Spirit of a Fighter – Chapter 1120
"वीर सिंह," इंस्पेक्टर ने कहा, और उन्होंने फ़ाइल खोली, "तुम पर इल्ज़ाम है कि तुमने अखाड़े की ज़मीन के असली काग़ज़ चुराए। ये काग़ज़ कल अदालत में पेश होने थे। कहो, तुम्हारे पास क्या कहना है?"
मैंने उनकी आँखों में देखा। और फिर मेरी नज़र उनके हाथ पर गई — उनकी मेज़ पर एक कप रखा था, चाय का। उसमें से भाप उठ रही थी। और भाप के साथ एक गंध — गुड़ और अदरक की।
मुंशीजी की चाय।
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैंने धीरे से कहा, और मेरी आवाज़ सिर्फ़ इंस्पेक्टर तक पहुँची —
"सर, ये चाय किसने बनाई?"
इंस्पेक्टर का हाथ रुक गया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो चमक आई जो सिर्फ़ उस आदमी की होती है जो खुद जाल में फँसा हो और उसे उम्मीद की डोर दिख रही हो।
"तुम्हें गंध आती है?" उन्होंने बहुत धीरे पूछा।
मैंने सिर हिलाया।
इंस्पेक्टर ने कुर्सी पीछे सरकाई, और उनकी आवाज़ और भी धीमी हो गई। "तो सुनो, वीर सिंह। ये शिकायत मेरे पास नहीं आई — मुझ पर थोपी गई है। ऊपर से हुक्म आया है। और जिसने ये किया, वो अभी इसी थाने में है।"
मेरी साँस रुक गई।
"कौन?" मैंने पूछा।
इंस्पेक्टर ने अपनी आँखें ऊपर उठाईं और दरवाज़े के पीछे की तरफ़ देखा — उस कमरे की तरफ़ जहाँ से हल्की रोशनी आ रही थी और जहाँ से चाय की गंध आ रही थी।
"वो खुद तुमसे मिलना चाहता है," इंस्पेक्टर ने कहा। "पर एक बात याद रखना — ये कमरा कोई अदालत नहीं है। यहाँ जो बोला जाएगा, वो बाहर नहीं जाएगा। और जो तुम्हारे पास है, वो अभी मत दिखाना। पहले ये जान लो कि सामने कौन बैठा है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने बहुत हल्का सा सिर हिलाया — हाँ।
मैं उठा। मेरे पैर भारी थे, पर मैं चला। दरवाज़े के पीछे वाले कमरे की तरफ़।
दरवाज़ा खोला तो अंदर अंधेरा था। सिर्फ़ एक मोमबत्ती जल रही थी, मेज़ पर। और मेज़ के पीछे एक आदमी बैठा था — पतला, चश्मा, हाथ में कप।
मुंशीजी।
या — दयाराम।
उसने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में कोई डर नहीं था। सिर्फ़ थकान, और एक अजीब सी बेचैनी।
"आ गए, वीर सिंह," उसने कहा, और उसकी आवाज़ वैसी ही थी जैसी अदालत में थी — धीमी, मीठी, हर शब्द तौलकर। "बैठिए। चाय ठंडी हो रही है। और हम दोनों को बहुत कुछ बात करनी है — ख़ासकर उस फोटो के बारे में जो आपकी माँ ने बीस साल आपकी रज़ाई में सिलकर छिपाई थी।"
मोमबत्ती की लौ हिली, और उसकी परछाई दीवार पर बड़ी हो गई।
॥
मोमबत्ती की लौ हिली, और उसकी परछाई दीवार पर बड़ी हो गई।
मैं उसके सामने वाली कुर्सी खींचकर बैठ गया। कुर्सी का पाया चटकी, और वो आवाज़ उस छोटे से कमरे में गूँज गई। मुंशीजी ने अपना कप उठाया, एक घूँट लिया, और फिर कप वापस रख दिया — बहुत धीरे से, जैसे काँच को छूने से भी डरते हों।
"आपको पता है," मैंने कहा, "कि जो आपने अभी कहा, वो कहकर आपने अपना ही पत्ता खोल दिया। फोटो की बात सिर्फ़ मेरे घर वाले जानते हैं। आपको कैसे पता?"
उसके चेहरे पर वो मुस्कान और गहरी हो गई। "बेटा, मैं बीस साल से इस गाँव की हर चिट्ठी पढ़ता आया हूँ। तुम्हारी माँ ने वो फोटो कहाँ छिपाई, ये मुझे उस दिन पता चल गया था जिस दिन उसे सिला गया था।"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए। कुर्सी के हैंडल पर मेरी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गईं। "तो आप बीस साल से जानते थे, और आपने कुछ नहीं किया?"
"मैंने बहुत कुछ किया," उसने कहा, और पहली बार उसकी आवाज़ में वो मिठास नहीं थी। सिर्फ़ सूखी, थकी हुई सच्चाई। "मैंने तुम्हारी माँ को बचाया। बीस साल में तीन बार। तुम्हें नहीं पता, पर जिस रात तुम्हारे पिता की लाश आँगन में पड़ी थी, उस रात ठाकुर के दो आदमी तुम्हारे घर आए थे। मैंने उन्हें रास्ते में रोका। उन्हें झूठी खबर दी कि बच्चा मर गया है।"
मेरा गला सूख गया।
"क्यों?" मैंने पूछा। "आप उसी के साथ थे जिसने मेरे पिता को मारा।"
मुंशीजी ने चश्मा उतारा और मेज़ पर रख दिया। उसके बिना उसका चेहरा और भी पुराना लग रहा था, और भी टूटा हुआ।
"मैं उसके साथ था," उसने कहा, "क्योंकि मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था। मेरा बेटा उस वक़्त दस साल का था। ठाकुर ने उसे उठा लिया था। कहा था — तू मेरे साथ चल, तेरा बेटा ज़िंदा रहेगा।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा कि मोमबत्ती की लौ की आवाज़ सुनाई दे रही थी — हल्की-सी फड़फड़ाहट, जैसे कोई दूर से साँस ले रहा हो।
"और आपका बेटा?" मैंने धीरे से पूछा।
"आज भी ठाकुर के पास है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई। "तीस साल का आदमी है अब, पर मेरे लिए वही दस साल का है। मैंने उसे तीन बार देखा है, बस दूर से। एक बार मेले में, एक बार अस्पताल की बारी में, और एक बार… उस दिन जब उसने मुझे नहीं पहचाना।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था, और वो पानी मोमबत्ती की रोशनी में चमक रहा था। मेरे सीने में कुछ हिला। गुस्सा भी था, और उस गुस्से के नीचे कुछ और भी — जिसे मैं नाम नहीं देना चाहता था, क्योंकि उस आदमी को माफ़ करना मेरे पिता की हड्डियों का अपमान लगता।
"तो आपने मेरे पिता को मरने दिया," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँप रही थी, "अपने बेटे के लिए।"
"नहीं।" उसने मेरी आँखों में देखा। "मैंने तुम्हारे पिता को बचाने की कोशिश की थी। उस रात मैंने उन्हें खबर भेजी थी — एक पुरानी चप्पल में काग़ज़ रखकर। लिखा था — पानी मत पीना। पर वो काग़ज़… वो काग़ज़ उन तक नहीं पहुँचा।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"वो चप्पल," मैंने धीरे से कहा, "गंगा देवी के संदूक में मिली थी।"
मुंशीजी ने आँखें बंद कर लीं। "तो वो उन तक नहीं पहुँचा। किसी ने रास्ते में उसे पकड़ लिया। और उस काग़ज़ को संदूक में रख दिया — सबूत के तौर पर, या शायद… याद के तौर पर।"
वो उठा। उसकी कमर टूटी हुई थी, और वो उठते वक़्त मेज़ का सहारा लेना पड़ा। फिर वो खिड़की के पास गया और बाहर देखने लगा। खिड़की के बाहर थाने का पिछला आँगन था, जहाँ एक बल्ब जल रहा था और उसकी पीली रोशनी में धूल के कण तैर रहे थे।
"वीर सिंह," उसने खिड़की से ही कहा, "मैंने तुम्हें आज इसलिए बुलाया कि मैं तुम्हें वो दे सकूँ जो मैंने बीस साल छिपाया है। कल अदालत में मैं गवाही दूँगा — न ठाकुर के लिए, न तुम्हारे लिए। सिर्फ़ सच के लिए।"
वो पलटा। उसकी आँखों में अब वो डर नहीं था।
"लेकिन एक शर्त है," उसने कहा। "मेरे बेटे को ठाकुर के पास से बचाना होगा। अगर मैं गवाही दूँगा और ठाकुर को पता चला, तो वो पहले मेरे बेटे का गला घोंटेगा।"
मैं उठ खड़ा हुआ। "मुझे उसका पता बताइए।"
"पता नहीं," उसने कहा। "पर एक जगह है…"
वो आगे बोलने ही वाला था कि दरवाज़ा खुला और इंस्पेक्टर शर्मा अंदर आए। उनके हाथ में एक काग़ज़ था, और उनका चेहरा उतरा हुआ था।
"रुक जाओ," उन्होंने कहा। "पहले ये देख लो।"
उन्होंने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने उसे खोला — एक शिकायत थी, टाइप की हुई, नीचे ठाकुर के वकील की मोहर और दस्तख़त थे। इल्ज़ाम लिखा था कि वीर सिंह ने हवेली से ज़मीन के काग़ज़ चुराए और उन्हें भट्ठे में जलाने की कोशिश की।
मैंने पढ़ा, और मेरे हाथ काँपने लगे।
"ये झूठ है," मैंने कहा। "ये काग़ज़ तो मुझे आज मिले हैं।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno