Spirit of a Fighter1132 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1132

7 min read November 5, 2026

"ये मैंने नहीं दिया," उन्होंने कहा। "ये तुम्हें किसी और ने दिया। समझे?"

"सर…"

"सुनो," उन्होंने मेरी तरफ़ झुककर कहा। "उस अदालत के पीछे एक गली है। उसमें एक पुराना दरवाज़ा है जिस पर पीली घंटी लगी है। वहाँ जो बैठा है, वो आज सुनवाई में काम आएगा। पर तुम्हें उसे पहले जानना होगा। ये पता वही है।"

"आप अंदर क्यों नहीं चलते?"

शर्मा हँसे। वो हँसी कड़वी थी।

"क्योंकि मैं एक बार अंदर गया था, और मैंने अपनी नौकरी गँवा दी। अब मैंने दोबारा नौकरी पाई है। पर तुम्हारे पास अभी भी कुछ बचा है — तुम्हारी हिम्मत। और वो मेरे पास नहीं है।"

वो पलटे और चले गए। उनके सिपाही भी उनके पीछे चले गए। जाते-जाते एक सिपाही ने पीछे मुड़कर मुझे देखा, और उसकी आँखों में कुछ था — शायद शर्म। शायद हिम्मत जो उसमें अभी बाकी थी।

मैं पर्ची लेकर लौटा। सबने मेरी तरफ़ देखा।

"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।

"शर्मा साहब हट गए," मैंने कहा। "केस से। ऊपर से हुक्म आया।"

"तो अब?" टिंकू ने कहा। "केस कौन लड़ेगा?"

मैंने जेब से पर्ची निकाली और खोली। छोटी-सी पर्ची थी, पेंसिल से लिखी। एक पता था, बस एक पता।

टिंकू ने पर्ची पर नज़र डाली। उसकी आँखें बड़ी हुईं।

"अरे," वो बोला, "ये पता तो उसी अदालत के पीछे वाली गली का है। मैं वहाँ एक बार मिठाई लेकर गया था। वहाँ एक बूढ़ा वकील रहता है जिसके पास कोई केस नहीं आता।"

"क्यों?" मीरा ने पूछा।

"क्योंकि," टिंकू ने धीरे से कहा, "वो बीस साल पहले ठाकुर के खिलाफ़ लड़ा था। और हार गया था। तब से उसे कोई केस नहीं मिलता। पर वो आज भी उसी गली में बैठता है, और हर सुबह काग़ज़ पढ़ता है।"

कालू काका ने अचानक अपना सिर उठाया, जैसे कुछ याद आया हो।

"वकील दयानाथ," उन्होंने कहा। "क्या तुम उसी की बात कर रहे हो?"

"हाँ काका," टिंकू ने कहा। "वही।"

कालू काका की आँखों में कुछ चमका।

"अरे," उन्होंने कहा। "वो तो भवानी सिंह का दोस्त था। भवानी जब मरा था, तब यही दयानाथ उसकी लाश के पास खड़ा था और रो रहा था। उसने कहा था — 'मैं इस केस को ज़िंदा रखूँगा, चाहे मुझे अपनी सारी दौलत लगानी पड़े।'"

मैंने सबकी तरफ़ देखा।

"तो चलो," मैंने कहा। "पहले वकील साहब, फिर अदालत।"

"और जग्गू?" मीरा ने कहा। "उसे अस्पताल ले जाना है।"

"उसे साथ ले चलते हैं," मैंने कहा। "अदालत के पास एक सरकारी अस्पताल है। वहाँ उसे डॉक्टर के पास छोड़ देंगे। और जग्गू, तुम गवाही के वक़्त तक यहीं रुकोगे।"

जग्गू ने धीरे से सिर हिलाया। उसके होंठ हिले — "बस मेरी चंपा…"

"याद है मुझे," मैंने कहा।

हम चले। मीरा और टिंकू ने जग्गू को सहारा दिया। कालू काका आगे-आगे लाठी टेकते चले। सुबह की धूप अब तेज़ हो रही थी, और गाँव के लोग दरवाज़ों से झाँकने लगे थे।

रास्ते में सुक्खी बुआ मिलीं। उनके हाथ में पान का बीड़ा था और चेहरे पर वो चमक जो हमेशा किसी नई बात पर होती थी।

"अरे वीर," उन्होंने दूर से ही आवाज़ लगाई, "मैंने तो सुना है कि जग्गू को कुएँ में डाल दिया! क्या सच है? और ये बताओ, तुम्हारी माँ और गुड़िया कहाँ हैं? कल से नहीं दिखीं!"

मैंने कुछ कहा नहीं। सुक्खी बुआ ने अपना बीड़ा तोड़ा और मेरे साथ चलने लगीं।

"मैं तो कहती हूँ, वीर, तुम ठाकुर से बैर मत लो। वो आदमी नहीं, गुड़ का लड्डू है बाहर से, और अंदर से ज़हर।"

"बुआ," मैंने कहा, "आप घर जाइए। मेरी माँ और गुड़िया कल रात से हवेली में हैं। ठीक हैं।"

सुक्खी बुआ रुक गईं। उनके हाथ से बीड़ा गिर गया।

"हवेली में?" उन्होंने कहा। "वो जगह तो…"

"क्या?" मीरा ने कहा।

"वो जगह," सुक्खी बुआ ने धीरे से कहा, "बीस साल से उजाड़ है, कहते हैं। पर मैंने सुना है कि पिछले कुछ दिनों से वहाँ रोशनी दिखती है। रात को। और कोई बजाता है घंटी, बहुत धीमी। मैंने तो सुना है, मैं खुद नहीं गई।"

मेरे अंदर कुछ सरका। घंटी। वो पीली घंटी वाला दरवाज़ा, जिसका ज़िक्र शर्मा साहब ने किया था।

क्या हवेली और उस गली का कोई रिश्ता था?

