Spirit of a Fighter – Chapter 1124
"मैंने?" उसने अपनी छोटी आँख मेरी तरफ़ घुमाई। "बेटा, ये बूढ़ा इतना भागा कि साँस नहीं आ रही थी। मैंने तो ये कहा था कि अगर तू गवाही देगा, तो तेरे उस छोटे से घर में जो दो बच्चे सो रहे हैं, वो कल सुबह नहीं उठेंगे। शीशी मैंने रख दी थी उसके सामने। उसने खुद उठाई। मैंने तो मना भी किया था।"
मेरे हाथ और कस गए।
"वीर!" मीरा की आवाज़ पीछे से आई, तेज़ और साफ़। "छोड़ उसे। पहले जग्गू। मार देगा तो सबूत मर जाएगा।"
मैंने हाथ ढीला किया। दयाराम पीछे लुढ़का, दीवार से टिका, और खाँसता रहा।
मीरा पहले से ही जग्गू के पास घुटनों पर बैठी थी। उसने अपना बैग खोला — उसमें से छोटी-छोटी शीशियाँ निकलीं, काग़ज़ की पुड़िया, एक चम्मच। उसने हरी शीशी खोली, जो उसने रास्ते में दिखाई थी — अदरक और तुलसी वाला काढ़ा। उसकी गंध कड़वी और गरम थी।
"इसका मुँह खोल," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई नरमी नहीं थी।
मैंने जग्गू का सिर अपनी जाँघ पर रखा और उसके जबड़े को धीरे से नीचे किया। उसके दाँत कसे हुए थे। मेरे हाथ काँप रहे थे — और मुझे ये काँपना अच्छा नहीं लगा। ये वही हाथ थे जो ईंटें ढोते थे, चक्की चलाते थे, पहलवानों की कलाई मरोड़ते थे। पर अभी ये काँप रहे थे, और मैं उन्हें रोक नहीं पा रहा था।
मीरा ने काढ़ा उसके मुँह में डाला। जग्गू का गला घुरघुराया।
"इसे उल्टी ज़रूर होनी चाहिए," मीरा ने कहा, और उसका माथा पसीने से चमक रहा था। "वरना ज़हर अंदर चला जाएगा। वीर, उसे करवट दिला। जल्दी।"
मैंने उसे करवट दिलाई। उसका शरीर सूखी लकड़ी जैसा हल्का था — सत्तर साल का बूढ़ा, आधा शरीर, बिना हाथ। मेरे पेट में कुछ मुड़ा।
फिर आया। एक झटका, फिर दूसरा, और जग्गू की देह लरज़ी और उसने सारा काढ़ा और उसके साथ वो कड़वा पानी ज़मीन पर उगल दिया। गंध इतनी तेज़ थी कि मेरी आँखों में पानी आ गया।
"फिर से," मीरा ने कहा, और उसने अपने हाथ की पीठ से अपना माथा पोंछा। "एक और।"
दूसरी बार। तीसरी बार। हर बार जग्गू का शरीर झटका खाता, और हर बार मैं उसका सिर थामे रहता, और हर बार मुझे लगता कि अब इसका दम टूट जाएगा।
"बस," दयाराम ने दीवार से कहा। "बचा नहीं सकते। ये ज़हर वही है जो भवानी को दिया था। उसका कोई इलाज नहीं।"
मीरा ने एक पल के लिए भी उसकी तरफ़ नहीं देखा। "कालू काका," वो बोली, और उसकी आवाज़ में अचानक वो ठंडक आई जो अदालत में आती थी, "आप अंदर आइए। दरवाज़ा बंद कीजिए। कोई बाहर न जाए।"
कालू काका दरवाज़े पर खड़े थे, लालटेन हाथ में। उनकी सफ़ेद दाढ़ी काँप रही थी। उन्होंने दयाराम को देखा — और मैंने पहली बार कालू काका की आँखों में वो चीज़ देखी जो डर से बड़ी होती है। नफ़रत।
"तू," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ फट गई। "तू यहाँ। तेरी हिम्मत कैसे हुई।"
दयाराम मुस्कुराया। "कालू, तू अब भी वहीं खड़ा है जहाँ बीस साल पहले था। तेरी उम्र बढ़ गई, तेरी जगह नहीं।"
कालू काका दरवाज़ा बंद करके अंदर आए। लालटेन उन्होंने ज़मीन पर रख दी। रोशनी नीचे से ऊपर आई, और दयाराम का जला चेहरा उसमें और भयानक लगा।
तभी जग्गू की आँखें खुलीं।
वो धीरे से खुलीं, जैसे बरसों से बंद हों। पहले सफ़ेद पुतली दिखी, फिर काली। उसने मुझे देखा। फिर मीरा को। फिर उसका शरीर एक झटका खा गया और उसकी नज़र दयाराम पर पड़ी।
दयाराम ने अपना सिर झुकाया। "देखा, बच गया। कितनी ज़िंदगी है तेरे अंदर, जग्गू। ठाकुर ने तेरे हाथ काटे, फिर भी तू मरा नहीं।"
जग्गू ने बोलना चाहा। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। सूखी और मोटी आवाज़ आई — जैसे किसी ने रेत पर पैर घसीटे हों।
"पानी," वो फुसफुसाया।
