Spirit of a Fighter – Chapter 1134
वकील साहब खड़े हुए। उनका नाम शास्त्री था, और वो अपनी ज़ुबान के लिए मशहूर थे।
"जज साहिबा," उन्होंने शुरू किया, "मैं इस गवाह की हालत देखकर हैरान हूँ। ये आदमी बीस साल से मानसिक रूप से अस्वस्थ रहा है। गाँव के लोग जानते हैं। इसने खुद कई बार कहा है कि उसे कुछ याद नहीं।"
"जज साहिबा," दयानाथ साहब खड़े हुए, "ये गवाह बीस साल से ठाकुर महेंद्र सिंह के कब्ज़े में बंधा रहा है। मैं अदालत से निवेदन करता हूँ कि इसे बोलने का मौका दिया जाए।"
जज साहिबा ने चश्मा ऊपर किया और जग्गू की तरफ़ देखा।
"गवाह," उन्होंने कहा, "आप अपनी बात कहिए। पर सिर्फ़ सच।"
शास्त्री साहब ने तुरंत पूछा, "ये काग़ज़ जो आपने दिए हैं — इनके बारे में आपको कैसे पता कि ये असली हैं? आपने खुद कहा था कि आपको कुछ याद नहीं।"
अदालत में खामोशी छा गई।
जग्गू ने अपना सिर थोड़ा उठाया। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "मेरे हाथ याद रखते हैं, वकील साहब। ज़ुबान भूल जाए तो भी।"
शास्त्री साहब हंसे। "ये कैसी बात हुई? हाथ कैसे याद रखते हैं?"
जग्गू ने अपनी बाँहें ऊपर कीं। पट्टी में लिपटी, कटी कलाइयाँ हवा में उठीं। पीछे बैठी एक औरत ने मुँह पर हाथ रख लिया।
"ये हाथ मेरे नहीं रहे, वकील साहब," जग्गू ने कहा, और उसकी आवाज़ अब काँप रही थी, "पर ये सच मेरा है। जिस रात ये कटे, उस रात मैं भवानी सिंह के साथ था। ठाकुर ने उसके सामने मेरे हाथ कटवाए थे, ताकि भवानी बोले — कि देख, तेरे आदमी का क्या हाल करूँगा।"
अदालत में एक आवाज़ उठी। जज साहिबा ने हथौड़ा मारा। "चुप।"
शास्त्री साहब ने काग़ज़ों की तरफ़ इशारा किया। "आपने ठाकुर महेंद्र सिंह पर गंभीर आरोप लगाए हैं। क्या आपके पास इन आरोपों के सिवाय कुछ और है?"
जग्गू ने धीरे से कहा, "मेरे हाथ। और उस रात का चंदन का तेल, जो ठाकुर की कलाई पर लगा था। जब उसने मेरे हाथ कटवाए, तब मैंने उसकी कलाई पकड़ी थी। उसके हाथ से चंदन की गंध आ रही थी। वो गंध मुझे आज भी याद है।"
शास्त्री साहब कुछ कहने ही वाले थे कि मीरा खड़ी हो गईं।
"जज साहिबा," उन्होंने कहा, "मेरे पास काग़ज़ों की एक फाइल है। इसमें बीस साल पहले की ज़मीन की रजिस्ट्री है, जिस पर दयाराम के हस्ताक्षर हैं — जो अब खुद मुंशीजी हैं और जिन्हें पुलिस ने गिरफ़्तार किया है। इसमें भवानी सिंह की डायरी के पन्नों की नकल है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि उनके भाई ने अखाड़ा माँगा और पानी में ज़हर देकर पहलवानों के पैर बेकार किए। और इसमें वो रसीद है जो ठाकुर ने बीस साल पहले अखाड़े के पैसे की दी थी, जिस पर उसका अंगूठा है।"
वो फाइल लेकर जज की मेज़ तक गईं। उनके कदम साफ़ सुनाई दे रहे थे।
जज साहिबा ने फाइल खोली। उन्होंने एक पन्ना पलटा, दूसरा, तीसरा। उनका चेहरा कुछ नहीं बोल रहा था। फिर वो रुकीं और जग्गू की तरफ़ देखा।
"गवाह," उन्होंने कहा, "आपने कहा कि उस रात आप भवानी सिंह के साथ थे। और क्या देखा?"
जग्गू की आँखों से पानी बह रहा था, पर आवाज़ साफ़ थी। "मैंने देखा कि ठाकुर ने भवानी को एक काग़ज़ दिया — लिखने के लिए। भवानी ने मना किया। तो ठाकुर ने मेरे हाथ कटवा दिए। फिर भवानी ने काग़ज़ लिया, और उस पर लिखा — मुझे नहीं पता था क्या लिखा। पर ठाकुर ने उसे पढ़कर मुस्कुराकर अपनी जेब में रख लिया। और कहा, 'अब ये तेरा हाथ लगा काग़ज़, तेरे बेटे को मारेगा।'"
मेरी रीढ़ में ठंडक दौड़ गई। मैंने पीछे मुड़कर ठाकुर को देखा। वो मुस्कुरा रहा था, पर उसकी मुस्कान अब फीकी पड़ने लगी थी।
"जज साहिबा," शास्त्री साहब ने अपनी आवाज़ ऊँची की, "ये गवाह अपनी हालत से जूझ रहा है। इसकी कोई गवाही नहीं मानी जानी चाहिए। ये आदमी बीमार है।"
जग्गू ने धीरे से सिर हिलाया। "बीमार हूँ, वकील साहब। पर पागल नहीं। और मेरे हाथ — जो कटे हैं — वो मेरी गवाही हैं। इन्हें कोई झूठा नहीं बना सकता।"
जज साहिबा ने काग़ज़ देखे, फिर जग्गू को, फिर ठाकुर को। अदालत में सन्नाटा था। मैंने अपने पीछे की तरफ़ देखा। भीड़ में मेरी माँ खड़ी थी — सिर पर सफ़ेद चोटी, माथे पर हल्दी का टीका जो उसने अभी-अभी लगाया था। उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर वो रोते हुए भी मुस्कुरा रही थी। गुड़िया उसका हाथ पकड़े हुए थी, और उसके होंठ फुसफुसा रहे थे — शायद "भैया, तुम जीतोगे।"
तभी दरवाज़े पर हलचल हुई। किसी ने धक्का दिया और अंदर आया — करण सिंह, अपने पाँच आदमियों के साथ। फ्रेंडली सिंह के बेटे, जो पुल पर हमारे साथ थे।
"जज साहिबा," करण ने कहा, "मैं भी एक गवाह हूँ। मेरे पिता फ्रेंडली सिंह ने बीस साल पहले ठाकुर के लिए काम किया था। और उन्होंने मरने से पहले मुझे एक चिट्ठी दी थी, जिसमें ठाकुर के सारे काम लिखे हैं। मैं उसे अब अदालत में देना चाहता हूँ।"
अदालत में फुसफुसाहट फैल गई।
जज साहिबा ने करण की तरफ़ देखा और कहा, "लाइए।"
करण आगे बढ़ा और एक मुड़ी हुई पीली चिट्ठी जज की मेज़ पर रख दी। जज ने उसे खोला। उनकी आँखें पन्नों पर दौड़ीं। और फिर उन्होंने सिर उठाकर ठाकुर की तरफ़ देखा।
"ठाकुर महेंद्र सिंह," जज साहिबा ने कहा, "आपको इस अदालत में सबूत पेश करने का मौका दिया जाता है। आपके वकील कुछ कहना चाहेंगे?"
शास्त्री साहब उठे। उनका गला सूख रहा था, ये उनकी आवाज़ से साफ़ पता चल रहा था। "जज साहिबा, हम… हमें इन काग़ज़ों की जाँच का मौका चाहिए। ये काग़ज़ पुराने हैं, जाली हो सकते हैं—"
"ये काग़ज़ साफ़ हैं," जज साहिबा ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो अब तक नहीं थी। "मैंने खुद इनके हस्ताक्षर और मुहर देखे हैं। ये बीस साल पुराने असली काग़ज़ हैं।"
फिर उन्होंने ठाकुर की तरफ़ देखा। ठाकुर मुस्कुराया। और उस मुस्कुराहट में वो घमंड था जो बीस साल से पल रहा था। उसने अपने वकील की तरफ़ देखा, और धीरे से सिर हिलाया — जैसे कह रहा हो, "अब देखते हैं।"
शास्त्री साहब ने अपना गला साफ़ किया और बोले, "जज साहिबा, इस गवाह जग्गू का कोई भरोसा नहीं। ये मानसिक रूप से अस्वस्थ है। और ये काग़ज़ जो पेश किए गए हैं, इनके बारे में मैं एक बात कहना चाहूँगा — क्या कोई साबित कर सकता है कि ये भवानी सिंह के ही लिखे हैं? कोई हस्ताक्षर विशेषज्ञ? कोई गवाह?"
अदालत में खामोशी छा गई।
तभी मेरी माँ आगे बढ़ीं।
"जज साहिबा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ जितनी साफ़ थी उतनी ही धीमी, "मैं गवाही देना चाहती हूँ।"
जज साहिबा ने उन्हें देखा। "आप कौन हैं?"
"मैं सरस्वती हूँ। भवानी सिंह की… भवानी सिंह की बहन। और वीर सिंह की माँ।"
अदालत में सन्नाटा और गहरा हो गया। मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनके हाथ काँप रहे थे, पर उनकी आँखें स्थिर थीं।
"मैं बीस साल से चुप हूँ," माँ ने कहा, "क्योंकि मुझे डराया गया था। कि अगर मैं बोली, तो मेरे बच्चे नहीं रहेंगे। पर आज मेरा बेटा यहाँ खड़ा है, और जग्गू भाई के हाथ कटे पड़े हैं, और मैं और चुप नहीं रह सकती।"
वो रुकीं। उन्होंने ठाकुर की तरफ़ देखा, फिर जज की तरफ़।
"जो काग़ज़ भवानी ने लिखा था, वो मैंने अपनी आँखों से देखा है। और जो काग़ज़ भवानी ने उस रात ठाकुर के डर से लिखा था, वो भी मैंने देखा है। क्योंकि वो काग़ज़ मेरे पास है।"
अदालत में हलचल मच गई।
"क्या?" शास्त्री साहब चीखे।
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