मैंने सुक्खी बुआ को कुछ नहीं बताया।

"आप घर जाइए," मैंने दोहराया। "मैं आकर सब बताऊँगा।"

हम आगे बढ़े। रास्ते में मीरा मेरे करीब आई।

"वीर," उसने धीरे से कहा, "तुम्हारी आँखों में कुछ है। क्या बात है?"

"घंटी," मैंने कहा। "शर्मा साहब ने कहा कि उस गली के दरवाज़े पर पीली घंटी है। और सुक्खी बुआ कहती हैं कि हवेली से घंटी की आवाज़ आती है।"

मीरा रुक गई। उसकी आँखों में वो चमक आई जो तब आती थी जब वो कुछ दो जोड़ रही होती थी।

"मतलब हवेली और वो गली जुड़ी हैं," उसने कहा। "शायद ज़मीन के नीचे से।"

"शायद," मैंने कहा। "पर अभी वकील साहब ज़रूरी हैं।"

हम शहर की तरफ़ बढ़े। बैलगाड़ी मिली, और सब उस पर बैठ गए। जग्गू बीच में लेटा था, उसका सिर मीरा की गोद में था। टिंकू ने अपनी टोपी उतारकर जग्गू के सिर के नीचे रख दी थी।

रास्ते में जग्गू ने कुछ कहा, बहुत धीमे से। मैंने कान लगाया।

"बेटा," उसने कहा, "जब मैं कुएँ में था, तो मुझे नीचे कुछ दिखा।"

"क्या?"

"पानी में एक दरवाज़ा था। लोहे का। पानी के नीचे। और उस पर भी वही निशान था — जो तुम्हारी अंगूठी पर है।"

मेरे हाथ रुक गए। मैंने अपनी जेब से वो चाँदी की अंगूठी निकाली जो जगत सिंह ने दी थी। उस पर बाहरी पानी वाले आदमी का निशान था।

"तुमने ठीक देखा?" मैंने पूछा।

"मैं अंधा नहीं हूँ, बेटा," जग्गू ने कहा। "डर के मारे आँखें बंद थीं, पर जब पानी में गया, तो खुल गईं। दरवाज़ा वहीं है, कुएँ के नीचे। और उस पर लिखा है — कुछ लिखा है।"

"क्या लिखा है?"

"मैं पढ़ नहीं सका," उसने कहा। "पर वो लिखाई वैसी ही थी जैसी तुम्हारे पापा की है।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने भी सुना था। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"वीर," उसने धीरे से कहा, "अगर कुएँ के नीचे दरवाज़ा है, तो शायद वहीं से सुरंग उस गली तक जाती है।"

"और शायद," मैंने कहा, "वहीं से वो कमरा भी खुलता है जो बीस साल से बंद है।"

टिंकू ने बीच में टोका। "मतलब हमें अदालत के बाद कुएँ में उतरना पड़ेगा?"

"हाँ," मैंने कहा।

टिंकू ने एक गहरी साँस ली। "मुझे पता था। मुझे हमेशा पता होता है। और मैं हमेशा आता हूँ। ये मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी है — कभी मना नहीं कर पाता।"

कालू काका हँसे। पहली बार उस दिन किसी ने हँसा।

शहर पहुँचते-पहुँचते दोपहर हो गई। सरकारी अस्पताल के बाहर हमने जग्गू को डॉक्टर के हवाले किया। डॉक्टर ने उसकी कलाइयाँ देखीं और कहा — "इसे ज़हर दिया गया है, पर बहुत कम। अगर एक घंटा और देर होती, तो ये नहीं बचता।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने आँखें नीची कर लीं। उसके काढ़े ने जग्गू को बचाया था।

"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "इसे अदालत ले जाना है। गवाही के लिए।"

डॉक्टर ने मेरी तरफ़ देखा, फिर जग्गू की तरफ़।

"ये इतनी दूर नहीं चल सकता," उसने कहा।

जग्गू ने अचानक अपना सिर उठाया। "मैं चलूँगा," उसने कहा। "गाड़ी में। बस ले चलो।"

डॉक्टर मुस्कुराया। "ठीक है। पर मैं एक नर्स साथ भेजूँगा।"

हम अदालत की तरफ़ बढ़े। जग्गू को एक छोटी बैलगाड़ी में लिटाया, और नर्स उसके पास बैठ गई।

अदालत के पिछले हिस्से में वो गली थी। पतली, गीली, दोनों तरफ़ ऊँची दीवारें। गली के आख़िर में एक पुराना दरवाज़ा था, जिस पर पीली घंटी लटकी थी — जंग लगी, पर साफ़।

मैंने घंटी बजाई।

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