Spirit of a Fighter – Chapter 1131
"वो… वो कह रहे थे कि कोई उनसे लिखवा सकता है। मतलब कोई ऐसा है जो उनके पास जा सकता है। कोई ऐसा है जिसे पापा डरते हैं या…"
"या जिससे पापा खुद डरते हैं," मैंने कहा। "क्योंकि अगर कोई उन्हें धमका सकता है, तो पापा ने उसे कभी किसी को बताया क्यों नहीं?"
कालू काका ने अचानक अपना सिर उठाया।
"क्योंकि," उन्होंने धीरे से कहा, "वो आदमी रणवीर सिंह का अपना हो सकता है।"
हम सब उनकी तरफ़ देखने लगे।
"काका, क्या कह रहे हो?" मैंने पूछा।
कालू काका ने जग्गू की बेबस आँखों की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"बेटा, बीस साल पहले जब भवानी सिंह मरे, तो उनके साथ जो लोग थे, उनमें एक आदमी ऐसा था जिसे किसी ने नाम से नहीं बुलाया। सब उसे 'चाचा' कहते थे। वो भवानी का भाई था। और वो इस हवेली में रहता था। उसी कमरे में जहाँ आज भैरव रहता है।"
मेरी साँस रुक गई।
"भवानी का भाई?" मैंने कहा। "मतलब… मेरा चाचा?"
"हाँ," कालू काका ने कहा। "और वो आज भी ज़िंदा है।"
हवा रुक गई। पक्षियों की आवाज़ भी एक पल के लिए बंद हो गई।
"कहाँ?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ फट रही थी।
कालू काका ने धीरे से अपना हाथ उठाया और हवेली की तरफ़ इशारा किया।
"वहीं," उन्होंने कहा। "हवेली के उस कमरे में जो बीस साल से बंद है। जिसकी चाबी भैरव के पास थी। और अब…"
उन्होंने रुककर गला साफ़ किया।
"और अब वो चाबी किसके पास है, ये मुझे नहीं पता।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा। और फिर हम दोनों ने एक साथ हवेली की तरफ़ देखा।
उसी पल, हवेली के उस बंद कमरे की खिड़की पर, पर्दा हिला।
बस एक पल के लिए। फिर रुक गया।
मेरी नाक में वो गंध फिर आई — तंबाकू, गुड़, और उसके नीचे चंदन।
मैंने अपनी जेब से वो पर्ची निकाली और उसे मुट्ठी में भींच लिया।
"चलो," मैंने कहा। "अब वो कमरा खुलेगा।"
॥
"अब वो कमरा खुलेगा," मैंने कहा, पर मेरे पैर वहीं जमे रहे।
कालू काका ने मेरा कंधा पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"बेटा, सोच-समझकर। जल्दबाज़ी में जो कमरा बीस साल से बंद है, वो अचानक खोल देना अच्छा नहीं। पहले जग्गू को देख लो।"
मैंने कुएँ की तरफ़ देखा। जग्गू अब भी वहीं पड़ा था, उसकी साँसें छोटी-छोटी चल रही थीं। उसके बिना हाथों की कलाइयाँ रस्सी से छिल गई थीं, और उसकी आँखों में वो डर अभी भी बैठा था जो कुएँ में डालने से आया था।
मैं उसके पास घुटनों के बल बैठ गया।
"जग्गू काका, सुनो। मैं कुछ पूछूँगा। तुम बस हाँ या ना में जवाब देना, ताकि तुम्हारी ताकत बची रहे।"
उसने धीरे से आँखें खोलीं।
"पूछो, बेटा," उसकी आवाज़ कुएँ के पानी जैसी थी — गीली, भारी।
"तुम्हें कुएँ में कितने आदमी लेकर आए?"
उसने होंठ हिलाए। मीरा ने उसके मुँह पर पानी की बूँदें डालीं। उसने घूँट भरा, फिर बोला।
"चार।"
"चार," मैंने दोहराया। "किसी की कुछ पहचान? कोई निशान?"
जग्गू की आँखें छत की तरफ़ गईं, जैसे याद कर रहा हो।
"सबके मुँह पर काला कपड़ा था। आवाज़ें बदली हुई थीं। पर…" उसने रुककर साँस ली। "पर एक की कलाई पर चाँदी की चेन थी। जब वो मुझे उठा रहा था, तो चेन मेरे कान से टकराई। ठंडी थी।"
"और कुछ?"