कालू काका ने अपनी कमर से ताँबे का लोटा निकाला — वो हमेशा साथ रखते थे — और जग्गू के होंठों पर थोड़ा पानी डाला। जग्गू ने निगला। फिर फिर। उसकी आँखों में चमक लौटी।
और फिर उसने वो किया जो मैंने सोचा भी नहीं था।
उसने अपनी दोनों बिना हाथों वाली कलाइयाँ ऊपर उठाईं।
दो सूखे, गोल ठूंठ, जहाँ कभी हाथ थे। उसने उन्हें अपने सामने सीधा किया, जैसे कोई अपनी हथेलियाँ दिखा रहा हो।
"ये हाथ ठाकुर ने काटे थे," उसने कहा, और आवाज़ अब साफ़ थी, फुसफुसाहट भरी पर साफ़। "भवानी के सामने काटे थे। भवानी की आँखों के सामने।"
कोठे में सन्नाटा उतर आया।
"ठाकुर ने कहा था — बोल, भवानी कहाँ है। मैंने नहीं बोला। तो उसने मेरे दोनों हाथ काट दिए और मुझे भट्ठे के गड्ढे में फेंक दिया। भवानी वहीं खड़ा था, बँधा हुआ। और वो रो रहा था। मेरे लिए नहीं — अपने ही बेटे के लिए, जिसे वो बचा नहीं सका।"
मेरे गले में कुछ अटक गया।
"पर सुन लो, दयाराम," जग्गू ने कहा, और उसकी आवाज़ में अचानक वो कुछ आया जो मरते आदमी में नहीं होता। "ये हाथ गए, पर मेरी ज़ुबान आज भी साबुत है। और मैं कल अदालत में खड़ा होकर बोलूँगा। मैं बोलूँगा कि किसने मेरे हाथ काटे, किसने भवानी को ज़हर दिया, और किसने बीस साल उन्नीस पहलवानों की लाशों पर हिसाब लिखा।"
दयाराम पीछे हटा।
दीवार से पहले से टिका था, अब और टिक गया। उसका चेहरा — जला हुआ चेहरा — उस पर डर पहली बार साफ़ दिखा। जले हुए चेहरे पर डर अजीब लगता है, क्योंकि खाल खींची हुई होती है, कुछ हिल नहीं सकता। पर उसकी आँख — वो छोटी, सिकुड़ी आँख — फैल गई।
"तू… तू मरेगा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ से वो मिठास गायब थी। "तू अदालत तक नहीं पहुँचेगा।"
"तो फिर तूने ज़हर क्यों दिया?" मैंने कहा। मैं उठा। मेरे घुटने दुख रहे थे, पर मैं सीधा खड़ा था। "अगर वो अदालत तक नहीं पहुँचेगा, तो तूने ये शीशी यहाँ क्यों रखी? तुझे डर था। तुझे पता था कि अगर ये बोलेगा, तो सब खत्म।"
दयाराम ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपनी लाठी उठाई।
कालू काका आगे आए। उन्होंने अपना हाथ लाठी पर रख दिया। "उस्ताद," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी थी, वैसी जैसी मिट्टी सींचते वक़्त होती थी। "बीस साल पहले तूने भी मुझे यही लाठी दिखाई थी। उस दिन मैं चुप रहा। आज नहीं रहूँगा।"
दयाराम की उँगलियाँ लाठी पर सफ़ेद पड़ गईं।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
"अंदर कोई है?" इंस्पेक्टर शर्मा की आवाज़ थी। "वीर सिंह! दरवाज़ा खोलो।"
मैंने दरवाज़ा खोला। बाहर मशालों की रोशनी थी, इंस्पेक्टर, दो सिपाही, करण, और टिंकू — टिंकू के हाथ में मिठाई की थैली थी जो उसने रास्ते में कहीं से उठा ली थी, और उसकी आँखें बड़ी थीं।
"अंदर," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ बाहर की हवा में साफ़ आई। "इंस्पेक्टर सर, अंदर दयाराम है। मुंशीजी। और उसने अभी जग्गू को ज़हर दिया। जग्गू ज़िंदा है और गवाही देने को तैयार है।"
इंस्पेक्टर अंदर आए। उन्होंने दयाराम को देखा — और मैंने देखा कि उनके कंधे भी एक पल के लिए ढीले पड़ गए, जैसे उन्होंने कोई बोझ उतारा हो।
"दयाराम सिंह," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में अब वो झिझक नहीं थी जो थाने में थी। "तुम गिरफ़्तार हो। ज़हर देने के इल्ज़ाम में, गवाह को डराने के इल्ज़ाम में, और भवानी सिंह की हत्या की साज़िश में।"
दयाराम हँसा। पर ये हँसी पहली वाली नहीं थी। इसमें कुछ टूटा हुआ था, किसी ऐसी चीज़ का टुकड़ा जो अब नहीं जुड़ेगा।
"गिरफ़्तार," उसने दोहराया, जैसे नया शब्द सीख रहा हो। "बीस साल बाद। बीस साल मैंने इस गाँव को अपनी उँगली पर नचाया, इंस्पेक्टर साहब। और आज एक ईंट ढोने वाला लड़का मुझे…"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno