Spirit of a Fighter1144 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1144

7 min read November 5, 2026

"ये तो… ये तो अखाड़े के पीछे का पुराना श्मशान है," वो बोली। "जहाँ बीस साल पहले कोई नहीं जाता था। मेरे पिता कहते थे कि वहाँ रात को आवाज़ें आती हैं।"

मैंने अंगूठी मुट्ठी में कसी।

"तो चलो," मैंने कहा। "आज वो आवाज़ें चुप कराने का वक़्त है।"

और तभी, आग की आवाज़ के पीछे से, एक और आवाज़ आई — धीमी, मीठी, गुड़ जैसी।

"बेटा।"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

वो आवाज़ भैरव सिंह की थी। और वो आग के बीच से आ रही थी।

॥

"बेटा।"

वो आवाज़ आग के बीच से आई थी, पर मेरे पैर वहीं जम गए। ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी रीढ़ में हाथ डालकर सारी हड्डियाँ पकड़ ली हों।

गुड़िया मेरे सामने खड़ी थी। मेरी छोटी बहन। बारह साल की। जिसकी दो चोटियाँ थीं और जिसके हाथ में हमेशा स्कूल की कॉपी रहती थी। जिसे मैंने अभी-अभी कुएँ से निकाला था।

फिर वो आवाज़ कैसे?

"भैया?" गुड़िया ने मेरा चेहरा देखा। "क्या हुआ? तुम्हारा चेहरा ऐसा क्यों…"

मैंने उसे पकड़कर अपने से दूर किया। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने उसकी कलाई पकड़ी, नब्ज़ टटोली। गरम थी। असली थी।

फिर आग की तरफ़ देखा।

"मीरा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फटी हुई निकली। "ये आवाज़… तूने भी सुनी?"

मीरा ने सिर हिलाया। उसका चेहरा पीला पड़ गया था।

"पर ये तो यहाँ है," उसने गुड़िया की तरफ़ इशारा किया। "फिर अंदर कौन…"

"कहीं ठाकुर ने उसे भी उठा लिया हो?" टिंकू ने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ में डर था, पर वो मेरे पीछे खड़ा था, हटा नहीं।

गुड़िया ने मेरी कमीज़ पकड़ ली।

"भैया, मैं यहाँ हूँ," उसने कहा। "मैं ठीक हूँ। माँ ने मुझे…"

"चुप," मैंने कहा।

मैंने फिर आग की तरफ़ देखा। लपटें ऊपर जा रही थीं — लंबी, लाल, पीली। धुआँ काला था और घूम-घूमकर ऊपर जा रहा था। उसके पीछे कुछ दिखता नहीं था।

पर मेरी नाक में एक गंध थी। सिर्फ़ गंध नहीं — गंधों का एक पूरा गुच्छा। जला हुआ कपड़ा, गरम लोहा, और उसके नीचे वो मिठास। गुड़ की चाशनी। वही चाशनी जो मैंने जग्गू की रस्सी पर सूँघी थी, जो मैंने भट्ठे के पास सूँघी थी, जो मैंने माँ की थैली वाले काग़ज़ पर सूँघी थी।

"वो अंदर है," मैंने कहा।

"कौन?" मीरा ने पूछा।

"भैरव।"

मैंने गुड़िया को मीरा की तरफ़ धकेला।

"इसे पकड़कर रख।"

"वीर, तू क्या करने…"

मैं आग में घुस गया।

पहला कदम रखते ही मेरे कानों में आवाज़ भर गई — कड़कड़, फट-फट, छहहह। गरमी ऐसी थी जैसे किसी ने मेरे चेहरे पर गरम तवा रख दिया हो। मेरी आँखें तुरंत पानी से भर गईं। धुआँ गले में घुसा और मैं खाँसने लगा।

पीछे से हाथ आया। टिंकू ने मेरी कमर पकड़ी।

"तू पागल है," उसने कहा, और खाँसा। "पर मैं तुझे अकेले नहीं जाने दूँगा।"

"टिंकू, तू बाहर जा।"

"चुप रह।"

मैं झुका। ज़मीन की तरफ़। धुआँ ऊपर जाता है, नीचे हवा थोड़ी साफ़ रहती है। ये बात मुझे किसी ने नहीं बताई थी — मैंने खुद सीखी थी, बरसों पहले, जब गुड़िया छोटी थी और हमारी झोपड़ी में चूल्हे का धुआँ भर जाता था और मैं उसे नीचे लेटाकर रखता था।

मैंने ज़मीन पर हाथ रखे। गरम थी। बहुत गरम। पर मैंने हाथ नहीं हटाया। मैंने आँखें बंद कर लीं और सूँघा।

धुआँ, आग, जली लकड़ी। बहुत सारा। पर उसके नीचे…

वहाँ थी। एक पतली सी लकीर। छोटे कदमों की गंध। मिट्टी और साबुन। वो साबुन जो माँ स्कूल के लिए खरीदती थी, नीले रंग का, जिसकी गंध गुड़िया के हाथों पर हमेशा रहती थी।

पर ये गंध उस दिशा से आ रही थी जिधर गुड़िया खड़ी थी। मेरे पीछे।

और एक और गंध थी। आगे। कोने की तरफ़। वो गंध जवान थी, बड़ी थी। उसमें तेल था — बादाम का। और उसके नीचे, बहुत गहरे, वो कड़वी बू जो मैंने पहली बार अपने आँगन की मिट्टी पर सूँघी थी।

मैं सीधा हुआ।

"टिंकू," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धुएँ से फट रही थी। "कोने में।"

"क्या?"

