Spirit of a Fighter1137 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1137

7 min read November 5, 2026

उसने अपना सिर उठाया। उसकी आँखें मेरी तरफ़ थीं, पर वो मुझे नहीं देख रहा था। "मैं वो हूँ जिसे भवानी ने बचाया था। और जिसे ठाकुर ने ज़िंदा जला दिया था। पर जलकर मरना किस्मत वालों को मिलता है, बेटा। मैं जलकर ज़िंदा बच गया।"

कालू काका आगे बढ़े। उनकी आवाज़ काँप रही थी। "ये आवाज़…"

बूढ़े ने मुस्कुराने की कोशिश की, पर उसके चेहरे की जली हुई चमड़ी खिंच गई। "कालू? तू अभी ज़िंदा है? मैंने सोचा तू भी उन बीस में से एक होगा जिन्हें ठाकुर ने मिटा दिया।"

"तुम कौन हो?" मैंने फिर पूछा। इस बार मेरी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो मुझे खुद से आ रही थी।

"मेरा नाम वासुदेव है," उसने कहा। "मैं भवानी का मुंशी था। बीस साल पहले, उस रात, मैं उसी कमरे में था जहाँ तेरे पापा को ज़हर दिया गया था।"

कमरे में सन्नाटा छा गया। टिंकू ने साँस रोक ली। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा, और उसकी पकड़ में वो यक़ीन था जो मुझे चाहिए था।

"मैंने सब देखा," वासुदेव ने कहा। "दयाराम को, ठाकुर को, और उन दोनों के बीच खड़े उस आदमी को जो तेरे पापा का भाई था।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। "मेरे… मेरे चाचा?"

"हाँ।" उसने अपनी उँगली उठाई, और उसकी उँगली काँप रही थी। "वो अब भी ज़िंदा है। और वो इसी हवेली में है।"

मैंने एक कदम पीछे रखा। मेरा सिर घूम गया, और मैंने दीवार को हाथ से पकड़ा। मीरा ने तुरंत पानी का लोटा उठाया और मेरे मुँह पर लगाया। पानी ठंडा था, और उसमें नीम की हल्की कड़वाहट थी। मैंने एक घूँट पिया।

"कहाँ है वो?" मैंने पूछा।

"नीचे," वासुदेव ने कहा। "कुएँ के नीचे। उसी सुरंग में जहाँ से तू आया था। पर अब वहाँ तीन दरवाज़े हैं, और तूने सिर्फ़ दो देखे हैं।"

कालू काका ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई। "वासुदेव, तू बीस साल से इसी कमरे में था?"

"जहाँ-जहाँ ठाकुर ने रखा, वहाँ-वहाँ रहा। कभी तहखाने में, कभी भट्ठे पर, कभी इसी हवेली में। पर आज सुबह जब ठाकुर को जेल में डाला गया, तब मेरा एक आदमी आया और मुझे यहाँ ले आया। उसने कहा — 'अब तेरा वक़्त आया है।'"

"कौन आदमी?" मैंने पूछा।

"वो जो तेरे लिए इसी हवेली में रोज़ खाना रखता था। जो तेरे पीछे-पीछे फिरता था, पर तुझे कभी दिखता नहीं था।"

मेरी नाक ने फिर काम किया। मैंने कमरे की हवा सूँघी — लालटेन का तेल, बूढ़े का पसीना, और उसके नीचे… गुड़ की चाशनी। वही गंध जो उस औरत के कपड़ों पर थी।

"वो औरत कौन है?" मैंने पूछा। "जो इस हवेली में आती-जाती है, जो तंबाकू खाती है।"

वासुदेव ने अपना सिर नीचे किया। "वो… वो मेरी बेटी है।"

कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।

"उसका नाम चंपा है," वासुदेव ने धीरे से कहा। "वही जिसे मैंने बीस साल पहले तेरे पापा के हाथ में सौंपा था। वही जो तेरे लिए इतने साल खाना रखती रही, बिना तुझे बताए।"

मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने दीवार का सहारा और मज़बूती से पकड़ा। चंपा। वही चंपा जिसका ज़िक्र जग्गू ने किया था। जग्गू की बीवी चंपा। मतलब… मतलब जग्गू इसी घर का आदमी था?

"जग्गू मेरा दामाद है," वासुदेव ने कहा, जैसे मेरे दिमाग़ की आवाज़ सुन ली हो। "और उसके हाथ ठाकुर ने काटे थे, क्योंकि उसने बीस साल पहले उस रात की आवाज़ सुनी थी और बोलने की कोशिश की थी।"

टिंकू ने अपनी टोपी उतार ली और अपने हाथों में पकड़ ली। "बाप रे," उसने फुसफुसाया। "ये हवेली कितने राज़ छिपाए बैठी है।"

वासुदेव ने अपनी चौकी के नीचे से एक पुरानी किताब निकाली। उसके पन्ने पीले पड़ गए थे और बंधन टूटा हुआ था। "ये भवानी की डायरी है। असली वाली। जो तेरे पास है, वो नकल है।"

मैंने आगे बढ़कर किताब ली। पहला पन्ना खोला। ऊपर भवानी सिंह का नाम लिखा था, और नीचे एक लाइन — "जो मेरे बाद इसे पढ़े, वो पहले मेरी माँ से माफ़ी माँगे।"

मेरी आँखें भर आईं। पर मैंने खुद को रोका। अभी रोने का वक़्त नहीं था।

"इसमें क्या है?" मैंने पूछा।

"तेरे चाचा का नाम," वासुदेव ने कहा। "और वो जगह जहाँ तेरे पापा ने अपने पीछे कुछ छिपाया था। पर वो जगह बता देने से पहले, मुझे कुछ चाहिए।"

"क्या?"

