Spirit of a Fighter1130 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1130

7 min read November 5, 2026

"इनके हाथ बँधे हैं," टिंकू की आवाज़ आई, और उसमें डर के साथ-साथ कुछ और था — जैसे उसने कुछ ऐसा देखा हो जो उसकी समझ से बाहर हो। "और ये बोल नहीं पा रहे। इनकी जीभ… इनकी जीभ पर कुछ है। भाई, ये कुछ कहना चाहते हैं पर आवाज़ नहीं निकल रही।"

"मैं आ रहा हूँ," मैंने कहा, और मैं रस्सी पर झुक गया।

"रुक!" टिंकू चिल्लाया। "शर्त याद है? तू नीचे मत आ। यहाँ और जगह नहीं है। इतनी तंग है कि मैं मुश्किल से खड़ा हूँ। तू आएगा तो हम दोनों फँस जाएँगे।"

मैं रुक गया। मेरे हाथ रस्सी पर जम गए।

"तो क्या करूँ?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ टूट रही थी।

"मैं जग्गू काका को ऊपर भेजता हूँ," टिंकू ने कहा। "रस्सी को उनके कमर पर बाँध रहा हूँ। तुम लोग खींचना। मैं नीचे रुकूँगा।"

"नहीं। पहले तू ऊपर आ।"

"भाई, बहस मत कर। ये बूढ़े आदमी हैं और इनकी हालत खराब है। मैं ठीक हूँ। मुझे कुछ नहीं होगा। खींच!"

मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर उन्होंने सिर हिलाया।

हमने खींचा।

रस्सी भारी थी, और मेरी हथेलियों पर छाले फूटने लगे, पर हम खींचते रहे। धीरे-धीरे, एक-एक इंच, जग्गू का शरीर ऊपर आने लगा। पहले उसका सिर दिखा — सफ़ेद बाल, बंद आँखें — फिर उसके कंधे, और फिर उसका बँधा शरीर।

हमने उसे कुएँ के किनारे पर लिटाया। उसके हाथ रस्सी से बँधे थे और उसके मुँह में कपड़ा ठुँसा हुआ था।

मीरा तुरंत उसके पास घुटनों के बल बैठ गई। उसने कपड़ा निकाला और उसकी नाड़ी टटोली।

"साँस चल रही है," उसने कहा। "धीमी है, पर चल रही है। इसे ताज़ी हवा चाहिए।"

मैंने कुएँ में झाँका।

"टिंकू! जग्गू काका ऊपर हैं! अब तू आ!"

नीचे से जवाब नहीं आया।

"टिंकू!"

फिर आवाज़ आई, पर वो अजीब थी, धीमी, जैसे वो कुछ देख रहा हो।

"भाई… यहाँ दीवार पर… दीवार पर कुछ लिखा है।"

"क्या लिखा है?"

"गीली मिट्टी से लिखा है… बिल्कुल ताज़ा। अभी-अभी किसी ने लिखा है।"

मेरी साँस रुक गई।

"क्या लिखा है, टिंकू?"

नीचे एक पल की चुप्पी छाई। फिर टिंकू की आवाज़ आई, और इस बार उसमें वो हँसी नहीं थी, वो बड़ी-बड़ी बातें नहीं थीं। सिर्फ़ डर था।

"भाई… यहाँ लिखा है — अगली बार तेरी माँ।"

मैं वहीं जम गया।

कुएँ की दीवार, गीली मिट्टी, ताज़ा लिखाई। किसी ने अभी-अभी लिखा है, और वो कुछ मिनट पहले ही नीचे था — जब हम ऊपर थे, जब हम रस्सी खींच रहे थे। वो हमारे साथ उसी कुएँ में था?

या वो किसी और रास्ते से गया?

मैंने पलटकर हवेली की तरफ़ देखा। टूटी दीवारें, गिरा हुआ मलबा, खाली आँगन। कोई नहीं दिख रहा था। पर हवा में एक गंध थी — चंदन और कपूर, और उसके नीचे वो मीठी बासी गुड़ जैसी बू।

"मीरा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ कर्कश थी। "जग्गू को लेकर हवेली के सामने चलो। यहाँ मत रुको।"

"तुम कहाँ जा रहे हो?"

"टिंकू को निकालने।"

मैंने रस्सी पकड़ी और कुएँ के घेरे पर पैर रखा।

"वीर, तुम्हारे हाथ…"

"अब नहीं काँप रहे," मैंने कहा, और मैं सही था। डर ने कंपकंपी छीन ली थी और उसकी जगह कुछ ठंडा, सख़्त जम गया था।

मैं नीचे उतरने लगा। पत्थर की सीढ़ियाँ दीवार में बनी थीं, हर सीढ़ी पर काई थी और हर सीढ़ी पर पानी की बूँदें टपक रही थीं। नीचे जैसे-जैसे गया, हवा भारी होती गई, और मेरी नाक में गंध घुलती गई — चंदन, कपूर, और कुछ और भी। कुछ जला हुआ। जैसे कोई काग़ज़ जलाया गया हो।

आधे रास्ते पर मुझे टिंकू की मोमबत्ती की रोशनी दिखी।

वो दीवार के सहारे खड़ा था, मोमबत्ती उसके हाथ में काँप रही थी, और उसकी आँखें दीवार पर टिकी थीं।

