Spirit of a Fighter1142 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1142

7 min read November 5, 2026

"मैं तेरे बराबर चलूँगी," उसने कहा, और मेरे आगे निकल गई।

हम सड़क पर भागे। रास्ते में गाँव के लोग बाहर निकल आए थे और वो सब अखाड़े की तरफ़ देख रहे थे। किसी के हाथ में बाल्टी थी, किसी के हाथ में कुदाल। सुक्खी बुआ अपनी साड़ी सँभालती हुई भाग रही थीं और चिल्ला रही थीं, "अरे पानी लाओ! अरे कोई कुआँ खोलो!"

अखाड़े का फाटक सामने आया, और मैंने देखा कि अंदर से धुआँ निकल रहा था — काला, मोटा, और उसमें जली हुई मिट्टी की गंध थी।

पर जब मैं फाटक के पास पहुँचा, तो मैं रुक गया।

क्योंकि आग अखाड़े के मैदान में नहीं लगी थी।

आग उस पुराने कुएँ से निकल रही थी जो अखाड़े के पीछे था — वही कुआँ जिसके नीचे तहखाना था। जिसकी मिट्टी में ताकत थी। जहाँ मेरे पापा ने मुझे बुलाया था।

धुआँ नीचे से ऊपर आ रहा था, और उसके साथ एक आवाज़ भी — किसी के खाँसने की, किसी के कराहने की।

और फिर मैंने देखा।

कुएँ के किनारे पर एक आदमी खड़ा था, और उसके हाथ में मशाल थी।

वो लंगड़ा रहा था।

शेराज़।

वो मेरी तरफ़ मुड़ा, और उसके चेहरे पर वो मुस्कान थी जो मुझे पहले भी दिखी थी — जब वो माँ और गुड़िया को बैलगाड़ी में ले गया था।

"आ गया, भवानी का बेटा," उसने कहा, और मशाल हिलाई। "अब देख, तेरे पापा की मिट्टी कैसे जलती है।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा और उसके होंठ सिर्फ़ इतना बोले — "कुछ सोच।"

मैंने आँखें बंद कीं और हवा सूँघी।

और इस बार मुझे सिर्फ़ धुआँ नहीं मिला। मुझे कुछ और मिला — कुएँ के भीतर से आती हुई एक गंध जो धुएँ से भी पुरानी थी। गीली मिट्टी। ठंडी मिट्टी। वो मिट्टी जो आग से नहीं जलती, क्योंकि वो पानी के नीचे है।

तहखाना अभी जला नहीं था। पर शेराज़ उसे जलाने वाला था।

मैंने आँखें खोलीं और अपनी मुट्ठी कस ली।

"मीरा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अब काँप नहीं रही थी। "तू पानी के लिए गाँव वालों को सँभाल। टिंकू, तू कुएँ की रस्सी ढूँढ।"

"और तू?" मीरा ने कहा।

मैंने शेराज़ की तरफ़ देखा। वो अब भी मुस्कुरा रहा था, मशाल हिला रहा था, और उसका लंगड़ा पैर ज़मीन पर टिका था।

"मैं उससे बात करूँगा," मैंने कहा।

और मैं आग की तरफ़ बढ़ा, जहाँ धुआँ मेरे फेफड़ों में भर रहा था और मेरी आँखों में पानी आ रहा था, और मेरे अंदर एक ही आवाज़ गूँज रही थी — मेरे पापा की वो आख़िरी लाइन, जो मैंने अभी पढ़ी थी।

"मेरे बेटे को तेरे जैसा नहीं बनना है।"

मैं शेराज़ की तरफ़ बढ़ता रहा, और मशाल की रोशनी में उसका चेहरा लाल दिख रहा था, और उसकी मुस्कान अब कमज़ोर लग रही थी।

॥

मैं शेराज़ की तरफ़ बढ़ रहा था कि मेरे पैर ठोकर खाकर रुक गए। ज़मीन गरम थी। मेरी चप्पलों के नीचे से तपिश ऐसी चढ़ रही थी जैसे कोई चूल्हे पर खड़ा हो।

शेराज़ ने मशाल को कुएँ के मुँह पर झुकाया। नीचे से धुआँ ऐसा उठा कि आधा आसमान काला हो गया।

"एक कदम और बढ़ा," उसने कहा, "तो ये मशाल नीचे जाएगी। और फिर तेरे पापा की मिट्टी, तेरे पापा की हड्डियाँ, सब राख।"

"वो हड्डियाँ तेरे पास नहीं हैं," मैंने कहा। "वो मेरे पास हैं।"

शेराज़ का हाथ एक पल को रुका। उसकी मुस्कान में दरार पड़ी।

"झूठ!"

"पीतल का संदूक," मैंने कहा। "गंगा देवी के आँगन से। तू जिसे ढूँढ रहा था, वो आज सुबह मेरे हाथ लग गया।"

वो चीखा और मशाल नीचे फेंकने को हुआ। पीछे से एक आवाज़ आई — "शेराज़!"

