Spirit of a Fighter1128 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1128

7 min read November 5, 2026

मैंने काग़ज़ को मोड़ा और अपनी धोती की जेब में रखा।

"जग्गू," मैंने कहा, और नीचे देखा, "तुम अदालत चलोगे?"

जग्गू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर अब भी था, पर उसके नीचे कुछ और भी था।

"मैं बीस साल से डर के साथ जी रहा हूँ," उसने कहा। "अब मैं डर के बिना मरना चाहता हूँ। चलो।"

हम ऊपर आए। आँगन में सूरज पूरा निकल आया था, और उसकी रोशनी में हवेली के टूटे दरवाज़े और गिरी दीवारें और भी पुरानी लग रही थीं।

मैंने जग्गू को कालू काका के सहारे चलाया और कुएँ से दूर ले गया।

"अब क्या?" कालू काका ने पूछा।

"अब अदालत," मैंने कहा। "पर एक काम पहले।" मैंने जग्गू की तरफ़ देखा। "जग्गू, तुमने कहा था कि शेर सिंह की कब्र दरवाज़ा है। उस दरवाज़े के नीचे जो काग़ज़ हैं, वो किस बारे में हैं?"

जग्गू ने एक लंबी साँस ली। "वो काग़ज़ बीस साल पहले के हैं। उनमें उन सब पहलवानों के नाम हैं जिन्हें ज़हर दिया गया। और उनमें एक काग़ज़ ऐसा है जिस पर नंदकिशोर के हस्ताक्षर हैं — जिसमें उसने खुद कबूल किया है कि उसने भवानी को मारने का हुक्म दिया था।"

मेरी साँस रुक गई।

"पर वो काग़ज़ अभी कब्र के नीचे हैं," जग्गू ने कहा। "और अगर हम अदालत जाने से पहले उन्हें निकालने जाएँगे, तो देर हो जाएगी।"

"नहीं," मैंने कहा। "कब्र के नीचे जो है, वो अदालत में काम आएगा। पर पहले हमें अदालत पहुँचना है। वक़्त पर।"

मैंने आसमान की तरफ़ देखा। सूरज ऊपर चढ़ रहा था।

"कालू काका," मैंने कहा, "आप जग्गू को लेकर सीधे अदालत चलिए। मैं एक काम करके आता हूँ।"

"कहाँ?"

मैंने अपनी जेब से वो पर्ची निकाली जो जग्गू की चप्पल से मिली थी — "हवेली। पीछे का कुआँ।"

"ये पर्ची जग्गू ने लिखी थी," मैंने कहा। "पर इसे देखिए — इसके पीछे कुछ लिखा है।"

कालू काका ने पर्ची पलटी। उसके पीछे उभरी हुई लिखाई थी, जैसे किसी ने ऊपर से दबाकर लिखा हो — "मत आना।"

"ये जग्गू की लिखाई नहीं है," कालू काका ने कहा।

"नहीं," मैंने कहा। "ये किसी और की है। और मुझे पता है किसकी।"

मैंने पर्ची अपनी जेब में रखी और हवेली के दरवाज़े की तरफ़ चला।

"काका, आप जग्गू को अदालत ले चलिए। मैं कब्र पर जा रहा हूँ। वो दरवाज़ा आज खुलेगा।"

"अकेले?"

"अकेले नहीं," मैंने कहा, और मुड़कर देखा। "टिंकू की बैलगाड़ी रास्ते में मिलेगी।"

मैं कब्रिस्तान की तरफ़ भागा। रास्ते में मेरी नाक में गंध आई — चंदन, कपूर और वो मीठी बासी गुड़ जैसी बू।

मैं रुका। पलटा।

कोई नहीं था। बस हवा थी, जो पेड़ों के बीच से आ रही थी।

मैंने आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली।

अब वो गंध मेरे चारों तरफ़ थी। और उसके नीचे एक और गंध थी — पुरानी, जानी-पहचानी, जो मैंने बहुत पहले सूंघी थी।

मैंने आँखें खोलीं।

"मीरा?" मैंने धीरे से कहा।

कोई जवाब नहीं आया।

मैंने अपनी जेब से वो पर्ची निकाली और उसे पलटकर देखा। उभरी हुई लिखाई — "मत आना।"

और तभी मुझे याद आया। ये लिखाई मैंने पहले कहीं देखी थी। कहाँ?

मेरा दिल ज़ोर से धड़का।

ये लिखाई उस काग़ज़ पर थी जो मुझे अपनी धोती की जेब में मिला था — "तेरी माँ झूठ बोल रही है।"

मैं वहीं खड़ा रह गया, और मेरे हाथ में पकड़ी पर्ची काँपने लगी।

"ये लिखाई," मैंने धीरे से कहा, "मेरे पापा की है।"

॥

मेरे हाथ में पकड़ी पर्ची काँप रही थी, और मैं उसे रोक नहीं पा रहा था।

"मेरे पापा की लिखाई," मैंने फिर कहा, इस बार धीमे से, खुद को सुनाने के लिए।

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो पुराना डर लौट आया था जो कब्र के पास जाकर छूट गया था।

"बेटा, संभल। सोच-समझकर बोल। शेर सिंह की लिखाई… तूने कब देखी है उनकी लिखाई?"