"उसने मेरे कान में मुँह लगाकर कहा — 'बोल देना, अदालत में जाने का नतीजा यही है।' फिर हँसा, और मुझे कुएँ में धकेल दिया।"
मेरे अंदर कुछ जम गया।
"चाँदी की चेन," मीरा ने धीरे से कहा। "ये ठाकुर के आदमियों का शौक है।"
"हाँ," मैंने कहा। "पर ठाकुर तो जेल में है।"
कालू काका ने अचानक अपना हाथ मेरे कंधे से हटा लिया।
"तो मतलब उसका कोई अपना अभी भी बाहर घूम रहा है," उन्होंने कहा। "और वो जानता है कि जग्गू अदालत में क्या बोलेगा।"
मीरा ने अपना बैग खोला। उसमें से साफ़ कपड़े की पट्टियाँ निकालीं और जग्गू की कलाइयों पर लपेटने लगी। उसके हाथ काँप रहे थे, पर काम में जुटे थे।
"वीर," उसने मेरी तरफ़ देखे बिना कहा, "इसे अस्पताल ले जाना होगा। इतना ज़हर शरीर में नहीं रुक सकता।"
"अदालत आज ही है," मैंने कहा। "अगर ये नहीं गया, तो ठाकुर जीत जाएगा। और अगर ठाकुर जीता, तो जग्गू भी नहीं बचेगा।"
मीरा ने पट्टी बाँधते हुए मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में गुस्सा था, पर उसके नीचे कुछ और भी था — थकान। वो भी दो रातों से नहीं सोई थी।
"तुम्हें पता है, अगर इसे कुछ हो गया, तो तुम खुद को कभी माफ़ नहीं करोगे?"
"पता है," मैंने कहा।
तभी जग्गू ने अपना बिना हाथ वाला हाथ उठाया। वो कटा हुआ था, फिर भी उसने मेरी कलाई पकड़ने की कोशिश की। मैंने अपना हाथ उसकी बाँह के नीचे रख दिया।
"बेटा," उसकी आवाज़ भर्राई हुई थी। "मैं चलूँगा। अदालत चलूँगा। बस एक बात का वादा करो।"
"कहो।"
"मेरी चंपा और बच्चे। वो शहर के किनारे भट्ठे की बस्ती में हैं। अगर मुझे कुछ हो जाए, तो उन्हें कुछ न हो। वो मेरी जान से ज़्यादा हैं, बेटा।"
उसकी आँखों से पानी बह रहा था। वो रो नहीं रहा था, बस उसकी आँखें बह रही थीं, जैसे कुओं में पानी अपने आप चढ़ आता है।
मैंने उसके कटे हाथों को अपने दोनों हाथों में भर लिया। वो ठंडे थे, जैसे किसी बच्चे के हाथ।
"सुनो जग्गू काका," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ कुछ भारी हो गई। "तुम्हारे बच्चे मेरे बच्चे हैं। तुम्हारी चंपा मेरी माँ जैसी है। और ये मैं वादा करता हूँ — उस भगवान की कसम जो मिट्टी में है — कि जब तक मेरे हाथ में ताकत है, तुम्हारे घर को कोई छू नहीं सकता।"
जग्गू ने मेरे हाथ चूमने की कोशिश की, पर उसके हाथ नहीं थे। वो बस अपना चेहरा मेरे हाथों पर रख कर रोने लगा।
टिंकू कुछ दूर खड़ा था। मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा सपाट था, पर उसकी आँखें भरी हुई थीं। उसने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से सिर हिलाया। मतलब — मैं तुम्हारे साथ हूँ।
तभी हवेली के गेट की तरफ़ से पैरों की आवाज़ आई। सबने सिर उठाया।
इंस्पेक्टर शर्मा आ रहे थे। उनके पीछे दो सिपाही थे, पर उनके चेहरे पर वो बात नहीं थी जो पहले थी। शर्मा के चश्मे पर धूल थी, और उनकी कमीज़ की कालर उलटी थी — जैसे वो भागकर आए हों।
"वीर सिंह," उन्होंने दूर से ही कहा। "मुझे तुमसे बात करनी है। अकेले।"
मैं उठा। मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी।
"मैं साथ चलूँगी," वो बोली।
"नहीं," शर्मा ने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा था जो मैंने पहले नहीं सुना था — मजबूरी। "ये अकेले की बात है।"
मैंने मीरा के हाथ पर अपना हाथ रखा।
"दो मिनट," मैंने कहा।
मैं शर्मा के साथ हवेली की दीवार के पास गया, जहाँ कोई नहीं था। वो रुके, चारों तरफ़ देखा, फिर मेरे करीब आए।
"मुझे ऊपर से हुक्म मिला है," उन्होंने धीरे से कहा, जैसे दीवारों से भी डर रहे हों। "कि मैं इस केस से हट जाऊँ। आज से।"
मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई।
"किसने दिया हुक्म?"
"ये नहीं बता सकता," उन्होंने कहा। "पर इतना बता सकता हूँ — वो आदमी बहुत ऊपर बैठा है। मेरी नौकरी, मेरा घर, मेरे बच्चों की पढ़ाई — सब उसके हाथ में है।"
मैंने उनकी आँखों में देखा। वो झूठ नहीं बोल रहे थे। उनकी आँखों के नीचे काला पड़ा था और उनके होंठ सूखे थे।
"तो आप हट जाइए, सर," मैंने कहा। "पर सच नहीं हटेगा। सच आज भी वहीं रहेगा, जहाँ वो बीस साल से है।"
शर्मा ने मेरी तरफ़ देखा। कुछ पल के लिए वो चुप रहे, फिर उन्होंने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला। उसे मेरी जेब में खोंस दिया, इतनी जल्दी से कि मुझे लगा कुछ हुआ ही नहीं।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno