Spirit of a Fighter1129 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1129

7 min read November 5, 2026

"तू यहाँ कैसे?" मैंने पूछा।

"मैं तुझे छोड़कर कहाँ जाता," उसने कहा, और मेरे पास आकर खड़ा हो गया। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आवाज़ से वो हमेशा वाली हँसी गायब थी। "भाई, सुबह से एक बात सोच रहा हूँ। जग्गू काका की चप्पल पर 'मत आना' किसने लिखा? जग्गू काका खुद तो नहीं लिख सकते — उनके हाथ नहीं हैं। तो जिसने उन्हें कुएँ में बंद किया, उसी ने ये पर्ची उनकी चप्पल में रखी। और वो चाहता था कि हम ये पढ़ें।"

"क्यों चाहता था?" मीरा ने पूछा।

"क्योंकि वो हमें डराना चाहता है," टिंकू ने कहा। "डरा हुआ आदमी गलती करता है।"

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसकी आवाज़ में वो डर अब भी था, पर उसके पीछे कुछ और था — एक ज़िद, जो मैंने उसमें पहले कभी नहीं देखी थी।

"तू ठीक कह रहा है," मैंने कहा।

टिंकू ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर अपनी टोपी ठीक की, जैसे उसे यकीन नहीं आया कि मैंने उसकी बात मान ली।

"अच्छा," वो बोला। "तो अब?"

"अब हवेली," मैंने कहा। "पर्ची में कुआँ लिखा है। जग्गू ने कहा था कि वो कुएँ में बंधा मिला। पर मुझे लगता है वहाँ कुछ और भी है।"

हम चल पड़े। रास्ते में कालू काका जग्गू को सहारा देकर पीछे-पीछे आ रहे थे, और जग्गू के कदम धीरे थे — ज़हर का असर अभी पूरा नहीं उतरा था।

मीरा मेरे साथ-साथ चल रही थी। कुछ देर वो चुप रही, फिर बोली।

"वीर, तुमने कभी मुझे अपने पापा के बारे में पूरा नहीं बताया। शेर सिंह के बारे में।"

मैंने अपनी चाल धीमी की।

"क्या बताऊँ?" मैंने कहा। "मैं खुद अभी जान रहा हूँ। जो मुझे पता था, वो यही था कि वो मरे। बस। माँ कभी बोलती नहीं थीं। गाँव वाले कहते थे कि वो बीमारी से गए।"

"अब?"

मैंने आगे देखा। हवेली की छत सामने पेड़ों के बीच दिख रही थी, टूटी हुई, जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपना सिर उठाने की कोशिश कर रहा हो।

"अब लगता है कि वो सबसे बड़ा सच जानते थे," मैंने कहा। "और उसी सच ने उन्हें मारा। जग्गू ने कहा था कि उन्होंने खुद ज़हर पिया। मतलब उन्हें पता था कि वो बचेंगे नहीं। और उन्होंने चुना कि वो चुप रहकर मरेंगे, ताकि मैं और माँ ज़िंदा रहें।"

मीरा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपना हाथ बढ़ाकर मेरी कलाई पर रख दिया, और एक पल के लिए उसकी उँगलियाँ मेरी नाड़ी पर टिकीं, जैसे वो मेरी धड़कन गिन रही हो।

"तुम्हारे पापा बहादुर थे," वो बोली।

"या डरपोक," मैंने कहा। "मुझे नहीं पता कि कौन सा।"

"दोनों नहीं होते साथ में," उसने कहा। "जो आदमी अपनी जान देकर अपने बेटे को बचाता है, वो बहादुर होता है। बस उस वक़्त उसके पास कोई और रास्ता नहीं था।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। सुबह की रोशनी में उसका चेहरा साफ़ था और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मुझे अजीब तरह से हिम्मत दे रहा था।

हवेली का पिछला हिस्सा पहले से और टूटा हुआ लगा। जो दीवारें कल तक खड़ी थीं, उनमें से एक और गिर गई थी — शायद रात के ठंड में या किसी और वजह से। मलबे के बीच से हम कुएँ तक पहुँचे।

कुआँ वही था। पत्थर की गोल दीवार, ऊपर जंग लगा लोहे का घेरा, और अंदर से आती ठंडी, भीली हवा।

पर आज कुछ बदला हुआ था।

कुएँ के घेरे पर ताज़ा रस्सी के निशान थे। लाल रस्सी। ज़मीन पर रगड़ के काले निशान छूटे थे, और घेरे के पत्थर पर रस्सी की फुँदी अभी भी बँधी थी, जैसे किसी ने जल्दी में खोली हो।

"कोई गया है नीचे," मैंने कहा। "अभी-अभी।"

मैंने कुएँ के मुँह पर झुककर देखा। अंधेरा था, पर उस अंधेरे में एक आवाज़ थी। बहुत हल्की। जैसे कोई कराह रहा हो, या साँस लेने की कोशिश कर रहा हो।

"कोई है नीचे," मीरा ने कहा, और उसने भी सुना।

मैंने रस्सी पकड़ी। रस्सी गीली थी और हाथ में फिसल रही थी, और उस पर उन्नीस-बीस गाँठें थीं, जैसे किसी ने सीढ़ी की तरह बनाई हों।

