Spirit of a Fighter – Chapter 1123
जग्गा।
उसने हमें देखा और हँसा। उसकी हँसी में वो पागलपन था जो डर से आता है।
"आ गए," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई डर नहीं था। "पर अब क्या फ़ायदा? जग्गू तो चला गया।"
"जग्गू ज़िंदा है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ शांत थी। "मीरा ने उसे बचा लिया।"
जग्गा का चेहरा बदल गया। एक पल के लिए उसके हाथ काँपे, और शीशी उसकी उँगलियों में खिसकी।
"नहीं," उसने कहा। "नहीं, वो… वो नहीं बच सकता। मैंने खुद…"
"तुमने खुद क्या किया?" इंस्पेक्टर ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो बर्फ़ थी जो सिर्फ़ सच के सामने आती है। "तुमने जग्गू को ज़हर दिया। और अब तुम खुद ज़हर देने के इल्ज़ाम में पकड़े जाओगे।"
जग्गा ने चारों तरफ़ देखा। हम चारों तरफ़ से घिरे हुए थे। उसका चेहरा पसीने से चमक रहा था, और उसकी आँखें भागने की जगह ढूँढ रही थीं।
फिर उसने वो किया जो मुझे उम्मीद नहीं थी।
उसने शीशी खोली और उसे अपने मुँह से लगा लिया।
"नहीं!" मैं दौड़ा, पर देर हो चुकी थी। उसने आधी शीशी एक साँस में पी ली और फिर हँसते हुए मशाल मिट्टी में गिरा दी।
"अब कुछ नहीं हो सकता," उसने कहा, और उसकी आवाज़ पहले से भारी हो गई थी। "मैं मरूँगा, पर ठाकुर… ठाकुर तुम्हें छोड़ेगा नहीं। वो तुम्हारी साँसों से खेलेगा, वीर सिंह। वो तुम्हारी…"
उसकी आवाज़ रुक गई। वो घुटनों के बल गिरा, और उसके होंठों से झाग निकला। फिर वो मिट्टी पर लुढ़क गया और हिलना बंद कर दिया।
मैं उसके पास खड़ा रह गया, और मेरी साँस फूल रही थी। मेरे पैरों के नीचे की मिट्टी गरम थी, और हवा में जली हुई मशाल की गंध थी।
इंस्पेक्टर ने आगे बढ़कर जग्गा की नाड़ी देखी। "मर गया," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कोई जीत नहीं थी, सिर्फ़ थकान। "पर उसने कबूल कर लिया था। गवाह हैं हम सब।"
इंस्पेक्टर ने अपने सिपाहियों को इशारा किया कि शरीर को ढक दें। मीरा ने अपनी दुपट्टे का कोना मुँह पर रख लिया, पर उसकी आँखें जग्गा के पड़े शरीर पर टिकी थीं।
"इंस्पेक्टर सर," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ किसी और की लग रही थी। "जग्गा ने कहा था कि ठाकुर ने उसे भेजा है। अब जग्गा मर गया, तो ठाकुर का कोई आदमी हमारे खिलाफ़ गवाही देने के लिए बचा ही नहीं।"
"उलटा, हमारे पास एक मुर्दा गवाह है," इंस्पेक्टर ने कहा, और उनके माथे की सिलवटें गहरी हो गईं। "जो अदालत में बोल नहीं सकता।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चमक थी जो खतरे के वक़्त आती है।
"पर जग्गू ज़िंदा है," वो बोली। "और उसने जग्गा को कबूल किया। इंस्पेक्टर सर, जग्गू के बयान की वीडियो रिकॉर्डिंग होनी चाहिए। आज कोई भी अदालत इसे नकार नहीं सकती।"
इंस्पेक्टर ने एक पल सोचा, फिर अपने जेब से फ़ोन निकाला। "मैं अभी अस्पताल भेजता हूँ। एक मजिस्ट्रेट के सामने उसका बयान दर्ज होगा। वो काग़ज़ पर होगा, मोहर लगा हुआ।"
"आज रात?" मैंने पूछा।
"आज रात," उन्होंने कहा। "अगर कल की सुनवाई टली है, तो इसे टलने ही नहीं देंगे।"
मेरे पैरों तले की ज़मीन जैसे थोड़ी स्थिर हुई। पर बस थोड़ी।
करण पीछे से आया। उसके हाथों में मेरी लाल मिट्टी की पोटली थी — जो मेरी बहन ने मेरी जेब में रखी थी, अखाड़े में गिरी थी, और वो उठा लाया था।
"भाई," उसने धीरे से कहा, "तेरा हाथ काँप रहा है।"
मैंने अपनी हथेली देखी। सच में काँप रही थी। जग्गा के खून और मेरे अपने खून के निशान उस पर सूख रहे थे।
"मैं ठीक हूँ," मैंने कहा।
"मैंने पूछा भी नहीं था," करण ने कहा, और वो पहली बार था जब उसकी आवाज़ में मज़ाक नहीं था।
इंस्पेक्टर ने मशाल के बुझे टुकड़े को उठाया और एक रुमाल में लपेट लिया। "ये भी सबूत है," उन्होंने कहा। "जग्गा ने इसे जान-बूझकर गिराया। शायद इसी पर उसके हाथ के निशान हैं।"
तभी उस बात की गंध फिर मेरी नाक में आई — चंदन।
मैं एकदम सीधा खड़ा हो गया। वो गंध भट्टे से नहीं, पीछे से आ रही थी। अखाड़े की तरफ़ से।
"इंस्पेक्टर सर," मैंने कहा, "जग्गा अकेला नहीं आया था। यहाँ कोई और भी था। मुझे चंदन की गंध आ रही है, और वो अखाड़े की तरफ़ जा रही है।"
इंस्पेक्टर ने मेरी तरफ़ देखा। "अखाड़ा? इस वक़्त?"