"धोती की जेब में काग़ज़ मिला था," मैंने कहा। "उस पर लिखा था — तेरी माँ झूठ बोल रही है। उसी लिखाई के निशान इस पर्ची के पीछे हैं। वही उभरे हुए अक्षर। वही 'म' का मोड़।"

कालू काका ने पर्ची मेरे हाथ से ली और दूर करके देखी, जैसे बूढ़ी आँखों को और दूरी चाहिए हो।

"हाँ," उन्होंने धीरे से कहा। "ये शेर सिंह की ही लिखाई है। मैंने उनके हाथ से हिसाब की कॉपी भरी है। ये 'म' ऐसा ही मुड़ता था उनका।"

"पर ये हो कैसे सकता है?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ खुद मेरे कानों में अजीब लगी। "पापा तो…"

मैंने बात पूरी नहीं की। शब्द गले में अटक गए।

तभी पीछे से पैरों की आवाज़ आई। मैं पलटा। मीरा दौड़ती हुई आ रही थी, उसके कंधे का बैग उछल रहा था, और उसके हाथ में एक काग़ज़ था।

"वीर!" वो दूर से ही चिल्लाई। "रुक!"

वो मेरे पास पहुँची और साँस लेने के लिए रुकी। उसके माथे पर पसीना था और सुबह की ठंड में भी उसकी साँस भाप बनकर निकल रही थी।

"क्या हुआ?" मैंने पूछा।

"जग्गू की चप्पल," उसने कहा, और उसने अपने हाथ का काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "मैंने उस पर जो लिखा था, उसे वकील मैडम को दिखाया था। उन्होंने कहा कि ये लिखाई कोई औरत नहीं… कोई मर्द लिख रहा है जो दूसरे की लिखाई की नकल कर रहा है।"

"क्या मतलब?"

मीरा ने काग़ज़ मेरे हाथ से लिया और मेरी पर्ची के साथ रखकर दोनों को एक साथ दिखाया।

"देखो," उसने कहा, और उसकी उँगली दोनों काग़ज़ों पर घूमने लगी। "जग्गू की चप्पल पर लिखी बात — 'हवेली। पीछे का कुआँ' — ये लिखाई सीधी है, हाथ काँपा नहीं। पर पीछे वाली उभरी लिखाई — 'मत आना' — इसमें हर अक्षर के बीच एक जैसा अंतर है। जैसे किसी ने शीशे के नीचे रखकर धीरे-धीरे, बहुत सँभालकर लिखा हो। कोई जल्दी में नहीं था।"

"तो?"

"तो ये लिखने वाला जानता था कि ये लिखाई किसकी लगनी चाहिए," मीरा ने कहा। "ये नकल है, वीर।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। सुबह की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी और उसकी आँखों में वो ज़िद थी जो मुझे पहली बार अखाड़े के फाटक पर दिखी थी, जब उसने मुझे मिट्टी से बाहर धकेला था।

"पर अगर नकल है," मैंने कहा, "तो नकल करने वाले को पापा की लिखाई का नमूना कहाँ से मिला? पापा की लिखाई किसके पास है? माँ के पास? किसी अलमारी में पड़ी कॉपी?"

कालू काका ने अचानक अपना सिर उठाया।

"रुको," उन्होंने कहा। "शेर सिंह की एक कॉपी थी। हिसाब की। छोटी, काली जिल्द वाली। वो…"

वो रुक गए। उनका चेहरा बदल गया।

"वो कहाँ है, काका?" मैंने पूछा।

"वो कॉपी भवानी सिंह के काग़ज़ों के साथ रखी थी," कालू काका ने धीरे से कहा। "तहखाने में। भैरव की अलमारी में।"

मेरा पेट ठंडा हो गया।

"तो जिसने भी ये पर्ची लिखी," मैंने कहा, "उसके हाथ में वो कॉपी है। मतलब वो तहखाने तक पहुँच चुका है।"

मीरा ने अपनी आवाज़ धीमी की।

"वीर, एक बात और।" उसने मेरी आँखों में देखा। "मैंने ये काग़ज़ अपने पिता को भी दिखाया।"

मैं सकपका गया।

"क्यों? उन्हें क्यों घसीटा इसमें? वो व्हीलचेयर पर हैं, मीरा। उनका दिल…"

"मैं जानती हूँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार झिझक आई। "पर जब मैंने उन्हें पर्ची दिखाई, तो उनका हाथ काँपने लगा। और उन्होंने कुछ ऐसा कहा जो मैं समझ नहीं पाई।"

"क्या कहा?"

मीरा ने एक पल रुककर साँस ली।

"उन्होंने कहा — 'अब वो मेरे हाथ से लिखवाएगा।'"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

"लिखवाएगा?" कालू काका ने कहा। "मतलब…"

"मतलब कोई उनकी लिखाई की नकल कर रहा है," टिंकू की आवाज़ पीछे से आई, "या कोई उनसे लिखवा रहा है।"

हम सब पलटे। टिंकू रास्ते के मोड़ पर खड़ा था, उसकी टोपी तिरछी थी और हाथ में एक डंडा था जो उसने कहीं से उठा लिया था।

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