Spirit of a Fighter1146 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1146

6 min read November 5, 2026

"नहीं पता," मैंने कहा।

"इसकी कॉपी पर कुछ लिखा है," उसने कहा। "पढ़ नहीं पा रहा। जल गया है।"

उसने कॉपी मेरी तरफ़ बढ़ाई। मैंने उसे खोला। कवर पर नीला रंग बचा था और उस पर लिखा था — "अंजली"।

"अंजली," मैंने कहा।

माँ ने सिर उठाया। "क्या?"

"इसका नाम अंजली है।"

माँ ने लड़की को देखा और उनका चेहरा फिर से बदला।

"अंजली?" उन्होंने धीरे से कहा। "ये नाम…"

"क्या हुआ?"

वो कुछ नहीं बोलीं। उन्होंने लड़की की कॉपी मेरी तरफ़ बढ़ाई। उसे पलटा। पीछे के पन्ने पर, जहाँ जलन कम थी, कुछ लिखा था। मैंने पढ़ा।

"मेरे पापा अखाड़े में काम करते हैं।"

मैं सन्न रह गया।

"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी। "ये लड़की अखाड़े के किसी आदमी की बेटी है।"

"मुझे पता है," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ अजीब थी। "मुझे पता है किसकी।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"किसकी?"

माँ ने लड़की का चेहरा फिर देखा। उनका हाथ उसके सिर पर था और वो धीरे-धीरे उसके जले बालों को छू रही थीं।

"हरनाम की," उन्होंने कहा।

मेरे हाथ रुक गए।

"हरनाम? वो हरनाम जो अभी…"

"हाँ," माँ ने कहा। "वो हरनाम। जिसे तूने अभी छोड़ा। जिसने चंदा को पकड़ा था।"

मैं खड़ा हो गया।

"तो फिर ये लड़की…" मैंने कहा।

"वो इसे यहाँ छोड़ गया," माँ ने कहा। "या कोई छोड़ गया। पर जान-बूझकर छोड़ा है। ये कोई इत्तेफ़ाक नहीं है, वीर।"

मैंने अपनी मुट्ठी कसी।

"तो हरनाम ने अपनी ही बेटी को…"

"हरनाम वो आदमी है जो अपनी बेटी को भी दाँव पर लगा सकता है," माँ ने कहा। "अगर उसे लगे कि उसकी जान बचेगी।"

तभी लड़की हिली।

उसकी उँगलियाँ हिलीं। उसकी आँखें खुलीं। इस बार ज़्यादा साफ़। वो माँ को देख रही थी। फिर मुझे।

"तुम…" उसकी आवाज़ फटी थी। "तुम वो हो जो आग में आया था।"

मैं उसके पास घुटनों पर बैठ गया।

"हाँ," मैंने कहा। "मैं वही हूँ। तू ठीक है। अब डर मत।"

"मेरे पापा," उसने फुसफुसाया। "मेरे पापा ने मुझे यहाँ छोड़ दिया।"

मेरी छाती में कुछ टूटा।

"उसने कहा था कि अगर मैं चुप रहूँगी तो वो मुझे ले जाएगा," उसने कहा, और उसकी आँखों से पानी बहने लगा। "पर उसने मुझे छोड़ दिया। उसने कहा — 'बेटा, यहाँ रह, मैं आता हूँ'। और वो चला गया।"

मैंने उसका हाथ पकड़ा।

"वो वापस आएगा," मैंने कहा। "मैं उसे लेकर आऊँगा।"

"नहीं," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में एक डर था जो मेरी हड्डियों में उतर गया। "वो नहीं आएगा। वो उस आदमी से डरता है। मैंने देखा है। उस आदमी की आवाज़ सुनकर मेरे पापा के हाथ काँपते हैं।"

"कौन-सा आदमी?"

"मोटी आवाज़ वाला," उसने कहा। "जिसके हाथ में पीली चीज़ रहती है। जो बोलता है तो ऐसा लगता है जैसे कोई गुड़ खा रहा हो।"

मैंने पीछे देखा। मीरा मेरी तरफ़ देख रही थी। उसका चेहरा सफ़ेद था।

"भैरव," उसने धीरे से कहा।

मैंने सिर हिलाया।

"अंजली," मैंने कहा, और मैंने उसकी तरफ़ देखा। "जब वो आदमी तुम्हें यहाँ ले आया, तब उसने क्या कहा?"

उसने आँखें बंद कीं। जैसे याद कर रही हो।

"उसने मुझे यहाँ पटका," उसने कहा। "और फिर वो मेरे पापा से बोला — 'ये तेरी बेटी है। अगर तू गवाही देगा, तो अगली बार ये नहीं जलेगी, तेरी बीवी जलेगी।'"

मेरी साँस रुक गई।

"और फिर उसने कहा…" उसकी आवाज़ और धीमी हो गई। "उसने कहा — 'अब उसे उसी जगह ले चलो जहाँ से कोई नहीं लौटता'।"

"किसे?" मैंने पूछा। "किसे ले चलो?"

"उस लड़की को," उसने कहा। "जो मेरे पापा के साथ थी। वो बहुत रो रही थी।"

मेरी छाती में आग भर गई। चंदा। वो चंदा की बात कर रही थी।

"अंजली," मीरा ने कहा, और वो मेरे पास आकर बैठ गई। "तूने वो जगह देखी? जहाँ वो उसे ले जा रहे थे?"

