Spirit of a Fighter – Chapter 1126
"दरवाज़ा," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो शांति अब भी थी जो मुझे डरा रही थी।
मैंने उनकी तरफ़ देखा। अखाड़े के पीछे आसमान लाल हो रहा था, और उस लाली में कालू काका का चेहरा और भी पुराना लग रहा था।
"काका, साफ़ बोलिए," मैंने कहा। "कब्र है ही नहीं, तो वहाँ क्या है? दरवाज़ा किस बात का?"
कालू काका ने लाठी ज़मीन पर टिकाई और एक लंबी साँस ली। "बेटा, शेर सिंह की कब्र बनी ही नहीं थी। जो मिट्टी का ढेर तेरे पिता की कब्र कहलाता है, वो सिर्फ़ ढेर है। उसके नीचे कोई लाश नहीं। उसके नीचे एक पत्थर है, और उस पत्थर के नीचे एक सुरंग।"
मेरे पैरों के नीचे ज़मीन खिसक गई।
"बीस साल पहले," कालू काका बोले, "जिस रात भवानी मरे, उसी रात तीन आदमी मिट्टी में मरे हुए पहलवानों के काग़ज़ दबाने आए थे। उनमें से एक तो भाग गया, पर दो पकड़े गए। और उन्हें पकड़ने वाला कोई और नहीं, शेर सिंह था।"
"मेरे पापा?" मेरी आवाज़ फट गई।
"हाँ। शेर सिंह ने उन दोनों से काग़ज़ छीने और उसी रात उन्हें उस पत्थर के नीचे सुरंग में छिपा दिया। और फिर उसने अपनी जान देकर ये बात छिपाई कि वो काग़ज़ कहाँ हैं। उसकी कब्र खोदने का मतलब कब्र खोदना नहीं है, वीर। उसका मतलब है वो दरवाज़ा खोलना जो बीस साल से बंद है।"
मैं चुप खड़ा रहा। पूरब की लाली अब सुनहरी हो रही थी, और उस रोशनी में कालू काका की आँखें चमक रही थीं।
"तो चलिए," मैंने कहा। "अभी चलिए। अदालत जाने से पहले।"
"नहीं," कालू काका ने सिर हिलाया। "पहले एक काम है। जग्गू को लेने जाना है। वो कल अदालत में गवाही देगा, और उसकी ज़ुबान के बिना तेरे पापा का दरवाज़ा खोलने का कोई मतलब नहीं। वो अकेला है, और दयाराम के आदमी उसे ढूँढ रहे हैं।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "वो ठीक कह रहे हैं। जग्गू को पहले सुरक्षित करना है।"
टिंकू ने अपनी टोपी ठीक की। "तो देर किस बात की? मेरी बैलगाड़ी तैयार है।"
"तेरी बैलगाड़ी?" मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"भाई, मैंने कल रात ही किराए पर ली थी। सोचा, अगर भागना पड़े तो काम आएगी।" उसने कंधे उचकाए। "मैं डरपोक हूँ, अंधा नहीं।"
मीरा हँसी। और उस हँसी में वो सुबह की पहली रोशनी जैसी बात थी जो मेरे अंदर की ठंडक को थोड़ा गरम कर गई।
हम चले। गाँव की गलियाँ अभी सो रही थीं। कुत्ते भी हमें देखकर भौंके नहीं, बस पूँछ हिलाकर वापस लेट गए।
रास्ते में मैंने कालू काका से पूछा, "काका, जग्गू कहाँ रहता है?"
"शहर के किनारे," उन्होंने कहा। "जहाँ ईंट भट्ठों की बस्ती है। वहाँ पुराने किराए के कमरे हैं, जिनमें मज़दूर रहते हैं। उसने वहीं एक कमरा लिया है — काग़ज़ से नहीं, ज़ुबान से। वहाँ किसी से काग़ज़ नहीं माँगते।"
हम नहर के पुल से गुज़रे। पानी अभी भी काला था, और उसमें सुबह का आसमान उलटा तैर रहा था। मैंने एक पल के लिए पुल के उस हिस्से को देखा जहाँ से ठाकुर ने पत्थर गिरवाए थे। वहाँ अब कुछ नहीं था, बस गीली लकड़ियाँ और एक टूटी रस्सी।
टिंकू की बैलगाड़ी धीरे चल रही थी। बैल बूढ़ा था, और टिंकू उससे बातें कर रहा था, जैसे किसी पुराने दोस्त से।
"तू चल, भाई," वो कह रहा था। "आज तेरी इज़्ज़त का सवाल है। अगर हम वक़्त पर नहीं पहुँचे, तो मेरी मिठाई की दुकान का नाम भी बदलना पड़ेगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से कहा, "तुम ठीक हो?"
"हाँ," मैंने कहा। पर मेरी आवाज़ में वो दम नहीं था।
"वीर।" उसने अपना हाथ मेरे हाथ के पास रखा, बिना छुए। "जो कालू काका ने कहा — कब्र दरवाज़ा है — उससे तुम्हें डर लग रहा है?"