गंगा देवी हवेली की दीवार के सहारे खड़ी थीं, साड़ी का पल्लू सिर से खिसका हुआ, आँखें लाल।

"मशाल नीचे मत डाल," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा था जो मैंने पहले नहीं सुना — डर। "नीचे तेरी माँ का काग़ज़ है। तेरे बाप का हिसाब है। जला दिया तो तू भी किसी काम का नहीं रहेगा।"

"मेरे बाप का हिसाब मेरे साथ जलेगा, तो जले," शेराज़ ने कहा। पर मशाल का हाथ अब भी काँप रहा था।

तभी कुएँ के भीतर से खाँसी की आवाज़ आई — छोटी, दुबली, किसी बच्चे की।

मेरा सीना कस गया।

"टिंकू!" मैं चिल्लाया। "रस्सी!"

"मिल गई!" टिंकू की आवाज़ अंधेरे से आई। "भाई, ये रस्सी बहुत पुरानी है—"

"बाँध और नीचे फेंक!"

शेराज़ ने एक कदम आगे बढ़ाया, पर मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने एक ही पल में मेरी आँखों में सब पढ़ लिया। उसने अपना बैग खोला और उसमें से एक पतली सी सफ़ेद पुड़िया निकाली।

"शेराज़," वो बोली, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो अदालत में होती है। "तूने आज सुबह खीर खाई थी न? गंगा देवी के हाथ की?"

शेराज़ रुका।

"उसमें कुछ डाला गया था," मीरा ने कहा। "अगर तूने पूरी खीर खाई है, तो अगले आधे घंटे में तेरे हाथ-पैर सुन्न हो जाएँगे। मैं वैद्य की बेटी हूँ, मुझे पता है मैं क्या बोल रही हूँ।"

शेराज़ की मशाल वाली कलाई काँपी। उसने अपनी दूसरी कलाई देखी — उँगलियाँ हिलाईं।

"झूठी!" वो चीखा। पर उसकी आवाज़ में वो भरोसा नहीं था।

"फिर उँगली हिलाकर दिखा," मीरा ने कहा। "छोटी उँगली।"

शेराज़ ने हिलाई। हिली नहीं।

वो एक पल को अपनी उँगली देखता रह गया, और वही एक पल काफ़ी था।

मैंने छलाँग लगाई।

मशाल मेरे हाथ से छूटी, हवा में घूमी और कुएँ की दीवार पर जा गिरी — जली, बुझी, और धुएँ में गायब। शेराज़ मेरे नीचे गिरा और उसका लंगड़ा पैर एक अजीब तरह से मुड़ गया। वो कराहा और मेरी कलाई पकड़ने की कोशिश की, पर उसकी उँगलियाँ सचमुच काम नहीं कर रही थीं।

मीरा ने झूठ नहीं बोला था। उसने खीर में सचमुच कुछ डाला था — या शायद सिर्फ़ डर डाला था। पता नहीं। पर शेराज़ का डर असली था, और वही काफ़ी था।

"रस्सी!" मैं चिल्लाया।

टिंकू दौड़कर आया, रस्सी का एक सिरा मेरे हाथ में दिया और दूसरा खूँटे पर बाँध दिया। मैंने रस्सी कुएँ में डाली।

धुआँ अब भी नीचे से आ रहा था, पर पतला। कुएँ के पानी की ठंडी गंध उसके साथ ऊपर आ रही थी — गीली मिट्टी, काई, पुराना पत्थर।

"गुड़िया!" मैंने नीचे झाँका। "गुड़िया, रस्सी पकड़!"

नीचे से खाँसी, फिर एक पतली आवाज़ — "भैया… माँ…"

"माँ कहाँ है?"

"पास ही है… वो बेहोश है… भैया, वो बूढ़ा आदमी…"

"बूढ़ा आदमी नहीं है अब," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ जान-बूझकर सख़्त थी ताकि वो रोना बंद कर दे। "वो भाग गया। रस्सी पकड़, और माँ की कमर में भी बाँध।"

कुछ पलों तक रस्सी हिलती रही। फिर एक झटका आया।

"बँध गई!" गुड़िया चिल्लाई।

मैंने खींचना शुरू किया। टिंकू मेरे पीछे लगा। मेरी बाँहों की नसें उभर आईं, कलाइयाँ जलने लगीं, और कुएँ की गोल दीवार पर रस्सी खिसकती रही।

फिर एक चेहरा ऊपर आया — छोटा, कालिख से भरा, आँखें लाल, दो चोटियाँ जलकर आधी रह गई थीं, और माथे पर ज़ख़्म से खून बह रहा था।

गुड़िया।

मैंने उसे बाहर खींचा और वो मेरे गले में गिर पड़ी। उसकी साँसें चल रही थीं, पर वो काँप रही थी — पूरे शरीर से, जैसे बुख़ार में।

"माँ," वो फुसफुसाई। "माँ नीचे है, भैया… वो बहुत भारी हो गई है…"

मैंने उसे टिंकू के हाथ में दिया और फिर से रस्सी पकड़ी।

माँ को खींचने में साँस फूल गई। एक बार तो लगा कि रस्सी टूट जाएगी — उसके कटे हुए सिरे कुएँ के पत्थर पर रगड़ खा रहे थे। मेरी हथेलियों से खून बहने लगा, पर मैंने हाथ नहीं खोला।

फिर माँ का सिर ऊपर आया। बाल बिखरे, माथे पर हल्दी का टीका टूटा, होंठ सूखे।

मैंने उन्हें बाहर निकाला और उनका सिर अपनी जाँघ पर रखा।

"माँ।" मेरी आवाज़ फटी। "माँ, आँखें खोलो।"

कुछ नहीं हुआ।

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