"वहाँ कुछ है," मीरा ने कहा, और वो पहले से ही वापस मुड़ चुकी थी। "वीर की नाक कभी गलत नहीं होती।"
हम पूरी टीम की टीम वापस अखाड़े की तरफ़ चली। रास्ते में चंदन की गंध हर कदम पर गहरी होती गई, और मेरे साथ एक और जानी-पहचानी गंध आने लगी — पुरानी लकड़ी, बंद कोठे की फफूंद, और उसके नीचे मिट्टी का तेल।
अखाड़े का गेट खुला था। अंदर अंधेरा था और सन्नाटा।
"कोई दिया जलाओ," इंस्पेक्टर ने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "जलाओ मत। गंध दूर हो जाएगी।"
मैं अंधेरे में चला, सिर्फ़ अपनी नाक के सहारे। मिट्टी, पसीना, पुरानी चटाई, और फिर… वो कोठा। जो बीस साल से बंद था। जिसकी चाबी किसी के पास नहीं थी। जिसके बारे में गाँव के बूढ़े भी बस इतना कहते थे कि "वहाँ पहले भवानी रहता था।"
मैं उसके सामने रुका।
दरवाज़े पर ताज़ा खरोंच थी। जैसे किसी ने अभी-अभी उसे खोला हो।
मैंने हाथ बढ़ाया। दरवाज़ा खुद खुला — बिना साँकल, बिना चरमराहट के।
उसके अंदर से आवाज़ आई। एक बूढ़े आदमी की, सूखी और भारी, जैसे कोई बहुत दिनों से पानी न पीया हो।
"तू आ गया, भवानी का बेटा। पर देर कर दी तूने — जग्गू ने अभी-अभी ज़हर पी लिया है।"
॥
कोठे का दरवाज़ा खुला था और अंदर से वो आवाज़ आई थी — "जग्गू ने अभी-अभी ज़हर पी लिया है।"
मैं दो कदम में अंदर था।
कोठे की हवा भारी थी। फफूंद, मिट्टी का तेल, और उसके ऊपर एक तेज़ कड़वी गंध — बादाम जैसी। ज़हर की गंध।
जग्गू ज़मीन पर पड़ा था। करवट लेटा था, दोनों बिना हाथों वाली कलाइयाँ उसके पेट पर टिकी थीं, और उसके होंठ नीले पड़ चुके थे। उसके मुँह से झाग के जैसी पतली लकीर बह रही थी। और उसके पास ही पीली शीशी पड़ी थी — खाली। उसका ढक्कन दो हाथ दूर लुढ़का था।
और उसके सिरहाने खड़ा था वो बूढ़ा।
चेहरा जला हुआ। दाईं तरफ़ की खाल चिकनी और चमकदार, जैसे पिघला हुआ मोम जम गया हो। बाईं आँख छोटी थी, सिकुड़ी हुई, और उसी में एक हल्की मुस्कान खेल रही थी। एक हाथ में लाठी थी। दूसरे हाथ की उँगलियाँ जग्गू के सिर पर थीं — नहीं, सिर पर नहीं, उसकी कलाई पर, जैसे कोई बच्चे का नाड़ी देख रहा हो।
"आ गया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो सफ़ेद लिहाफ़ था जो बहुत पुराने कपड़ों से आता है। "मैंने कहा था न, देर कर दी तूने।"
मैंने सोचा नहीं। शरीर ने खुद हीला।
दो कदम में उसके पास पहुँचा, लाठी वाले हाथ को मरोड़ा और उसकी गर्दन पकड़ ली। उसकी गंध मेरी नाक में घुसी — और मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
तंबाकू। गुड़ की चाशनी। पुराना काग़ज़। और उसके नीचे, बहुत धीरे से, बादाम का तेल।
"दयाराम," मैंने कहा।
वो हँसा। कमज़ोर गर्दन थी, मेरी हथेली में उसकी साँस अटकी, फिर भी वो हँसा। "नाम याद रखा तूने। अच्छा किया। मरने से पहले कोई अपना नाम सुन ले, ये भी बड़ी बात है।"
"तूने इसे ज़हर दिया।"
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