मैंने सच बोला। "डर नहीं। शर्म आ रही है। बीस साल मैंने सोचा कि मेरे पापा एक मज़दूर थे जो बीमार पड़कर मर गए। और आज पता चल रहा है कि वो एक ऐसी चीज़ की हिफ़ाज़त कर रहे थे जिसके लिए उन्होंने अपनी जान दी। मैं उनका बेटा हूँ, और मैंने कभी उन्हें जाना ही नहीं।"
मीरा ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने कहा, "तुमने गलती नहीं की। जिसे छिपाया गया, तुम उसे कैसे जानते?"
"पर मैंने कोशिश भी नहीं की," मैंने कहा। "माँ कभी बोलती नहीं थी, और मैंने भी कभी पूछा नहीं। डर था कि कहीं कोई ऐसी बात न निकले जो मुझे तोड़ दे।"
"अब निकल आई," वो बोली।
"हाँ," मैंने कहा। "और मैं टूटा नहीं।"
उसने अपना हाथ बढ़ाया और मेरी कलाई पकड़ी। बस एक पल के लिए। फिर छोड़ दिया।
शहर के किनारे की बस्ती में पहुँचते-पहुँचते सूरज निकल आया था। यहाँ की मिट्टी गीली और काली थी, और हवा में कोयले की गंध थी, जो मेरे गले में अटक गई।
बस्ती के मोड़ पर एक बूढ़ा आदमी बैठा था, जो ईंटों की तरफ़ देख रहा था। टिंकू ने उससे जग्गू का घर पूछा।
"जग्गू?" उसने आँखें सिकोड़ीं। "जो बिना हाथ वाला है? वो तो ग्यारह नंबर के पीछे रहता है। पर सुबह-सुबह उसके कमरे में बहुत शोर हो रहा था। कोई झगड़ा था शायद।"
मेरी नाक फटी। मैं वहाँ पहुँचा, तो कमरे का दरवाज़ा खुला था — खुला हुआ, टूटा हुआ नहीं। जैसे अंदर से किसी ने खोला हो और फिर भूल गया हो।
मैं अंदर घुसा।
कमरा छोटा था। एक चारपाई, एक लकड़ी की मेज़, दीवार पर एक टूटा आईना, और कोने में एक चूल्हा जिसमें राख अभी गरम थी।
चारपाई खाली थी। चादर बिखरी हुई थी, और उस पर तीन जगह गहरे लाल धब्बे थे। ताज़े। इतने ताज़े कि उनकी चमक अभी सूखी नहीं थी।
टिंकू ने मुँह पर हाथ रखा। "भाई…"
"चुप," मैंने कहा। और मैं झुका।
फ़र्श पर, चारपाई से दरवाज़े तक, घसीटने के निशान थे — दो लकीरें, जैसे कोई बैठे-बैठे खींचा गया हो। जग्गू के हाथ नहीं थे। वो खुद चल नहीं सकता था। उसे घसीटकर ले जाया गया था।
मैंने आँखें बंद कीं और साँस खींची।
पहली गंध — चंदन। वही जो हमेशा आती है।
दूसरी — तंबाकू।
तीसरी — कुछ नया। मीठी सी, भारी सी, जैसे बासी गुड़ जो दिनों पड़ा रह गया हो।
और चौथी — खून। ताज़ा खून, जो अभी धरती पर गिरा हो।
मेरा सिर चकराया। मैंने आँखें खोलीं और दीवार को हाथ से टेक दिया।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "वीर, तुम्हारी नाक—"
मैंने हाथ से पोंछा। उँगलियों पर खून लगा था। मैंने उसे धोती से पोंछ दिया, पर मीरा ने मेरा हाथ खींच लिया।
"रुको," उसने कहा। "तुम ज़्यादा सूंघ रहे हो। तुम्हारा सिर फट रहा है, है ना?"
"ठीक हूँ," मैंने कहा।
"झूठ मत बोलो।" उसकी आवाज़ कड़ी थी। उसने अपना बैग खोला और एक छोटी शीशी निकाली — हरी पत्तियों वाली। "इसे सूंघो। ये तुम्हारी नाक को थोड़ा आराम देगी।"
मैंने शीशी सूंघी। पुदीने और अजवाइन की तेज़ गंध मेरी नाक में घुसी और सिर का दर्द थोड़ा कम हुआ।
"अब बताओ," मीरा ने कहा, "क्या पकड़ा?"
मैंने धीरे से कहा, "चंदन, तंबाकू, खून…" मैं रुका। "और एक मीठी गंध। बासी गुड़ जैसी।"
मीरा का चेहरा बदला।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"ये गंध…" वो धीरे बोली, "मुझे भी जानी लग रही है। पर मुझे याद नहीं आ रहा कहाँ से।"
टिंकू बीच में बोला, "भाई, कहीं जग्गू काका को—"
"वो ज़िंदा है," मैंने उसकी बात काटी। "उसकी साँस की गंध कमरे में अभी भी ताज़ा है। जो मरा होता, उसकी गंध ठंडी होती। पर यहाँ… यहाँ गरम है। वो अभी भी ज़िंदा है।"
टिंकू ने राहत की साँस ली।
मैंने फिर झुका और मेज़ के नीचे देखा। वहाँ कुछ पड़ा था — एक चप्पल। टूटी हुई, जग्गू की चप्पल। मैंने उसे उठाया। उसकी एड़ी पर सिलाई खुली थी, और उस सिलाई के अंदर कुछ सफ़ेद दिख रहा था।
मैंने उसे खींचा। एक छोटी पर्ची निकली — मुड़ी हुई, पसीने से गीली।
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