"टिंकू," मैंने कहा।

वो पलटा, और उसके चेहरे पर पहले राहत आई, फिर वो फिर से दीवार की तरफ़ देखने लगा।

"देख," उसने धीरे से कहा, और मोमबत्ती दीवार की तरफ़ की।

मैंने देखा। गीली मिट्टी से लिखा था, बड़े अक्षरों में, और मिट्टी अभी भी गीली थी — "अगली बार तेरी माँ।"

और उसके नीचे, छोटे अक्षरों में, कुछ और।

"ये क्या है?" मैंने कहा, और मैं पास गया।

"ये लिखाई…" टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ फुसफुसाहट थी। "भाई, ये लिखाई तो…"

मैंने उस छोटी लिखाई को देखा। उभरी हुई, सँभालकर लिखी हुई, हर अक्षर के बीच एक जैसा अंतर।

मेरा दिल जम गया।

"ये वही लिखाई है," मैंने कहा। "जो पर्ची के पीछे थी।"

"मतलब ये वो ही आदमी लिख रहा है," टिंकू ने कहा, "जो तेरे पापा की लिखाई की नकल कर रहा है।"

मैंने पास जाकर लिखाई पर उँगली रखी। मिट्टी ठंडी थी, पर उसके नीचे कुछ और था — एक ताज़ा खुरचा हुआ निशान, जैसे किसी ने लिखने के बाद उँगली पोंछी हो।

और उसी जगह पर, मिट्टी के नीचे, एक गंध थी। मैंने अपनी नाक पास ले जाकर सूंघा।

तंबाकू।

और गुड़।

मैंने आँखें बंद कीं। मेरा सिर भारी होने लगा। मेरी नाक में दर्द की एक लकीर दौड़ी — वो लकीर जो मुझे पता थी, जो सूंघने की हद से ज़्यादा सूंघने पर आती थी।

"टिंकू," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ दूर से आ रही थी। "ये गंध मैंने पहले सूंघी है। बहुत पहले।"

"कहाँ?"

"मुझे नहीं पता," मैंने कहा, और मैंने आँखें खोलीं। "पर ये गंध बीस साल पुरानी है। और ये गंध उस आदमी की है जो मेरे पापा के साथ था।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी मोमबत्ती की लौ हिल रही थी।

"भाई," उसने धीरे से कहा, "तेरी नाक से खून आ रहा है।"

मैंने अपनी उँगली होंठ के ऊपर लगाई। खून था। गरम और गाढ़ा।

"कोई बात नहीं," मैंने कहा। "ऊपर चल।"

हम सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। टिंकू आगे, मैं पीछे। मेरी टाँगें भारी थीं और मेरा सिर चकरा रहा था, पर मैं चढ़ता रहा।

जब मैं कुएँ के मुँह पर पहुँचा, तो सूरज पूरा निकल चुका था। रोशनी मेरी आँखों में चुभी और मैं एक पल के लिए अंधा हो गया।

फिर मीरा की आवाज़ आई।

"वीर! तुम्हारी नाक!"

वो दौड़कर आई और उसने अपने दुपट्टे का कोना मेरी नाक पर दबा दिया।

"मैं ठीक हूँ," मैंने कहा।

"तुम ठीक नहीं हो," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में गुस्सा था, पर उसके हाथ नरम थे। "तुम्हारी नाक से खून बह रहा है और तुमने मुझे बताया तक नहीं।"

"मीरा, सुनो।" मैंने उसका हाथ पकड़ा और हटाया। "कुएँ की दीवार पर लिखा है — अगली बार तेरी माँ।"

उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"और वो लिखाई वही है," मैंने कहा, "जो पर्ची के पीछे थी। वही उभरी हुई, वही सँभालकर लिखी।"

मीरा ने एक कदम पीछे हटकर अपना हाथ मुँह पर रख लिया।

"मतलब वो आदमी यहाँ था," उसने कहा।

"कुछ मिनट पहले," मैंने कहा। "जब हम रस्सी खींच रहे थे। जब हमारे हाथ भरे थे।"

कालू काका जग्गू के पास बैठे थे और उनका चेहरा उतरा हुआ था।

"बेटा," उन्होंने कहा, "ये आदमी हमें खेल रहा है। हमें डरा रहा है। और हम डर रहे हैं। यही तो वो चाहता है।"

"हाँ," मैंने कहा। "पर एक बात है।" मैंने सबकी तरफ़ देखा। "ये आदमी जानता है कि हम कहाँ आएँगे। उसने पर्ची छोड़ी, रस्सी बाँधी, जग्गू को कुएँ में डाला। ये सब पहले से सोचा हुआ था। पर उसने एक गलती की।"

"क्या?" मीरा ने कहा।

"उसने सोचा कि हम पर्ची पढ़कर डर जाएँगे और भागेंगे। पर हम आए। और अब हम जानते हैं कि वो पर्ची लिखने वाला और जग्गू को कुएँ में डालने वाला एक ही आदमी है। और ये आदमी हवेली के आसपास ही है। वो दूर नहीं गया हो सकता।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

"मीरा, तुम्हारे पापा ने कहा था — 'अब वो मेरे हाथ से लिखवाएगा।' तुम्हें क्या लगता है, उनका मतलब क्या था?"

मीरा ने सोचा। फिर उसकी आँखें बड़ी हुईं।

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