Spirit of a Fighter – Chapter 1145
"माँ, बाद में। पहले इसे…"
"इसे मेरे पास दे।"
उन्होंने लड़की मेरी गोद से ली। उनके हाथ नहीं काँप रहे थे। वो उसे ज़मीन पर लेटाकर बैठ गईं और उसके सीने पर हाथ रखा। साँस देखी। फिर उसके मुँह की तरफ़ झुककर अपने मुँह से हवा दी।
मैंने पहली बार देखा कि माँ को ये आता है।
"तूने ये कहाँ सीखा?" मैंने पूछा।
"तेरे पापा ने सिखाया था," उन्होंने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे। "उन दिनों अखाड़े में लड़के गिरते थे। साँस रुक जाती थी। उन्होंने मुझे सिखाया था।"
उन्होंने फिर हवा दी।
लड़की का शरीर हिला। उसका मुँह खुला और उसने खाँसा। काला धुआँ उसके मुँह से निकला।
माँ की आँखों से पानी गिरा। उन्होंने पलक नहीं झपकी। बस उसका सिर अपनी गोद में रखा और उसके माथे पर हाथ फेरा।
"बेटा," उन्होंने धीरे से कहा। "बेटा, देख, खुल गई आँखें। तू ठीक है।"
मैंने उस लड़की की आँखें देखीं। वो खुल रही थीं, धीरे-धीरे, जैसे कोई भारी दरवाज़ा।
उसने माँ को देखा। फिर मुझे। फिर उसके होंठ हिले।
"पानी," उसने फुसफुसाया।
टिंकू पहले से ही अपनी कमर से लोटा खोल रहा था। वो हमेशा लोटा रखता था। मैंने कभी नहीं पूछा क्यों।
उसने लड़की को पानी पिलाया। वो धीरे-धीरे पीने लगी, और उसकी आँखें फिर बंद हो गईं।
मैं खड़ा हुआ और मैंने पीछे देखा।
आग बुझ रही थी। लपटें छोटी हो रही थीं। और धुआँ अब पतला हो रहा था।
पर चंदा कहीं नहीं थी।
मैं वहाँ से हटा था — कब हटा, मुझे खुद याद नहीं। मैंने चंदा का हाथ पकड़ा था, उसे अपनी तरफ़ खींचा था, वो मेरे सीने से चिपकी थी। फिर गुड़िया की आवाज़ आई। फिर मैं आग में घुस गया।
और चंदा?
"चंदा कहाँ है?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ में वो ज़ोर था जो मैं खुद नहीं चाहता था।
सब चुप हो गए।
मीरा ने चारों तरफ़ देखा। टिंकू ने। माँ ने। कोई कुछ नहीं बोला।
"मैंने उसका हाथ पकड़ा था," मैंने कहा। "वो यहीं खड़ी थी। मेरे पास।"
"वीर, मैंने उसे देखा था," मीरा ने धीरे से कहा। "जब तू आग में घुसा। वो… वो तेरे पीछे देख रही थी।"
"तो फिर?"
"फिर मैंने गुड़िया को पकड़ा और… और मैंने पलटकर देखा तो वो नहीं थी।"
मेरी छाती में कुछ जम गया।
"तुम लोगों ने उसे अकेला छोड़ दिया?"
"वीर, मैंने…" मीरा का चेहरा बदला। "मैंने सोचा वो तेरे पीछे थी।"
"मैंने सोचा वो यहीं थी," टिंकू ने कहा।
हर किसी ने सोचा। किसी ने देखा नहीं।
मैंने अपने बाल पकड़े और ज़ोर से खींचे।
"वो हरनाम के साथ थी," मैंने कहा। "हरनाम ने उसे पकड़ा था। मैंने हरनाम को छोड़ा और चंदा को खींच लिया। फिर…"
फिर गुड़िया की आवाज़ आई। "भैया।"
मैंने गुड़िया की तरफ़ देखा।
वो माँ के पास खड़ी थी। उसके हाथ में वो थैली थी — वही थैली जो उसने मुझे दी थी। पर वो काँप रही थी।
"गुड़िया," मैंने कहा, और मैं उसके पास गया। "तूने क्या देखा? जब मैं आग में गया?"
उसने नीचे देखा।
"गुड़िया।"
"ठाकुर," उसने फुसफुसाया। "ठाकुर वहाँ था। आग के पीछे। मैंने उसे देखा। उसने मुझे देखा। और वो… वो हँसा।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
"वो हँसा और उसने… उसने चंदा दीदी को खींच लिया। दीदी चिल्लाईं। पर आग की आवाज़ बहुत तेज़ थी। और फिर धुआँ आ गया और मैं कुछ नहीं देख पाई।"
"तूने पहले क्यों नहीं बताया?" मेरी आवाज़ में गुस्सा आ गया। मैं खुद पर गुस्सा था, पर वो गुड़िया पर निकला।
गुड़िया का चेहरा सिकुड़ गया। उसकी आँखें भर आईं।
"मैं डर गई थी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई। "मैंने सोचा कि अगर मैं बोलूँगी तो तुम फिर आग में जाओगे और तुम…"
मैं चुप हो गया।
मैं उसके सामने घुटनों पर बैठ गया।
"गुड़िया," मैंने कहा, और मैंने उसका हाथ पकड़ा। "सुन। मुझे कभी भी चुप मत रहने देना। कभी नहीं। अगर कुछ है तो बोल देना। मैं तुझ पर नहीं चिल्लाऊँगा। मैं वादा करता हूँ।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों से आँसू गिर रहे थे।
"वो हँसा, भैया," उसने फिर कहा। "वो हँसा और कहा — 'उसे उसी जगह ले चलो जहाँ से कोई नहीं लौटता'।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"किससे कहा?" मैंने पूछा। "उसने किससे कहा?"
