Spirit of a Fighter – Chapter 1138
"चंपा?" मैंने कहा।
उसने सिर हिलाया।
मैं दौड़कर उसके पास गया और उसके मुँह का कपड़ा खोला। उसने गहरी साँस ली और फिर पहली बात जो बोली, वो थी — "वो तुम्हें ढूँढ रहा है। वो तुम्हें यहाँ बुलाकर फँसाना चाहता है।"
"कौन?" मैंने पूछा।
"तेरा चाचा," उसने कहा, और उसकी आँखों में आँसू थे। "वो नीचे है। वो आज सुबह आया और बोला कि अगर मैंने तुम्हें नहीं बुलाया, तो वो बाबा को मार देगा।"
मैंने उसके हाथ खोलने शुरू किए। "तुम्हारे बाबा सुरक्षित हैं," मैंने कहा। "हम उनके पास से आ रहे हैं।"
तभी पीछे से एक आवाज़ आई। मीठी, धीमी, पर उसमें वो ज़हर था जो मुझे बचपन से पता था।
"बहुत अच्छा किया, भतीजे। तूने मेरा काम आसान कर दिया।"
मैं पलटा।
दरवाज़े पर एक आदमी खड़ा था। लंबा, दुबला, सफ़ेद धोती, और माथे पर चंदन का तिलक। उसके हाथ में एक पीली शीशी थी, और वो शीशी ठीक वैसी थी जैसी माँ की अलमारी में मिली थी।
"मैं तेरा चाचा हूँ," उसने कहा। "भवानी का सगा भाई। और आज मैं तुझे वो सब बताने आया हूँ जो तेरे पापा ने तुझसे छिपाया था।"
उसने शीशी खोली, और उसमें से गुड़ की चाशनी की गंध आई।
"बैठ," उसने कहा। "आज बहुत लंबी बात है।"
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"बैठ," उसने कहा। "आज बहुत लंबी बात है।"
मैं नहीं बैठा। मेरी टाँगें काँप रही थीं, पर बैठना उसके सामने हार मानना लगता था।
"तू भवानी का भाई है?" मैंने पूछा। "सगा भाई?"
"सगा भाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो दूध में घुली चीनी जैसी होती है। "बड़ा भाई। भवानी मुझसे दो साल छोटा था। हम दोनों इसी हवेली के आँगन में खेले, इसी मिट्टी में लोटे, इसी कुएँ का पानी पिया।"
वो चारपाई के पास आया और चंपा के सिर पर हाथ रखने लगा। चंपा सिकुड़ गई।
"इसे मत छू," मैंने कहा।
उसने हाथ पीछे खींच लिया, पर मुस्कुराता रहा।
"देख, भतीजे, तुझे मुझसे नफ़रत है क्योंकि तुझे सिर्फ़ एक तरफ़ की कहानी पता है। भवानी ने तुझे बताया होगा कि मैं लालची हूँ, मैंने अखाड़ा माँगा, मैंने उसके पैर बेकार किए।" उसने शीशी हिलाई। "पर उसने ये नहीं बताया होगा कि मैंने क्यों माँगा।"
"क्यों माँगा?"
"क्योंकि पिता जी ने मरते वक़्त हवेली मुझे दी थी," उसने कहा। "ज़ुबानी। कोई काग़ज़ नहीं, बस एक बात — 'बड़े बेटे को हवेली, छोटे को अखाड़ा।' भवानी ने वो बात दबा दी। उसने कहा पिता जी ने ऐसा कुछ नहीं कहा। मैंने पूछा, किससे पूछें? उसने कहा, किसी से मत पूछो, भूल जाओ।"
मीरा ने पीछे से कहा, "और तुमने क्या किया? याद दिलाने के लिए ज़हर दिया?"
वो मीरा की तरफ़ मुड़ा। उसकी आँखें ठंडी हो गईं, मुस्कान वहीं रही।
"तू रणवीर की बेटी है," उसने कहा। "तेरे बाप ने भी मेरे भाई का साथ दिया। तीनों ने मिलकर मुझे हवेली से बाहर कर दिया। मैं बीस साल इसी हवेली में छिपकर रहा, जैसे कोई चूहा। अपनी ही हवेली में।"
"तो इसीलिए तूने भैरव को पाला?" मैंने कहा। "तूने उसे अखाड़े में बैठाया, उसे ज़हर के काग़ज़ दिए, उससे बीस साल पहलवान मरवाए?"
"भैरव मेरा हाथ था," उसने कहा। "मैं बाहर नहीं जा सकता था, तो मैंने एक हाथ बनाया। जो मैं नहीं कर सका, वो उसने किया।"
"और जो मरे?" मैंने कहा। "वो उन्नीस पहलवान? वो किसकी मिट्टी में गए?"