"कोने में कोई है। चल।"

हम रेंगते हुए आगे बढ़े। फर्श पर जली लकड़ियाँ पड़ी थीं। मेरी चप्पल की तली पिघल रही थी। मैंने एक जलती कड़ी को पैर से हटाया और मेरा पैर जल गया।

फिर ऊपर से आवाज़ आई।

मैंने सिर उठाया।

छत की एक कड़ी जल रही थी, और वो हिल रही थी। मैंने देखा — उसका एक सिरा टूट रहा था, और वो सीधे मेरे ऊपर आ रही थी।

मैंने कूदने की कोशिश की, पर मेरा पैर फिसल गया।

तभी टिंकू ने मुझे धक्का दिया।

पूरे ज़ोर से। मेरी छाती पर हाथ रखकर, दोनों हाथों से।

मैं दूर जा गिरा। मेरी पीठ ज़मीन पर लगी और साँस रुक गई।

और वहीं, जहाँ मैं एक पल पहले खड़ा था, वो जलती कड़ी गिरी। धम्म। चिंगारियाँ हवा में उड़ीं।

और टिंकू चीखा।

मैं उठा। मेरे घुटनों में ताकत नहीं थी, पर मैं उठा।

टिंकू अपनी बाँह पकड़े खड़ा था। उसकी आस्तीन जल रही थी। छोटी आग थी, पर मैंने उसे देखा और मेरे अंदर कुछ उलट गया।

मैंने अपनी धोती का छोर पकड़ा और उसकी बाँह पर मारकर आग बुझाई। फिर उसे दो बार और मारा। फिर मेरा हाथ रुका।

टिंकू की बाँह की खाल जल गई थी। एक हिस्से पर सफ़ेद फफोला उठ रहा था, और उसके चारों तरफ़ खाल लाल थी।

टिंकू मेरी तरफ़ देख रहा था। उसकी आँखों में पानी था — धुएँ से या दर्द से, मैं नहीं जानता। पर वो मुस्कुराया।

"देखा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी। "मैंने कहा था न, मैं कल से कसरत शुरू करूँगा। आज ही शुरू कर दी।"

"तू पागल है," मैंने कहा। "तू बिलकुल पागल है।"

"हाँ। तेरा दोस्त हूँ।"

मैंने उसका हाथ पकड़ा। फिर आगे देखा।

कोने में एक आकृति थी। झुकी हुई। छोटी। ज़मीन पर पड़ी।

मैं दौड़ा। मेरी चप्पल फिसल रही थी, मेरा फटा पैर जल रहा था, पर मैं दौड़ा।

वहाँ, जली लकड़ियों के ढेर के नीचे, गुड़िया पड़ी थी।

पर गुड़िया तो बाहर थी। मैंने अभी उसे बाहर देखा था। मीरा के पास। मैंने उसकी कलाई पकड़ी थी, उसकी नब्ज़ टटोली थी।

फिर ये कौन?

मैं ज़मीन पर घुटने टेककर बैठा और उसके चेहरे से जली लकड़ी हटाई।

वो गुड़िया नहीं थी।

वो एक और लड़की थी। छोटी, गुड़िया से भी छोटी। उसके बाल जले हुए थे। उसका चेहरा काला पड़ गया था। उसके हाथ में एक कॉपी दबी थी — स्कूल की कॉपी। पर ये गुड़िया की कॉपी नहीं थी। इस पर नीले रंग का कवर था, और कवर पर एक नाम लिखा था, जो आधा जल चुका था।

मैंने उसे गोद में उठाया। हल्की थी। बहुत हल्की। जैसे कोई चिड़िया हो।

"कौन है ये?" टिंकू ने पीछे से कहा।

"नहीं जानता," मैंने कहा। "पर ये ज़िंदा है। साँस चल रही है।"

मैंने उसे सीने से लगाया और बाहर की तरफ़ भागा।

बाहर हवा लगी तो मेरे फेफड़ों ने जैसे पहली बार साँस ली। मैं घुटनों पर गिरा। लड़की मेरी गोद में थी, और मैं खाँस रहा था, और मेरी आँखों से पानी बह रहा था।

"भैया!"

गुड़िया दौड़ी आई। और उसके पीछे माँ।

माँ। मैंने उन्हें देखा और मेरा दिल धक्क से रह गया। वो अपने पैरों पर खड़ी थीं। बेहोश नहीं थीं। वो चल रही थीं, भाग रही थीं, अपनी साड़ी का छोर उठाए हुए।

उन्होंने मेरी गोद में पड़ी लड़की को देखा और उनके कदम रुक गए।

"ये…" उनकी आवाज़ निकली नहीं। "ये कौन…"

"माँ, ये अंदर थी। जल रही थी।"

माँ ने लड़की का चेहरा देखा। उन्होंने उसके माथे से जले बाल हटाए। फिर उन्होंने उसकी कलाई पकड़ी, और उनकी आँखें भर आईं।

"अरे राम," उन्होंने धीरे से कहा। "ये तो… ये तो किसी की बच्ची है।"

"माँ, तू कैसे उठी? तू तो…"

"मैंने आँखें खोलीं," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ अब सख़्त हो रही थी। "और मैंने सुना कि तू आग में घुस गया। तू पागल है? तू अपनी जान को…"

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