"मेरी बेटी।" उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा था जो सूखा नहीं था। "चंपा। वो आज सुबह यहाँ आई थी, और तब से लौटी नहीं। मुझे डर है कि उसे भी उठा लिया गया है।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "वो औरत… जिसकी परछाई तुमने भट्ठे पर देखी थी। शायद वो चंपा ही थी।"

"नहीं," वासुदेव ने कहा। "चंपा कभी भट्ठे पर नहीं जाती। वो यहाँ आती है, तेरे पीछे-पीछे, तेरी हिफ़ाज़त के लिए। अगर तूने भट्ठे पर कोई औरत देखी, तो वो चंपा नहीं थी।"

मैंने किताब अपनी बगल में दबाई और कालू काका की तरफ़ देखा। उनका चेहरा पीला पड़ गया था।

"वो औरत," कालू काका ने धीरे से कहा, "जिसकी गंध तुझे तंबाकू और गुड़ की मिली थी। वो शायद… वो शायद शांति है।"

"शांति?" मीरा ने पूछा। "कौन शांति?"

कालू काका ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई और मेरी तरफ़ देखा। "शांति ठाकुर की बहन थी। और वो… वो भवानी से प्यार करती थी।"

मेरा दिमाग़ ठप हो गया। "क्या?"

"बीस साल पहले, शांति हवेली आई थी," कालू काका ने कहा। "वो भवानी से मिलने। पर उस रात कुछ ऐसा हुआ कि वो कभी लौटी नहीं। और ठाकुर ने हमेशा कहा कि उसकी बहन भवानी के हाथों मर गई।"

वासुदेव ने अपना सिर हिलाया। "झूठ। शांति ज़िंदा है। ठाकुर ने उसे ज़िंदा रखा, क्योंकि वो जानता था कि अगर शांति बोलेगी, तो उसका सारा खेल खत्म हो जाएगा।"

मैंने किताब और मज़बूती से पकड़ी। "तो अब क्या? मैं चंपा को कैसे ढूँढूँ?"

वासुदेव ने अपनी उँगली उठाई और उससे ऊपर की तरफ़ इशारा किया। "हवेली की छत पर एक कमरा है। छोटा-सा। जिसमें ठाकुर कभी-कभी आता था, बिना किसी को बताए। वहाँ जा। पर जल्दी कर, क्योंकि जो आदमी उसे उठा ले गया, वो अब तक उसे शहर ले जाने की कोशिश कर रहा होगा।"

मैंने मीरा और टिंकू की तरफ़ देखा।

"छत पर," मीरा ने कहा। "चलो।"

हम कमरे से बाहर निकले। गली में मेरी नाक ने फिर काम किया — चंदन, कपूर, और अब उसमें एक नई गंध जुड़ गई थी। गीली घास। जैसे कोई बगीचे से होकर गुज़रा हो।

"वो सीढ़ियाँ," कालू काका ने कहा और आँगन के कोने की तरफ़ इशारा किया। "वहाँ से छत पर जाते हैं।"

हम सीढ़ियों की तरफ़ बढ़े। पहली सीढ़ी पर मुझे कुछ दिखा। एक छोटी-सी पोटली, जिसमें से पीले रंग का कुछ निकल रहा था। मैंने उसे उठाया और खोला। अंदर हल्दी और सिंदूर था, और उसके नीचे एक काग़ज़ का टुकड़ा।

काग़ज़ पर लिखा था — "तेरे पापा ने मुझे ये हवेली सौंपी थी। अब मैं इसे तुझे सौंप रही हूँ। जल्दी आ, वरना देर हो जाएगी।"

मैंने काग़ज़ मीरा को दिया। उसने पढ़ा और उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

"ये लिखाई," उसने कहा, "ये वही लिखाई है जो उस पर्ची पर थी जो तुम्हें कुएँ पर मिली थी।"

"मतलब शांति," मैंने कहा। "वो हमारी तरफ़ है।"

"या वो हमें फँसा रही है," टिंकू ने कहा, और फिर जल्दी से जोड़ा, "मतलब, मैं तो बस सोच रहा था। तुम दोनों जानो। मैं तो बस… चलो।"

हम सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। पत्थर की सीढ़ियाँ थीं, और हर कदम पर उनसे धूल उड़ रही थी। छत के दरवाज़े पर पहुँचे, तो वो खुला था। अंदर से हल्की रोशनी आ रही थी।

मैंने दरवाज़ा धकेला।

छत का कमरा छोटा था। बीच में एक चारपाई थी, और चारपाई पर एक औरत बैठी थी। उसके बाल खुले थे, हाथ बँधे थे, और उसके मुँह पर कपड़ा बँधा था। जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला, उसने अपनी आँखें बड़ी कीं और ज़ोर से "म्म… म्म…" की आवाज़ की।

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