"मुझे नहीं पता। कोई और था वहाँ। एक आदमी। मैंने उसकी आवाज़ सुनी। वो बोला — 'हाँ, मालिक'।"
मैं खड़ा हुआ।
"वो अभी ज़्यादा दूर नहीं हो सकता," मैंने कहा। "मैं गंध लेता हूँ।"
मैंने आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली।
आग की गंध अब भी मेरी नाक में थी, और वो मेरी गंध पकड़ने की ताकत को खा रही थी। मैंने अपने आप को शांत किया। आँखें बंद। साँस धीरे।
फिर मैंने सूँघा।
ताज़ी मिट्टी। जली लकड़ी। धुआँ।
और उसके अंदर से, एक पतली लकीर। तेल। बादाम का तेल। और उसके साथ वो मिठास जो हर बार मेरी छाती में ठंडक भर देती थी।
पर वो गंध बहुत दूर थी। मेरी नाक से दूर जा रही थी। जैसे कोई रस्सी खींचकर ले जा रहा हो।
"मिली?" मीरा ने पूछा।
"हाँ," मैंने कहा। "पर वो जा रहे हैं। तेज़ी से। मेरी नाक…"
मैंने अपनी नाक छुई। उँगली पर लाल लगा।
"वीर, तेरी नाक से खून आ रहा है," मीरा ने कहा, और उसका चेहरा बदल गया। "तूने फिर ज़्यादा इस्तेमाल किया।"
"मुझे परवाह नहीं।"
"मुझे है।"
वो मेरे पास आई और उसने अपना रुमाल निकाला। फिर मेरी नाक पर दबाया।
"सिर पीछे कर। सीधा खड़ा रह।"
"मीरा, चंदा…"
"मैं जानती हूँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो मुझे हमेशा अच्छी लगती थी। "पर अगर तू बेहोश हो गया तो चंदा किसे ढूँढ़ेगा? तेरी नाक को रुकने दे।"
मैं चुप हो गया।
उसने रुमाल पकड़े रखा और मैंने सिर पीछे किया।
तभी माँ ने कहा, "टिंकू, तेरी बाँह दिखा।"
टिंकू ने अपनी बाँह माँ की तरफ़ बढ़ाई। माँ ने उसे देखा और उनका मुँह सिकुड़ गया।
"ये जला है। अच्छे से जला है।"
"माँ, कुछ नहीं…"
"चुप रह," माँ ने कहा, और वो माँ की वो आवाज़ थी जिसमें कोई बहस नहीं चलती। "तूने मेरे बेटे को बचाया। अब चुपचाप खड़ा रह।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया। वो चुप खड़ा रहा।
माँ ने अपनी साड़ी का छोर पकड़ा और ज़ोर से खींचा। फट। छोर अलग हो गया। फिर उन्होंने उसे मोड़ा और टिंकू की बाँह पर बाँधने लगीं।
"माँ, इससे…" टिंकू ने कहा।
"इससे क्या? इससे तेरा हाथ जाएगा? चुप।"
टिंकू ने दोबारा कुछ नहीं कहा।
माँ ने पट्टी बाँधी और मेरी तरफ़ देखा।
"अब तू सुन," उन्होंने कहा। "तू अभी इस हालत में कहीं नहीं जाएगा। तेरी नाक से खून बह रहा है। तेरा पैर जला है। तेरे हाथ काँप रहे हैं। तू चलेगा तो गिरेगा।"
"माँ, चंदा…"
"मैं जानती हूँ," उन्होंने कहा। "और मैं ये भी जानती हूँ कि चंदा तेरी जान है। पर तू मेरी जान है। और मैं तुझे इस हालत में नहीं भेजूँगी।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था — वो पानी जो उन्होंने अभी तक रोका हुआ था। उनके होंठ काँप रहे थे।
"दो मिनट," उन्होंने कहा। "दो मिनट मेरे लिए। फिर जो करना है कर।"
मैं चुप हो गया।
और वो दो मिनट मुझे आज तक याद हैं। क्योंकि उन दो मिनट में मैंने वो सब देखा जो मैंने बरसों में नहीं देखा था।
टिंकू मेरे पास आकर बैठ गया। उसकी बाँह पर माँ की साड़ी बँधी थी और उसका चेहरा पसीने से भरा था। वो अपनी बाँह नहीं देख रहा था। वो ज़मीन पर पड़ी उस छोटी लड़की को देख रहा था।
"ये किसकी बच्ची है?" उसने धीरे से पूछा।
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