"नहीं," उसने कहा। "पर मैंने सुना। उस आदमी ने कहा — 'श्मशान के पीछे वाला रास्ता'।"

मैं खड़ा हो गया।

श्मशान। वो ही जगह जो माँ के काग़ज़ पर लिखी थी। वो ही जगह जहाँ मैं जाने वाला था।

"वीर," मीरा ने कहा, और वो भी खड़ी हो गई। "मैं साथ चलूँगी।"

"नहीं।"

"मैं साथ चलूँगी," उसने दोहराया, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मैं अब पहचानता था। "तू अकेला नहीं जाएगा।"

"मीरा, ये खतरनाक है।"

"और तेरी नाक से खून बह रहा है," उसने कहा। "और तेरा पैर जला है। और तू अकेले जाकर क्या करेगा? गिर जाएगा और वहीं मर जाएगा?"

मैं चुप हो गया।

"मैं तेरे साथ हूँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब नरम थी। "तू अकेले नहीं है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके बाल बिखरे थे। उसके कपड़ों पर राख थी। उसकी आँखों में थकान थी। पर वो खड़ी थी। मेरे लिए।

"ठीक है," मैंने कहा। "पर तू मेरे पीछे रहेगी।"

"पर…"

"मीरा।"

वो चुप हो गई।

तभी टिंकू ने कहा, "मैं भी चलूँगा।"

मैंने उसकी बाँह देखी।

"टिंकू, तेरा हाथ…"

"मिठाई वाले के हाथ जलेंगे तो क्या होगा?" उसने कहा, और मुस्कुराया। पर उसकी आँखों में पानी था। "मिठाई तो ज़ुबान से बनती है।"

मैं उसकी तरफ़ देखता रह गया।

"तू पागल है," मैंने कहा।

"हाँ। तेरा दोस्त हूँ।"

मैंने उसका कंधा पकड़ा। मेरे हाथ काँप रहे थे।

"तूने आज मेरी जान बचाई," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ भारी थी। "मैं ये भूलूँगा नहीं।"

"मैं जानता हूँ," उसने कहा। "अब चल। मेरी मिठाई वाले पहलवान को कोई और न ले जाए।"

माँ ने तब कहा, "रुको।"

हम रुके।

माँ ने गुड़िया की तरफ़ देखा।

"तू यहीं रहेगी।"

"माँ, पर…"

"यहीं रहेगी," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ टूटी। "आज तुझे मैं वहाँ नहीं भेजूँगी। एक बार तुझे खोने का डर झेल लिया। दोबारा नहीं।"

गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया।

"माँ की बात मान," मैंने कहा। "तू यहीं रह। अंजली के पास।"

गुड़िया ने नीचे देखा। फिर सिर हिलाया।

फिर वो मेरे पास आई और मेरी कमर से लिपट गई।

"भैया," उसने फुसफुसाया। "तुम लौटकर आना। वरना मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूँगी।"

मैंने उसका सिर चूमा।

"आऊँगा," मैंने कहा। "वादा।"

मैंने उसे छोड़ा और मीरा की तरफ़ देखा।

"चल," मैंने कहा।

हम चले।

श्मशान का रास्ता अखाड़े के पीछे से जाता था — वो रास्ता जिस पर मैंने कभी कदम नहीं रखा था। जिस पर गाँव के लोग बोलते थे कि रात को कोई नहीं जाता।

पर अब रात नहीं थी। सुबह की पहली लाली आसमान में फैल रही थी। पर यहाँ अंधेरा अभी भी गहरा था।

रास्ते में मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"क्या?"

"कुछ नहीं," उसने कहा। "बस… तेरी नाड़ी तेज़ चल रही है।"

मैंने उसका हाथ नहीं छोड़ा।

"नाड़ी का काम नहीं है ये," मैंने धीरे से कहा। "डर है। मुझे भी है।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ काँपे, फिर सख़्त हो गए।

"मुझे डर नहीं है," उसने कहा।

"मीरा।"

"मुझे डर नहीं है," उसने दोहराया, पर इस बार उसकी आवाज़ में वो ज़िद नहीं थी। "मुझे सिर्फ़ ये डर है कि कहीं देर न हो जाए।"

पीछे टिंकू की साँसें सुनाई दे रही थीं — भारी, घसीटती हुई। मैंने पलटकर देखा। उसका जला हाथ उसने अपनी कमीज़ में लपेट रखा था, और कमीज़ पर गीली मिट्टी पोत दी थी। मैंने कुछ नहीं कहा। कहता तो वो फिर वही जुमला दोहराता — मिठाई तो ज़ुबान से बनती है।

श्मशान का रास्ता अचानक मुड़ा। सामने पुरानी चौखट जैसी दीवार खड़ी थी, और उसके पीछे से धुएँ की एक पतली लकीर आसमान की तरफ़ उठ रही थी।

मैं रुक गया।

"ये धुआँ…" मीरा ने शुरू किया।

"कोई चूल्हा नहीं जल रहा," मैंने कहा। "यहाँ कोई घर नहीं।"

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