Spirit of a Fighter1127 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1127

7 min read November 5, 2026

मैंने उसे खोला। उस पर सिर्फ़ तीन शब्द लिखे थे — "हवेली। पीछे का कुआँ।"

मेरा चेहरा कड़ा हो गया।

"क्या है?" मीरा ने पूछा।

मैंने पर्ची उसकी तरफ़ बढ़ाई। "हवेली। वही हवेली जहाँ गंगा देवी रहती थीं। जहाँ से माँ और गुड़िया को उठाया गया था। जहाँ नंदकिशोर मिला था।"

मीरा ने पर्ची पढ़ी और उसका चेहरा पत्थर हो गया।

"तो जग्गू वहाँ है?" टिंकू ने पूछा।

"या उसे वहाँ ले जाया गया है," मैंने कहा। "ये पर्ची उसने खुद लिखी है। उसने इसे चप्पल में सिल दिया था ताकि कोई ढूँढ न सके। इसका मतलब वो जानता था कि उसे उठाया जाएगा।"

कालू काका ने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा। "हवेली।" उनकी आवाज़ भारी थी। "फिर वहीं। सब रास्ते वहीं जाकर मिलते हैं।"

मैं कमरे से बाहर आया। बाहर हवा ठंडी थी, पर मेरे अंदर कुछ जल रहा था।

"अदालत कितनी देर में है?" मैंने मीरा से पूछा।

"तीन घंटे," उसने कहा। "अगर हम हवेली जाएँ, तो अदालत नहीं पहुँच पाएँगे।"

"अगर हम अदालत जाएँ, तो जग्गू मर जाएगा," मैंने कहा। "और उसके बिना पापा का दरवाज़ा नहीं खुलेगा।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो ज़िद थी जो मैं पहचानता था — वो ज़िद जो सबूत माँगती है।

"हम दोनों करेंगे," वो बोली। "तुम हवेली जाओ। मैं अदालत जाऊँगी और जज से कहे दूँगी कि गवाह को ख़तरा है। अदालत एक घंटा टाल सकती है।"

"तुम अकेली?"

"मैं अकेली नहीं हूँ।" उसने टिंकू की तरफ़ देखा।

टिंकू घबराया। "मैं? अदालत में? भाई, मैंने कभी जज साहब को सामने से नहीं देखा—"

"तो आज देख ले," मीरा ने कहा। "और अपनी मिठाई की डिब्बी भी ले जा। मैंने कहा था न, जज साहब को भी खिलाना।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया।

"ठीक है," वो बोला, और उसकी आवाज़ में जो काँप रही थी, उसे उसने छिपाने की कोशिश की। "पर भाई, तुम अकेले मत जाना।"

"मैं अकेला नहीं जाऊँगा," मैंने कहा, और कालू काका की तरफ़ देखा।

कालू काका ने लाठी उठाई। "मैं तेरे साथ हूँ, बेटा। बीस साल से उस हवेली में मैंने कदम नहीं रखा। अब वक़्त आ गया है।"

हवेली का पिछला आँगन वैसा ही था जैसा मैंने छोड़ा था — टूटी दीवारें, ऊपर से लटकती लता, और बीच में वो पुराना कुआँ, जिसके चारों तरफ़ पत्थर का चबूतरा बना था।

पर कुएँ का ढक्कन हटा हुआ था।

मैं रुक गया।

"कल तो ये बंद था," मैंने धीरे से कहा।

"अब नहीं है," कालू काका ने कहा। उन्होंने अपनी लाठी से कुएँ की तरफ़ इशारा किया। "देख, रस्सी भी लटक रही है। कोई अंदर गया है।"

मैं कुएँ के पास गया और झुककर देखा। अंदर अँधेरा था, पर नीचे से एक हल्की गरम हवा आ रही थी, और उसमें वही गंध थी — चंदन, तंबाकू, और वो मीठी बासी गुड़ जैसी बू।

"जग्गू नीचे है," मैंने कहा।

"तो चल," कालू काका ने कहा। "पर सुन।" उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा। "नीचे जो भी मिले, चाहे कुछ भी हो, तू मेरी बात मानेगा। ज़्यादा सूंघने की कोशिश मत करना। तेरी नाक आज एक बार खून बहा चुकी है। दूसरी बार नहीं बहेगी।"

मैंने सिर हिलाया।

रस्सी पकड़कर मैं नीचे उतरा। कालू काका मेरे पीछे-पीछे आए, उनकी लाठी हर सीढ़ी पर ठक-ठक कर रही थी। दीवारें गीली थीं, और उन पर काई की परत जमी थी। मेरे हाथ फिसल रहे थे।

नीचे पहुँचकर मैंने पैर ज़मीन पर रखे। यहाँ हवा और भी गरम थी, और गंध और भी तेज़।

"इधर," कालू काका ने कहा, और उन्होंने अपनी लाठी से दाहिनी तरफ़ के अंधेरे कोश को छुआ।

मैं उस तरफ़ बढ़ा। एक दीवार थी, जिस पर कोई बहुत पुरानी लिखाई खुदी हुई थी। मैंने उँगली से उसे छुआ। वो लिखाई ठंडी थी, जैसे अभी-अभी किसी ने उसे पानी से पोंछा हो।

"काका, यहाँ कुछ लिखा है—"

