखकर भी नहीं देखा। जिस रात भैरव वहाँ से निकला था, उसकी धोती पर मिट्टी थी — काली, गीली मिट्टी। और उसके हाथों से एक गंध आ रही थी।" उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा। "वो गंध तेरे पिता की मौत वाली रात भी आई थी।"

मेरे भीतर कुछ जम गया।

"तो चलिए," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ खुद मुझे सख़्त लगी। "वहीं से चंदा को निकालेंगे।"

मैंने गुड़िया को टिंकू की तरफ़ बढ़ाया, पर गुड़िया ने मेरी कलाई नहीं छोड़ी।

"मैं भी चलूँगी," उसने कहा, हालाँकि उसकी आवाज़ अब भी काँप रही थी।

"नहीं।"

"भैया—"

"गुड़िया।" मैंने घुटने के बल बैठकर उसका चेहरा अपने हाथों में लिया। उसकी आँखों में पानी भरा था। "तूने आज जो किया, वो कोई बड़ा आदमी भी नहीं कर सकता। तूने वो लिखा — 'कुआँ'। अगर तूने वो न लिखा होता, तो मुझे आज भी नहीं पता होता कि चंदा कहाँ है। तूने अपना काम कर दिया। अब मेरा काम है।"

"पर तुम अकेले—"

"मैं अकेले नहीं जा रहा।" मैंने पीछे देखा। मीरा मेरी तरफ़ देख रही थी। टिंकू अपना जला हाथ सीने से लगाए खड़ा था। कालू काका लालटेन भर रहे थे। "देख, कितने लोग हैं।"

गुड़िया ने होंठ काटे। फिर उसने मेरे कान के पास मुँह लाकर फुसफुसाया — "भैया, वो आदमी जो मुझे उठाकर लाया था… उसके हाथ में एक चीज़ थी। चाँदी की। वो बज रही थी।"

"अंगूठी?"

"नहीं।" उसने सिर हिलाया। "घंटी। छोटी घंटी।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसकी आँखें बड़ी हो गईं।

"पीली घंटी वाला वकील," उसने धीरे से कहा। "दयानाथ।"

"नहीं," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ अचानक कड़ी हो गई। "दयानाथ के हाथ में घंटी नहीं, कलम रहती है। ये कोई और है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "बीस साल पहले भी एक आदमी था जो चाँदी की घंटी बजाकर चलता था। मैंने उसे भैरव के साथ उस रात देखा था। मैंने सोचा वो मर गया।"

"तो वो ज़िंदा है," मैंने कहा। "और आज भी भैरव के साथ है।"

कालू काका ने कुछ नहीं कहा। उनकी दाढ़ी काँप रही थी।

तभी मेरे पीछे एक आवाज़ आई — धीमी, पर ऐसी जो हड्डियों तक उतर जाए।

"आज तू जाएगा तो मैं भी साथ चलूँगी।"

मैं पलटा।

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