उसने शीशी खोली और उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"सूंघ," उसने कहा। "तेरी नाक तेज़ है ना? सब कहते हैं तेरी नाक तेज़ है।"
मैंने सूंघा। गुड़ की चाशनी, और उसके नीचे कुछ कड़वा, जो ज़ुबान पर नहीं, गले पर लगता है।
"ये भवानी की बनाई शीशी है," वो बोला। "उसने खुद बनाई थी, यही पानी। और उसने खुद अपने पहलवानों को पिलाया।"
मैं ठिठक गया।
"झूठ," मैंने कहा, पर मेरी आवाज़ में वो दम नहीं था।
"झूठ नहीं," उसने शीशी मेरी तरफ़ और बढ़ाई। "भवानी ने ये पानी बनाया था — शुरू में घाव भरने के लिए। पर फिर उसने देखा कि थोड़ा-थोड़ा पीने से ताकत दुगनी हो जाती है। और उसने इसे पिलाना शुरू किया। सालों पिलाया। जब पहलवान बीमार पड़ने लगे, तब उसे पता चला कि इसमें ज़हर भी है। तब तक देर हो चुकी थी।"
मेरा सिर घूमने लगा। मैंने दीवार का सहारा लिया।
"तो मेरे पापा…" मैंने कहा।
"तेरे पापा ने मुझे रोका," उसने कहा। "जब उसने देखा कि मैं भी यही पानी बना रहा हूँ, तब उसने मुझे हवेली से निकाल दिया। ये बात अलग है कि उसने अपना ही ज़हर मेरी गर्दन पर मढ़ दिया।"
कालू काका ने पीछे से कहा, "झूठ।"
हम सब पलटे। कालू काका दरवाज़े पर खड़े थे, और उनका चेहरा पत्थर जैसा था।
"भवानी ने ये पानी कभी नहीं बनाया," उन्होंने कहा। "ये पानी तूने बनाया। तूने भवानी की किताब चुराई, उसमें से नुस्खा निकाला, और उसमें ज़हर मिलाया। भवानी ने तुझे पकड़ा तो तूने उसी रात उसके पानी में ज़हर डाल दिया।"
वो हँसा। एक छोटी हँसी, जैसे कोई बच्चा मज़ाक सुने।
"कालू," उसने कहा, "तू बीस साल मेरे सामने झुककर चला है। आज खड़ा हो गया?"
"आज मेरा बेटा ज़िंदा है," कालू काका ने कहा। "आज मैं डरता नहीं।"
उसने शीशी मेज़ पर रखी और अपनी धोती ठीक की।
"अच्छा," उसने कहा। "तो सच सबको पता है। फिर बात यहाँ खत्म करते हैं।"
और तभी मैंने नीचे से आवाज़ सुनी। बहुत सारे पैरों की आवाज़, पत्थर की सीढ़ियों पर। मीरा ने खिड़की से झाँका।
"पुलिस," उसने कहा। "और पीछे… वो रणवीर सिंह की व्हीलचेयर है।"
"नीचे चल," मैंने उस आदमी से कहा, और मेरी आवाज़ अब नहीं काँप रही थी। "अदालत तुझे बुला रही है।"
उसने मुझे देखा। उसकी आँखों में कुछ बदला — पहली बार, मुस्कान हटी।
"अदालत," उसने कहा, जैसे गंदा शब्द बोल रहा हो। "भवानी की अदालत।"
"नहीं," मैंने कहा। "सच की अदालत।"
वो चुपचाप चलकर नीचे उतरा। हम पीछे-पीछे। आँगन में इंस्पेक्टर शर्मा चार सिपाहियों के साथ खड़े थे। और उनके पीछे, व्हीलचेयर पर रणवीर सिंह बैठे थे, और उनकी आँखों में वो आग थी जो बीस साल से दबी थी।
वो अपने भाई को देखकर रुका, और फिर धीरे से बोला, "नमस्ते, भाई साहब।"
रणवीर सिंह ने कुछ नहीं कहा। बस उनके हाथ व्हीलचेयर की बाँहों पर कस गए।
अदालत का कमरा भरा हुआ था। और इस बार भीड़ अलग थी — गाँव के लोग, अखाड़े के पहलवान, और वो मरे हुए पहलवानों के परिवार, जो दूर-दूर से आए थे। मैंने कई औरतों को देखा जो सिर पर काला कपड़ा बाँधे थीं। उनकी आँखें सूखी थीं, पर उनमें एक सवाल बैठा था जो बीस साल से रुका हुआ था।
मुंशीजी अब गवाह के कटघरे में नहीं थे। वो सिपाहियों के बीच बैठे थे, हथकड़ी पहने। ठाकुर भी पीछे बैठा था, दो सिपाहियों के बीच, और उसके हाथ भी बँधे थे। मेरा चाचा — जिसका नाम अब सबको पता था, गंगाधर — उसके बगल में खड़ा था।
जज साहिबा ने काग़ज़ उठाया। वो औरत थीं, सफ़ेद बाल, चश्मा, और आवाज़ में वो ठंडक जो बिना चिल्लाए भी कमरे को शांत कर देती है।
"सरस्वती देवी," उन्होंने कहा। "आपको गवाही के लिए बुलाया गया है। आपके हाथ में एक काग़ज़ है। वो क्या है?"
माँ कटघरे में खड़ी थीं। उन्होंने साड़ी का पल्लू ठीक किया, और फिर वो काग़ज़ सामने रख दिया।
"ये," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ साफ़ थी, "ये वो काग़ज़ है जो भवानी सिंह ने अपने आख़िरी दिनों में लिखा था। इसमें लिखा है कि उनके पानी में ज़हर किसने डाला।"
अदालत में फुसफुसाहट फैल गई। जज साहिबा ने हाथ उठाया, और सन्नाटा छा गया।
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