मेरी बात पूरी नहीं हुई। दूसरी तरफ़ से एक आवाज़ आई — धीमी, घुटी हुई, जैसे कोई रो रहा हो पर आवाज़ न निकल रही हो।

"जग्गू?" मैंने आवाज़ दी।

आवाज़ रुक गई।

फिर फुसफुसाहट आई। "वीर… वीर सिंह…"

मैं तेज़ी से उस तरफ़ बढ़ा। कुएँ के नीचे एक छोटा सा तहखाना था, जिसके कोने में जग्गू बैठा था — बाँधा हुआ, मुँह पर कपड़ा, और उसकी बाँहों पर खून के धब्बे।

मैंने कपड़ा खोला। जग्गू ने एक लंबी साँस खींची, जैसे बहुत देर पानी के नीचे रहा हो।

"पानी," उसने कहा।

कालू काका ने अपनी कमर से एक छोटी लोटी निकाली और उसे पानी पिलाया।

जग्गू ने पानी पिया, फिर मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर था, पर उसके नीचे कुछ और भी था — एक अजीब सी जीत।

"तू आ गया," उसने कहा। "मैं जानता था तू आएगा। इसीलिए चप्पल में पर्ची छोड़ी।"

"किसने किया?" मैंने पूछा। "किसने तुम्हें यहाँ लाया?"

जग्गू ने अपना सिर हिलाया। "दो आदमी थे। मुँह पर कपड़ा था। पर जब वो मुझे उठा रहे थे, तब एक की कलाई से मेरा हाथ टकराया।" वो रुका। "उसकी कलाई पर ताबीज़ था। चाँदी का ताबीज़।"

मेरी साँस रुक गई।

"चाँदी का ताबीज़?" कालू काका ने कहा। "वो तो…"

"हाँ," जग्गू ने कहा। "वो नंदकिशोर के आदमियों का निशान है। पर एक बात और थी।"

वो मेरी तरफ़ झुका, जैसे कोई बड़ा राज़ बताने वाला हो।

"उनमें से एक, जो मुझे घसीट रहा था, वो रुका। मैंने उसे कहते सुना — 'बाई साहब का हुक्म है, इसे मारना नहीं। इसे बस रोककर रखना है। अदालत के बाद फ़ैसला होगा।'"

मेरे पैरों के नीचे ज़मीन फिर हिली।

"बाई साहब?" मैंने धीरे से दोहराया।

जग्गू ने सिर हिलाया। "हाँ। और उसकी आवाज़…" वो रुका। "उसकी आवाज़ में गुड़ जैसी मिठास थी। वो औरत थी।"

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनका चेहरा सफ़ेद था।

"गंगा देवी," उन्होंने फुसफुसाया।

मैंने आँखें बंद कीं। गंगा देवी। वो औरत जिसने मुझे भवानी की हड्डियाँ दिखाई थीं। जिसने कहा था "आज सच बाहर आएगा।" जिसने हवेली में माँ और गुड़िया को बंधा देखा था और कुछ नहीं किया था।

"नहीं," मैंने कहा, और अपनी आवाज़ में वो ज़ोर डाला जो मुझमें नहीं था। "गंगा देवी मर चुकी हैं। मैंने उन्हें भट्ठे के पास आख़िरी बार देखा था।"

"तूने देखा था," कालू काका ने कहा। "पर क्या तूने उनकी लाश देखी?"

मैं चुप हो गया।

"मैंने नहीं देखी," कालू काका ने कहा। "बीस साल पहले भी नहीं देखी।"

जग्गू ने मेरी कलाई पकड़ी। "वीर, एक और बात। जब वो मुझे यहाँ ले आए, तो उन्होंने मुझे नीचे उतारने से पहले कुआँ के ढक्कन पर कुछ रखा। मैंने देखा नहीं, पर सुना — काग़ज़ की आवाज़। जैसे कोई लिफ़ाफ़ा रखा गया हो।"

मैंने ऊपर देखा। सीढ़ियों की तरफ़।

"काका, ऊपर देखिए," मैंने कहा।

कालू काका सीढ़ियों पर चढ़े। कुछ देर बाद उनकी आवाज़ आई। "हाँ, बेटा। एक लिफ़ाफ़ा है। तेरे नाम का।"

मैं सीढ़ियों पर चढ़ा। कालू काका के हाथ में एक पीला लिफ़ाफ़ा था, जिस पर मेरा नाम लिखा था — "वीर सिंह को।"

मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक काग़ज़ था, जिस पर साफ़ लिखाई में चार लाइनें थीं।

"तेरे पास दो दिन हैं। पर अब तेरे पास दो दिन नहीं। तेरे पास आज की रात है। जग्गू को अदालत में मत लाना। अगर लाया, तो जो तेरी माँ के साथ हुआ, वो तेरी बहन के साथ होगा। और इस बार तेरी माँ उसे बचाने नहीं आएगी।"

मेरा हाथ काँपा। मैंने काग़ज़ को कसकर पकड़ा।

"क्या लिखा है?" कालू काका ने पूछा।

मैंने उन्हें पढ़कर सुनाया।

कालू काका की आँखें भर आईं। "बेटा, ये…"

"ये डराने की कोशिश है," मैंने कहा। "पर ये भूल गए कि डर सिर्फ़ उन्हें लगता है जिनके पास कुछ छिपाने को हो।"

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