Spirit of a Fighter – Chapter 1122
"निगलिए, काका," वो बोली। "प्लीज, निगलिए।"
एक पल के लिए कुछ नहीं हुआ। फिर जग्गू का गला हिला, और वो काँपकर खाँसा। काला पानी उसके होंठों से बहकर मेरी बाँह पर गिरा।
मेरी आँखों में पानी आ गया। मैंने उसे पोंछा नहीं।
"काका," मैंने कहा, "कौन था? किसने दिया ये?"
जग्गू की आँखें खुलीं। उनमें अब कुछ था — थोड़ी रोशनी, थोड़ी जान। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसके होंठ हिले।
"वो… वो आदमी…" उसकी आवाज़ किसी चीज़ से रगड़ी हुई थी। "जिसके पास… मेरी फोटो थी…"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"बिशन?" मैंने कहा।
जग्गू ने सिर हिलाया, और उसके सिर के साथ उसकी आँखों से आँसू टपके। "उसने कहा… मुझे माफ़ कर दे… ठाकुर ने… उसके बेटे को…"
वो फिर खाँसा। इस बार खाँसी में खून था, बहुत थोड़ा, पर था। मेरा हाथ उसके सीने पर गया। उसका दिल तेज़ धड़क रहा था, जैसे डर के मारे भाग रहा हो।
"बात मत कीजिए," मीरा ने कहा। "आपको आराम चाहिए।"
"नहीं," जग्गू ने कहा, और उसकी आवाज़ में अचानक वो ज़िद आ गई जो मरते आदमी में आती है — आख़िरी बात कहने की ज़िद। "सुनो… वीर… मैंने… मैंने तुमसे झूठ बोला था।"
मैं रुक गया।
"मेरे पास… असली फोटो नहीं थीं," उसने कहा। "वो बिशन के पास थीं। पर… पर मैंने तुम्हें ये इसलिए नहीं बताया कि मुझे डर था कि तुम… तुम मुझे छोड़ दोगे। बीस साल से मैं अकेला था, वीर। बीस साल से कोई मेरे पास नहीं आया। तुम आए। तुम मेरी झोपड़ी में आए, मेरे पास बैठे। मुझे लगा… मुझे लगा कि अगर मैंने सब बता दिया, तो तुम चले जाओगे।"
मेरा गला भर गया। मैंने उसका सिर अपनी छाती से और कसकर लगा लिया।
"मैं नहीं जाऊँगा, काका," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ मेरी ही नहीं लग रही थी। "मैं यहीं हूँ। मैं कहीं नहीं जा रहा।"
जग्गू ने आँखें बंद कर लीं। उसके होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान आई — बहुत हल्की, जैसे सूखी ज़मीन पर पहली बूँद।
तभी कोने में बैठे उस बूढ़े आदमी ने अपनी आवाज़ उठाई।
"भवानी के बेटे," उसने कहा, "मैं वही हूँ जिसे तू ढूँढ रहा है। मैं बिशन हूँ।"
मैं पलटा। मेरा पूरा शरीर तन गया। मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए, और मेरे सीने में वो पुराना गुस्सा उबल आया — वो गुस्सा जो मैंने भट्ठे पर पीया था, जब उसने मुझे किताब दी थी और फिर भाग गया था।
"आप?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँप रही थी। "आपने उसे ज़हर दिया?"
"मैंने नहीं दिया," बिशन ने कहा, और वो दीवार से सरककर आगे आया। उसकी टाँगें काँप रही थीं। "मैं यहाँ इसलिए आया कि मैं उसे बचा सकूँ। ठाकुर के आदमी उसे ले जा रहे थे, और मैंने उन्हें रास्ते में रोका। मैंने उन्हें बताया कि जग्गू मर चुका है, और उन्हें भगा दिया। फिर मैंने उसे यहाँ लाया। पर मैं देर से पहुँचा। उसने पहले ही पी लिया था।"
"किसने दिया?" इंस्पेक्टर ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो सख़्ती लौट आई थी।
बिशन ने उनकी तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। "ठाकुर का आदमी। वो जो लंगड़ा कर चलता है। जिसके पास हमेशा पीली शीशी रहती है।"
मेरे दिमाग़ में एक चेहरा उभरा। लंगड़ा। पीली शीशी।
"जग्गा," मैंने कहा।
"हाँ," बिशन ने कहा। "पर वो सिर्फ़ हाथ था। दिमाग़ किसी और का था। और वो दिमाग़…" उसने रुककर मेरी आँखों में देखा, "…वो दिमाग़ मुंशीजी का है।"
मैं पलटा। मुंशीजी दरवाज़े पर खड़े थे, और उनका चेहरा पत्थर जैसा था।
"मैंने कहा था," मुंशीजी ने धीरे से कहा, "कि मैं तुम्हारे लिए कुछ करूँगा। पर मैंने ये नहीं किया।"
"तो किसने किया?" मैंने पूछा।
"ठाकुर ने," मुंशीजी ने कहा। "और उसने इसे इस तरह किया कि इल्ज़ाम मुझ पर आए। देखो — जग्गू को ज़हर मिला, और मैं वही थाने में बैठा था जहाँ से चाय की गंध आ रही थी। कोई कहेगा कि मैंने भेजा। कोई कहेगा कि मैंने चाय में ज़हर घोला। ये जाल है, वीर सिंह। और ये जाल मेरे लिए बिछाया गया है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ़ जग्गू की धीमी साँसें सुनाई दे रही थीं।
फिर करण ने कुछ कहा जिससे सब चौंक गए।
"तो अब क्या?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो बेचैनी थी जो सबके चेहरों पर थी। "कल सुनवाई है। जग्गू इस हाल में गवाही नहीं दे सकता। मुंशीजी पर इल्ज़ाम है। ठाकुर बाहर है। और हमारे पास सिर्फ़ काग़ज़ हैं, जिन्हें कोई भी जाली कह सकता है।"
मैं उठा। जग्गू का सिर मैंने धीरे से मिट्टी पर रखा और मीरा की तरफ़ देखा।
"गवाही के लिए ज़ुबान चाहिए," मैंने कहा। "पर सच के लिए सिर्फ़ ज़ुबान नहीं चाहिए। सच के लिए… गंध चाहिए।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो चमक आई जो सिर्फ़ उस वक़्त आती है जब उसे कुछ समझ आता है।
"तुम्हारा मतलब?" उसने पूछा।
"मतलब," मैंने कहा, और मैंने उस कटोरी की तरफ़ देखा जो जग्गू के पास उलटी पड़ी थी, "कि ये ज़हर किसी और ने नहीं, ठाकुर के आदमी ने दिया। और उस आदमी की गंध… मैं पहचानता हूँ।"
मैंने कटोरी उठाई। उसके किनारे पर एक बूँद बची थी। मैंने उसे अपनी उँगली पर लिया और सूँघा।
गंध साफ़ थी। कड़वी, धातु जैसी — वो ज़हर जो पीली शीशियों में था। और उसके नीचे, बहुत हल्का, गुड़ की चाशनी की गंध।
जग्गा की गंध।
मैंने आँखें बंद कीं और उस गंध को अपने अंदर भर लिया — हर तह, हर परत। मेरे सिर में दर्द उभरा, और मेरी नाक में वो जानी-पहचानी गरमी फैलने लगी।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। "बस," उसने कहा। "ज़्यादा मत करो।"
पर मैंने एक और साँस खींची। और इस बार गंध में कुछ और था — मिट्टी का तेल, जला हुआ कपड़ा, और बहुत दूर से आती हुई एक और गंध… चंदन की।
चंदन।
मैंने आँखें खोलीं। "वो यहाँ से ज़्यादा दूर नहीं गया," मैंने कहा। "उसके कपड़ों पर मिट्टी का तेल है। वो भट्ठे की तरफ़ गया है।"
इंस्पेक्टर ने अपने सिपाहियों को इशारा किया। "भट्ठे की तरफ़," उन्होंने कहा। "दो आदमी यहाँ जग्गू के पास रहेंगे।"
मैंने जग्गू की तरफ़ आख़िरी बार देखा। उसकी साँस अब थोड़ी गहरी थी, और उसके होंठ हिल रहे थे — कुछ बुदबुदा रहा था।
मैं झुका और अपना कान उसके होंठों के पास ले गया।
"बीस साल," वो बुदबुदाया। "बीस साल मैंने इंतज़ार किया… कि कोई आएगा… जो मेरे हाथों की कीमत पूछेगा…"
मेरी आँखें भर आईं।
"मैं पूछता हूँ, काका," मैंने कहा। "मैं पूछता हूँ।"
और मैं उठकर बाहर चला, क्योंकि अगर मैं एक पल और वहाँ रुका, तो मैं रो पड़ता, और उस वक़्त मुझे रोना नहीं था। उस वक़्त मुझे ठाकुर के आदमी को पकड़ना था।
बाहर हवा और ठंडी हो गई थी। अखाड़े की मिट्टी मेरे पैरों के नीचे दब रही थी, और मेरे पीछे सब चल रहे थे — मीरा, करण, इंस्पेक्टर और उनके सिपाही।
भट्ठे का रास्ता उस रात बहुत लंबा लग रहा था। रास्ते में मीरा ने धीरे से कहा, "वीर, तुम्हारी नाक से खून बह रहा है।"
मैंने हथेली से पोंछा। खून था — गरम, और उँगलियों पर चिपचिपा।
"पर मैं रुक नहीं सकता," मैंने कहा।
"मैंने रुकने को नहीं कहा," उसने जवाब दिया, और उसकी आवाज़ में वो नरमी थी जो सिर्फ़ उसके पास आती है। "मैंने सिर्फ़ बताया।"
हम भट्ठे के पास पहुँचे। वहाँ की आग बुझ चुकी थी, सिर्फ़ अंगारे दहक रहे थे और उनकी लाल रोशनी में एक आदमी खड़ा था — लंगड़ाता हुआ, एक हाथ में पीली शीशी, और दूसरे हाथ में मशाल।
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