"मैं नीचे जाता हूँ," मैंने कहा।

मैंने अपना एक पैर कुएँ के घेरे पर रखा, फिर दूसरा।

तभी मेरी कमर पर एक हाथ पड़ा और मुझे ज़ोर से पीछे खींच लिया गया।

मैं लड़खड़ाकर पीछे गिरा और पीछे मुड़कर देखा — टिंकू खड़ा था, उसकी आँखें बड़ी थीं और उसकी साँस फूल रही थी।

"तू पागल है?" वो चिल्लाया। "तू अभी तक काँप रहा है! तेरे हाथ देख!" उसने मेरी कलाई पकड़कर उठाई। "तू अंदर जाएगा और रस्सी छूटेगी और तू गिरेगा और फिर हम क्या करेंगे? तेरी माँ क्या करेगी?"

मैंने अपने हाथ देखे। वो सच में काँप रहे थे। मैंने सुबह से कुछ नहीं खाया था, और पिछली रात सोया नहीं था, और शरीर में जो ताकत बची थी वो भी काँप रही थी।

"तो क्या करें?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में गुस्सा था, पर वो गुस्सा खुद पर था।

टिंकू ने एक लंबी साँस ली। फिर उसने अपनी टोपी उतारी और मेरे हाथ में दे दी।

"पहले मैं जाऊँगा," उसने कहा।

सब चुप हो गए।

"तू?" कालू काका ने कहा। "बेटा, तू तो…"

"मैं जानता हूँ, काका," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो हमेशा वाली बड़ी-बड़ी बातें नहीं थीं। "मैं डरपोक हूँ। मैंने आज तक अखाड़े में कदम नहीं रखा। मैं रोज़ कहता हूँ कल से कसरत शुरू करूंगा और कल कभी नहीं आता। पर भाई, तेरे हाथ काँप रहे हैं और मेरे नहीं। मुझे ऊपर से नीचे जाना है, बस। मुझे लड़ना नहीं है। मैं हल्का हूँ, रस्सी मुझे आसानी से उठा लेगी। और अगर मैं फिसलूँ, तो तू ऊपर से पकड़ेगा।"

मेरे गले में कुछ अटक गया।

"टिंकू…"

"ना, सुन।" उसने अपनी उँगली उठाई। "एक शर्त है। जब मैं नीचे से बोलूँ, तो तू मेरी बात मानेगा। बिना सवाल।"

"क्या शर्त?"

"ये नहीं बताऊँगा," उसने कहा। "मौके पर बताऊँगा।" और फिर उसके चेहरे पर वो पुरानी मुस्कान लौट आई, हल्की-सी, जैसे बारिश के बाद बादल फटने की आवाज़। "और हाँ, अगर मैं नीचे कुछ मीठा देखूँ, तो मेरा हिस्सा।"

मैं हँसा नहीं। पर मेरा गला भर आया और मैंने उसे गले लगा लिया। उसका शरीर पतला था, हड्डियाँ उभरी हुईं, पर उस वक़्त मुझे लगा कि मैं किसी चट्टान को पकड़ रहा हूँ।

"संभलकर," मैंने कहा।

"तू संभल," उसने कहा, और रस्सी पकड़कर कुएँ के घेरे पर चढ़ने लगा।

मीरा ने उसे रोका।

"रुको।" उसने अपना बैग खोला और एक छोटी-सी डिबिया निकाली। "ये लगाओ।"

"क्या है?"

"पुदीना और अदरक का लेप। अगर अंदर बदबू हो या साँस घुटे, तो नाक के नीचे लगाना। और ये लो।" उसने एक छोटी मोमबत्ती और दियासलाई दी। "अंधेरे में बिना रोशनी के मत जाना।"

टिंकू ने सामान लिया, अपनी जेब में रखा, और फिर रस्सी पकड़कर नीचे उतरने लगा।

मैंने रस्सी दोनों हाथों से पकड़ी और अपना पूरा वजन उस पर डाल दिया। कालू काका भी पीछे आकर पकड़ गए। मीरा कुएँ के मुँह पर झुककर ऊपर से देख रही थी।

टिंकू नीचे जाता रहा, और उसकी टोपी मेरे हाथ में थी, और उसकी आवाज़ कुएँ की दीवारों से टकराकर ऊपर आ रही थी।

"अंधेरा है… बहुत अंधेरा… रुको, मेरा पैर कुछ पत्थर पर पड़ा… अरे, ये तो सीढ़ियाँ हैं! भाई, कुएँ में सीढ़ियाँ हैं, पत्थर की! ये दीवार में बनी हैं!"

मेरा दिल ज़ोर से धड़का। "सीढ़ियाँ?"

"हाँ… नीचे तक जाती हैं… दमघोंटू हवा है… पुदीना लगा रहा हूँ… रुको, मोमबत्ती जलाता हूँ…"

एक पल की चुप्पी। फिर मोमबत्ती जलने की आवाज़, और फिर टिंकू की चीख।

"भाई!"

मेरी छाती धक् से रह गई।

"क्या हुआ? टिंकू! बोल!"

"ये… ये जग्गू काका हैं! और… और ये… भाई, यहाँ कोई और भी है! पर…"

"पर क्या?" मैं चिल्लाया। "बोल ना!"

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